इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, वह केवल अलग-अलग युद्धों का समय नहीं बल्कि एक ऐसी वैश्विक बेचैनी का दौर है, जहां शांति अपवाद और संघर्ष सामान्य होता जा रहा है। आज किसी एक देश के लिए केवल एक दुश्मन की कल्पना पुरानी हो चुकी है। कई राष्ट्र एक साथ अनेक मोर्चों पर टकराव, युद्ध, प्रतिबंध और कूटनीतिक तनाव का सामना कर रहे हैं।

यह स्थिति केवल सीमित क्षेत्रीय संघर्षों तक नहीं है, बल्कि महाद्वीपों को जोड़ती हुई वैश्विक अस्थिरता का रूप ले चुकी है। कहीं प्रत्यक्ष युद्ध चल रहे हैं, तो कहीं अप्रत्यक्ष टकराव, सैन्य अभ्यास, प्रतिबंधों की जंग और राजनीतिक दबाव जारी हैं। इस माहौल में कुछ देश ऐसे हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा दुश्मनों से घिरे हुए माने जा रहे हैं।
ये देश वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं, जहां हर फैसला अंतरराष्ट्रीय संतुलन को प्रभावित करता है। इनकी नीतियां, सैन्य कार्रवाइयां और गठबंधन पूरी दुनिया की दिशा तय करने की क्षमता रखते हैं।
रूस: एक लंबा युद्ध और बढ़ती वैश्विक दुश्मनी
रूस आज के समय में दुनिया के सबसे ज्यादा भू-राजनीतिक रूप से अलग-थलग देशों में गिना जाता है। यूक्रेन के साथ उसका युद्ध अब पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और यह संघर्ष अब केवल दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है। यह युद्ध धीरे-धीरे एक ऐसे लंबे और जटिल संघर्ष में बदल चुका है, जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कई वैश्विक शक्तियां शामिल हैं।
यूक्रेन युद्ध के कारण रूस का टकराव केवल कीव तक सीमित नहीं रहा। पश्चिमी देशों के साथ उसका संबंध लगातार बिगड़ता गया है। नाटो के 32 सदस्य देशों के साथ रूस का सीधा युद्ध नहीं है, लेकिन मॉस्को इन सभी देशों को अपने संभावित या घोषित दुश्मनों के रूप में देखता है।
अमेरिका, ब्रिटेन, पोलैंड और बाल्टिक देश रूस की नजर में सबसे बड़े विरोधी बन चुके हैं। इन देशों द्वारा यूक्रेन को दिया गया सैन्य, आर्थिक और खुफिया समर्थन रूस के लिए एक सामूहिक चुनौती जैसा है। इसके अलावा पूर्वी यूरोप और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव ने रूस के सुरक्षा संकट को और गहरा कर दिया है।
रूस की स्थिति यह दर्शाती है कि कैसे एक क्षेत्रीय युद्ध पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है और किसी देश को लगभग पूरी पश्चिमी दुनिया के विरोध में खड़ा कर सकता है।
इजराइल: चारों ओर से घिरा एक राष्ट्र
इजराइल उन देशों में शामिल है, जो इस समय सबसे ज्यादा सक्रिय दुश्मनों का सामना कर रहे हैं। उसकी स्थिति बेहद जटिल है क्योंकि उसे एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ रहा है।
गाजा में इजराइली सेना लंबे समय से हमास के खिलाफ सैन्य अभियान चला रही है। यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं बल्कि मानवीय और राजनीतिक संकट का रूप भी ले चुका है। हर कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया को जन्म देती है और इजराइल की स्थिति को और संवेदनशील बना देती है।
उत्तरी सीमा पर लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ झड़पें लगातार जारी हैं। यह मोर्चा कभी भी बड़े युद्ध में बदल सकता है। सीरिया में इजराइल नियमित रूप से ईरान से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले करता रहा है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ता है।
इसके साथ ही लाल सागर में यमन के हाउती विद्रोही इजराइल से जुड़े शिपिंग मार्गों को निशाना बना रहे हैं। इस तरह इजराइल को ज़मीन, आसमान और समुद्र तीनों मोर्चों पर खतरे का सामना करना पड़ रहा है।
इजराइल की स्थिति यह दिखाती है कि कैसे एक छोटा सा देश, रणनीतिक और राजनीतिक कारणों से, कई दुश्मनों के घेरे में आ सकता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका: वैश्विक शक्ति और वैश्विक विरोध
संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति होने के बावजूद आज कई महाद्वीपों में बढ़ती दुश्मनी का सामना कर रहा है। उसकी भूमिका वैश्विक है और इसलिए उसके टकराव भी सीमाओं से परे फैले हुए हैं।
यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका और रूस के बीच तनाव अपने चरम पर है। ताइवान और व्यापार जैसे मुद्दों पर चीन के साथ अमेरिका का टकराव लगातार गहराता जा रहा है। मध्य पूर्व में ईरान को लेकर भी वॉशिंगटन की नीति सख्त बनी हुई है।
उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम ने अमेरिका के लिए एक और सुरक्षा चुनौती खड़ी कर दी है। इसके अलावा वेनेजुएला के साथ राजनीतिक और आर्थिक तनाव लगातार बढ़ रहा है।
ड्रग कार्टेल के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की अमेरिकी धमकियों ने मेक्सिको के साथ भी रिश्तों को तनावपूर्ण बना दिया है। इस तरह अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से लेकर अप्रत्यक्ष टकराव तक, कई स्तरों पर दुश्मनों से घिरा हुआ है।
चीन: बिना घोषित युद्ध के कई रणनीतिक टकराव
चीन का मामला थोड़ा अलग है। उसने हाल के वर्षों में कोई बड़ा घोषित युद्ध नहीं लड़ा है, लेकिन इसके बावजूद उसके दुश्मनों की सूची काफी लंबी मानी जाती है। चीन के अधिकतर टकराव रणनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर चल रहे हैं, लेकिन उनमें सैन्य शक्ति का प्रदर्शन साफ दिखाई देता है।
ताइवान चीन के लिए सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा है। बीजिंग अपने दावे को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास करता रहा है। यह अभ्यास न केवल ताइवान बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश होते हैं।
दक्षिण चीन सागर में चीन का टकराव फिलिपींस और जापान जैसे देशों से होता रहता है। समुद्री सीमाओं को लेकर होने वाली ये झड़पें क्षेत्रीय सुरक्षा को अस्थिर बनाए रखती हैं।
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के कई देश चीन को अपनी मुख्य रणनीतिक चुनौती के रूप में देखते हैं। इस तरह चीन भले ही किसी बड़े युद्ध में शामिल न हो, लेकिन वह लगातार सैन्य और राजनयिक टकरावों के केंद्र में बना हुआ है।
ईरान: अप्रत्यक्ष युद्धों का केंद्र
ईरान शायद ही कभी सीधे युद्ध लड़ता है, लेकिन उसकी भूमिका मध्य पूर्व में बेहद प्रभावशाली और विवादास्पद है। हमास, हिजबुल्लाह और हाउती विद्रोहियों को समर्थन देकर ईरान इजराइल और अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष संघर्ष में लगातार शामिल रहता है।
2025 के क्षेत्रीय युद्ध के बाद पश्चिमी शक्तियों और खाड़ी देशों के साथ ईरान का तनाव और बढ़ गया है। इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में उसका प्रभाव उसे एक ऐसे नेटवर्क के केंद्र में रखता है, जहां दुश्मन और जवाबी गठबंधन लगातार सक्रिय रहते हैं।
ईरान की स्थिति यह दिखाती है कि कैसे अप्रत्यक्ष युद्ध और प्रतिनिधि गुटों के जरिए कोई देश वैश्विक राजनीति में बड़ा प्रभाव डाल सकता है।
सूडान: जब दुश्मन भीतर ही हों
सूडान इस सूची का सबसे दुखद उदाहरण माना जाता है। यह देश केवल बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि अपने ही भीतर चल रहे एक क्रूर गृहयुद्ध से जूझ रहा है।
सूडानी सशस्त्र बल और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज के बीच चल रहा संघर्ष देश को पूरी तरह तबाह कर चुका है। इस युद्ध में क्षेत्रीय शक्तियां भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो चुकी हैं। पड़ोसी देशों पर अलग-अलग गुटों का समर्थन करने के आरोप लगते रहे हैं।
सूडान की स्थिति यह दर्शाती है कि कैसे आंतरिक संघर्ष किसी देश को वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बना सकता है।
निष्कर्ष: एक अस्थिर विश्व व्यवस्था की तस्वीर
आज की दुनिया में सबसे ज्यादा दुश्मनों वाले देश केवल युद्ध नहीं लड़ रहे, बल्कि वे वैश्विक व्यवस्था की दिशा तय कर रहे हैं। रूस, इजराइल, अमेरिका, चीन, ईरान और सूडान जैसे देश अलग-अलग कारणों से संघर्ष के केंद्र में हैं।
यह स्थिति बताती है कि आने वाला समय और भी जटिल हो सकता है। कूटनीति, सैन्य शक्ति और वैश्विक गठबंधन अब पहले से कहीं ज्यादा अहम भूमिका निभा रहे हैं। दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां शांति के लिए सामूहिक प्रयास पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गए हैं।
