कैंसर को लंबे समय तक केवल तंबाकू, शराब, प्रदूषण और असंतुलित खानपान जैसी आदतों से जोड़कर देखा जाता रहा है। आम धारणा यही रही कि जो व्यक्ति इनसे दूरी बनाए रखता है, वह इस गंभीर बीमारी से काफी हद तक सुरक्षित है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और हालिया शोध इस सोच को पूरी तरह बदल रहे हैं। अब यह स्पष्ट हो रहा है कि कैंसर केवल गलत आदतों का परिणाम नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक संरचना, जीवनशैली, जैविक संक्रमण और व्यक्तिगत फैसलों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

इसी विषय पर एक महत्वपूर्ण और आंखें खोल देने वाला व्याख्यान एम्स भोपाल में आयोजित हुआ, जहां देश के प्रतिष्ठित ऑन्कोपैथोलॉजी विशेषज्ञ ने कैंसर के उन कारणों पर प्रकाश डाला, जिन पर आमतौर पर चर्चा नहीं होती। यह व्याख्यान केवल डॉक्टरों या मेडिकल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए था जो अपने भविष्य और स्वास्थ्य को लेकर सजग है।
एम्स भोपाल में विशेषज्ञ का व्याख्यान और गंभीर चेतावनी
एम्स भोपाल के पैथोलॉजी एवं लेबोरेटरी मेडिसिन विभाग द्वारा आयोजित इस शैक्षणिक कार्यक्रम में मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल सेंटर के वरिष्ठ ऑन्कोपैथोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. सुमीत गुजराल विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। अपने विस्तृत संबोधन में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आने वाले वर्षों में कैंसर के मामलों में वृद्धि केवल तंबाकू या शराब के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक और जैविक कारणों से भी होगी।
उन्होंने बताया कि देर से विवाह, देर से संतानोत्पत्ति, असुरक्षित यौन संबंध, बार-बार पार्टनर बदलना, किसिंग के जरिए फैलने वाले वायरस, कमजोर इम्यून सिस्टम और लंबे समय तक शरीर में छुपे रहने वाले संक्रमण भी कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
शरीर में छुपे दुश्मन: वायरस और बैक्टीरिया की भूमिका
डॉ. गुजराल ने बताया कि मानव शरीर में कई ऐसे वायरस और बैक्टीरिया प्रवेश कर जाते हैं, जो शुरुआत में कोई लक्षण नहीं दिखाते। ये संक्रमण वर्षों तक सुप्त अवस्था में रह सकते हैं और धीरे-धीरे कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। यही डीएनए क्षति आगे चलकर कैंसर का रूप ले सकती है।
उन्होंने विशेष रूप से ह्यूमन पैपिलोमा वायरस, एपस्टीन-बार वायरस, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और हेलिकोबैक्टर पाइलोरी जैसे संक्रमणों का उल्लेख किया। ये सभी संक्रमण अलग-अलग अंगों में कैंसर के लिए जिम्मेदार माने जा चुके हैं।
एपस्टीन-बार वायरस और ‘किसिंग डिजीज’ का सच
एपस्टीन-बार वायरस को आम भाषा में ‘किसिंग डिजीज’ कहा जाता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से लार के संपर्क से फैलता है। डॉ. गुजराल ने बताया कि दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत आबादी इस वायरस से कभी न कभी संक्रमित होती है। अधिकतर मामलों में यह वायरस निष्क्रिय रहता है और कोई नुकसान नहीं पहुंचाता।
लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में, जब व्यक्ति का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है या जीवनशैली अस्वस्थ होती है, तब यही वायरस गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। यह हॉजकिन लिंफोमा, बर्किट लिंफोमा और पेट के कैंसर जैसे घातक रोगों से जुड़ा पाया गया है।
एचपीवी, यौन व्यवहार और सर्वाइकल कैंसर
ह्यूमन पैपिलोमा वायरस मुख्य रूप से यौन संपर्क के जरिए फैलता है। डॉ. गुजराल ने बताया कि मल्टीपल सेक्स पार्टनर होने पर इस वायरस के संक्रमण की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यह वायरस विशेष रूप से महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण है, लेकिन पुरुषों में भी यह अन्य प्रकार के कैंसर से जुड़ा हो सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि एचपीवी से बचाव के लिए वैक्सीन उपलब्ध है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अभी भी बड़ी आबादी इसका लाभ नहीं ले पा रही है। समय पर टीकाकरण और सुरक्षित यौन व्यवहार से इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
हेपेटाइटिस: साइलेंट किलर जो बनता है कैंसर
हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी वायरस को डॉ. गुजराल ने ‘साइलेंट किलर’ की संज्ञा दी। ये वायरस लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के शरीर में बने रह सकते हैं। धीरे-धीरे ये लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं और सिरोसिस की स्थिति पैदा करते हैं, जो आगे चलकर लिवर कैंसर में बदल सकती है।
उन्होंने बताया कि हेपेटाइटिस बी के लिए प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध है, जबकि हेपेटाइटिस सी का इलाज संभव है। बावजूद इसके, जांच और जागरूकता की कमी के कारण लोग समय रहते उपचार नहीं करा पाते।
देर से विवाह और संतानोत्पत्ति का कैंसर से संबंध
डॉ. गुजराल ने अपने व्याख्यान में सामाजिक बदलावों पर भी गहरी चिंता जताई। उन्होंने बताया कि शहरीकरण, करियर प्राथमिकता और बदलती जीवनशैली के कारण लोग देर से विवाह और देर से संतानोत्पत्ति का निर्णय ले रहे हैं। इसके चलते महिलाओं के शरीर में लंबे समय तक हार्मोनल बदलाव होते रहते हैं।
ये हार्मोनल असंतुलन ब्रेस्ट और ओवरी कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि जिन महिलाओं ने स्तनपान नहीं कराया, उनमें ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम तुलनात्मक रूप से अधिक देखा गया है।
बुजुर्गों में बढ़ते कैंसर और भविष्य की चुनौती
विशेषज्ञ ने चेतावनी दी कि आने वाले वर्षों में बुजुर्गों से जुड़े कैंसर, जैसे प्रोस्टेट कैंसर और लिवर कैंसर के मामलों में वृद्धि देखने को मिल सकती है। बढ़ती उम्र, कमजोर इम्यून सिस्टम और लंबे समय तक चले संक्रमण इसके प्रमुख कारण होंगे।
उन्होंने कहा कि यदि अभी से जीवनशैली में सुधार, नियमित जांच और समय पर वैक्सीनेशन को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर कैंसर का बोझ और भी बढ़ेगा।
जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
डॉ. गुजराल ने अपने संबोधन का समापन इस बात पर किया कि कैंसर से लड़ाई केवल इलाज से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए जागरूकता, सही जानकारी और समय पर जांच सबसे प्रभावी हथियार हैं। उन्होंने युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक सभी से अपील की कि वे अपने स्वास्थ्य को हल्के में न लें और सामाजिक मिथकों से ऊपर उठकर वैज्ञानिक तथ्यों को अपनाएं।
