अगले सप्ताह इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत दौरे पर आ रहे हैं, लेकिन उससे पहले नई दिल्ली में जो कूटनीतिक गतिविधियां देखने को मिली हैं, उन्होंने पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीति में भारत की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जिस तरह अरब देशों को दिल्ली बुलाकर एक साझा मंच पर संवाद स्थापित किया, उसने यह साफ कर दिया कि भारत अब केवल किसी एक धड़े का मित्र नहीं, बल्कि विरोधी शक्तियों के बीच संतुलन साधने वाला एक प्रभावशाली वैश्विक खिलाड़ी बन चुका है।

नेतन्याहू की प्रस्तावित यात्रा से पहले यह कूटनीतिक पहल साधारण नहीं थी। यह एक सोचा-समझा और रणनीतिक कदम था, जिसने इजरायल और अरब देशों दोनों को यह संदेश दे दिया कि भारत उनके साथ रिश्तों को अलग-अलग नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता के नजरिये से देखता है।
दस साल बाद भारत-अरब विदेश मंत्री बैठक और उसका संदेश
31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्री बैठक आयोजित हुई। यह बैठक करीब एक दशक के लंबे अंतराल के बाद हुई, जिसने अपने आप में इसके महत्व को कई गुना बढ़ा दिया। इस सम्मेलन में अरब लीग के सभी 22 देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी रही। इतनी बड़ी संख्या में अरब देशों का दिल्ली आना यह दर्शाता है कि भारत को अब मिडिल ईस्ट में एक भरोसेमंद और संतुलित शक्ति के रूप में देखा जाने लगा है।
इस बैठक का समय भी बेहद अहम था। यह जयशंकर की दिसंबर 2025 की इजरायल यात्रा और नेतन्याहू के भारत आगमन के ठीक बीच आयोजित हुई। इसने भारत की कूटनीति को एक ऐसे पुल के रूप में पेश किया, जो इजरायल और अरब जगत के बीच संवाद का रास्ता खोल सकता है।
फिलिस्तीन की नजर में भारत क्यों बना ‘मसीहा’
इस बैठक के दौरान फिलिस्तीनी विदेश मंत्री वारसेन अगाबेकियन शाहीन की मौजूदगी और उनके बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी ध्यान खींचा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि भारत ही वह महान देश है, जो इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को रोकने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। उनके शब्दों में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल से दोस्ती और अरब देशों के साथ मजबूत रिश्ते भारत को दुनिया का सबसे प्रभावी मध्यस्थ बनाते हैं।
फिलिस्तीन ने भारत से गाजा के पुनर्निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने की अपील भी की। यह अपील केवल मानवीय सहायता तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह भारत की राजनीतिक और कूटनीतिक विश्वसनीयता पर जताए गए भरोसे का प्रतीक थी।
इजरायल के साथ भारत की गहरी दोस्ती
भारत और इजरायल के रिश्ते बीते वर्षों में रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। दिसंबर 2025 में जयशंकर की इजरायल यात्रा के दौरान उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में हुए हमले में यहूदियों की मौत पर गहरी संवेदना जताई थी। इस मौके पर भारत और इजरायल ने आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को फिर से दोहराया।
दोनों देशों के बीच ड्रोन तकनीक और मिसाइल डिफेंस से जुड़े सहयोग को लेकर भी बातचीत तेज हुई है। यह सहयोग केवल सैन्य तक सीमित नहीं है, बल्कि रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा और खुफिया जानकारी के आदान-प्रदान तक फैला हुआ है।
जयशंकर का संतुलन साधने वाला कूटनीतिक कौशल
भारत की खासियत यह है कि वह एक तरफ इजरायल के साथ अत्याधुनिक हथियारों और रक्षा तकनीक पर काम कर रहा है, तो दूसरी तरफ अरब देशों के साथ ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत कर रहा है। 22 अरब देशों को एक साथ संवाद की मेज पर लाना आसान काम नहीं था, लेकिन जयशंकर ने यह कर दिखाया।
इस संतुलन का सीधा फायदा भारत की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने में दिखाई देता है। खाड़ी देशों से तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है। साथ ही, अरब देशों के साथ मजबूत संबंध भारत को वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।
मिडिल ईस्ट में उभरता भारत एक नया पावर सेंटर
इस बैठक की सह-अध्यक्षता संयुक्त अरब अमीरात ने की, जो अपने आप में यह दर्शाता है कि भारत और खाड़ी देशों के रिश्ते कितने मजबूत हो चुके हैं। जयशंकर ने साफ शब्दों में यह संकेत दिया कि भारत अब जियो-पॉलिटिक्स का एक अहम केंद्र बन चुका है।
भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसे ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनाने की कोशिश कर रहा है। इस लक्ष्य में अरब देशों का समर्थन भारत के लिए बेहद अहम है। यही वजह है कि दिल्ली में हुई इस बैठक को केवल एक औपचारिक कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
सिल्क रूट को चुनौती और IMEC की रणनीति
इस बैठक का एक अहम, लेकिन कम चर्चा में आया पहलू भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे यानी IMEC को लेकर था। यह परियोजना प्राचीन सिल्क रूट को आधुनिक संदर्भ में चुनौती देने की क्षमता रखती है। भारत चाहता है कि अरब देशों का सहयोग लेकर इस आर्थिक गलियारे को फिर से सक्रिय किया जाए, जिससे व्यापार, ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स के नए रास्ते खुल सकें।
अरब देशों की भागीदारी के बिना यह परियोजना संभव नहीं है, और इसी कारण इस बैठक में ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापारिक सहयोग पर गहन चर्चा हुई।
नेतन्याहू का दौरा और उसके संभावित नतीजे
नेतन्याहू के भारत आगमन के बाद इन सभी कूटनीतिक प्रयासों का असर और स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा। भारत एक ऐसे देश के रूप में उभर रहा है, जो इजरायल और अरब जगत दोनों के साथ भरोसेमंद रिश्ते रखता है। यह स्थिति उसे मिडिल ईस्ट में एक अनोखा स्थान देती है।
भारत न तो किसी एक पक्ष का अंध समर्थन करता है और न ही टकराव की राजनीति में विश्वास रखता है। उसकी नीति संवाद, संतुलन और सहयोग पर आधारित है, जो आज के अस्थिर वैश्विक माहौल में बेहद अहम है।
निष्कर्ष: भारत की कूटनीति का नया अध्याय
नई दिल्ली में हुई भारत-अरब विदेश मंत्री बैठक और नेतन्याहू के प्रस्तावित दौरे ने यह साफ कर दिया है कि भारत अब मिडिल ईस्ट की राजनीति में हाशिये पर खड़ा देश नहीं रहा। वह अब उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जो विरोधी शक्तियों के बीच भी संवाद का रास्ता निकाल सकते हैं।
जयशंकर की कूटनीति ने भारत को एक ऐसे पावर सेंटर के रूप में स्थापित किया है, जिसकी बात इजरायल भी सुनता है और अरब देश भी। आने वाले समय में यह भूमिका भारत को वैश्विक राजनीति में और ऊंचे स्थान पर ले जा सकती है।
