भारत के बैंकिंग सेक्टर में लंबे समय से चल रही एक ऐतिहासिक प्रक्रिया अब अपने अंतिम चरण में पहुंचती नजर आ रही है। आईडीबीआई बैंक, जो कभी देश के प्रमुख विकास वित्त संस्थानों में गिना जाता था, उसके निजीकरण को लेकर सरकार ने फाइनल बोली की समयसीमा तय कर दी है। डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट ने शॉर्टलिस्ट किए गए निवेशकों से 5 फरवरी 2026 तक अंतिम वित्तीय बोली जमा करने को कहा है।

यह कदम संकेत देता है कि केंद्र सरकार अब इस लंबे और जटिल विनिवेश प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाने के मूड में है। बैंकिंग सुधारों, सार्वजनिक क्षेत्र के पुनर्गठन और वित्तीय अनुशासन की दिशा में इसे एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
निजीकरण की प्रक्रिया अंतिम चरण में कैसे पहुंची
आईडीबीआई बैंक के विनिवेश की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी। इसकी जड़ें फरवरी 2020 तक जाती हैं, जब केंद्रीय बजट में पहली बार इस बैंक में सरकार की हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव सामने आया था। उस समय बैंक की वित्तीय स्थिति, बढ़ते एनपीए और पूंजी की जरूरत ने सरकार को यह सोचने पर मजबूर किया कि निजी क्षेत्र की भागीदारी के बिना बैंक को लंबे समय तक संभालना मुश्किल होगा।
इसके बाद अक्टूबर 2022 में रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया गया, जिससे यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ी। हालांकि, नियामकीय मंजूरियों, बाजार स्थितियों और निवेशकों की सतर्कता के चलते यह सफर अपेक्षा से ज्यादा लंबा खिंचता चला गया।
कौन-कौन हैं फाइनल रेस में शामिल दावेदार
वर्तमान स्थिति में आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी खरीदने की दौड़ में तीन प्रमुख दावेदार बचे हैं। इनमें एक घरेलू निजी बैंक, एक अंतरराष्ट्रीय बैंक और एक वैश्विक निवेश समूह शामिल हैं। इन तीनों संस्थाओं को अंतिम बोली के लिए आमंत्रण भेज दिया गया है और उन्हें स्पष्ट समयसीमा भी बता दी गई है।
इन निवेशकों का चयन पहले ही कई चरणों की जांच, वित्तीय क्षमता के आकलन और नियामकीय फिट एंड प्रॉपर मानदंडों के आधार पर किया जा चुका है। रिजर्व बैंक की मंजूरी के बाद ही इन्हें इस दौड़ में आगे बढ़ने का मौका मिला।
सेबी नियमों के तहत तय होगी अंतिम कीमत
आईडीबीआई बैंक पहले से ही शेयर बाजार में सूचीबद्ध है। इस वजह से इसके अधिग्रहण की कीमत तय करना किसी निजी सौदे जितना सरल नहीं है। अंतिम बोली की कीमत सेबी के टेकओवर और ओपन ऑफर नियमों के अनुरूप ही तय की जाएगी।
इसका मतलब यह है कि सफल बोलीदाता को न केवल सरकार और एलआईसी की हिस्सेदारी खरीदनी होगी, बल्कि सार्वजनिक शेयरधारकों के लिए भी ओपन ऑफर की प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी। इससे पूरी डील पारदर्शी रहेगी और छोटे निवेशकों के हित सुरक्षित रहेंगे।
बोली खुलने के बाद क्या होगी आगे की प्रक्रिया
फाइनल बोलियां जमा होने के बाद उन्हें तय प्रक्रिया के तहत खोला जाएगा। इस दौरान ट्रांजैक्शन सलाहकार, अंतर-मंत्रालयी समूह के सदस्य और बोलीदाताओं के अधिकृत प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। इसके बाद सबसे ऊंची बोली को चिन्हित किया जाएगा, जिसे एच1 बोली कहा जाएगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, बोली का मूल्यांकन तकनीकी रूप से जटिल नहीं है और इसमें ज्यादा समय नहीं लगता। एक बार एच1 बोली तय हो जाने के बाद प्रस्ताव को अंतर-मंत्रालयी समूह के पास भेजा जाएगा, जहां से सिफारिश के बाद इसे वित्त मंत्री की मंजूरी के लिए आगे बढ़ाया जाएगा।
मार्च 2026 तक मिल सकता है विजेता
अगर सभी प्रक्रियाएं तय समयसीमा के अनुसार पूरी होती हैं, तो मार्च 2026 तक आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के लिए विजेता बोलीदाता की पहचान हो सकती है। इसके बाद अंतिम मंजूरी के लिए प्रस्ताव को कैबिनेट के पास भेजा जाएगा।
यह चरण औपचारिक रूप से निजीकरण की दिशा में आखिरी राजनीतिक और प्रशासनिक स्वीकृति होगा। इसके बाद ही बैंक के मालिकाना हक के हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हो पाएगी।
भुगतान और स्वामित्व हस्तांतरण की शर्तें
रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल के अनुसार, सफल बोलीदाता को पूरी राशि नकद में चुकानी होगी। यह भुगतान एक निश्चित समयसीमा के भीतर करना अनिवार्य होगा। जब तक पूरी राशि जमा नहीं हो जाती, तब तक बैंक की अंतिम जिम्मेदारी नए मालिक को नहीं सौंपी जाएगी।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि निजीकरण के बाद भी आईडीबीआई बैंक की पहचान और ब्रांड वैल्यू को बनाए रखने पर जोर दिया जा सकता है। इसका उद्देश्य ग्राहकों और कर्मचारियों के बीच भरोसा कायम रखना है।
सरकार और एलआईसी कितनी हिस्सेदारी बेचेंगी
विनिवेश योजना के तहत भारत सरकार और लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया मिलकर आईडीबीआई बैंक में अपनी बहुलांश हिस्सेदारी बेचेंगे। सरकार अपनी लगभग 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी और एलआईसी करीब 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी का विनिवेश करेगी।
इस तरह कुल मिलाकर 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी निजी निवेशक के पास जाएगी, जिससे बैंक का प्रबंधन नियंत्रण पूरी तरह नए मालिक के हाथ में चला जाएगा।
कर्मचारियों और ग्राहकों की चिंता
आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की चर्चा के साथ ही कर्मचारियों और ग्राहकों के मन में कई सवाल उठते रहे हैं। कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा, सेवा शर्तों और भविष्य की भूमिका को लेकर आशंकाएं हैं। वहीं ग्राहक यह जानना चाहते हैं कि बैंक की सेवाओं, शाखाओं और उत्पादों पर इसका क्या असर पड़ेगा।
सरकार और प्रबंधन की ओर से समय-समय पर यह भरोसा दिलाया गया है कि ग्राहकों के हितों की रक्षा की जाएगी और बैंकिंग सेवाओं में कोई अचानक बदलाव नहीं होगा।
बैंकिंग सुधारों के बड़े एजेंडे का हिस्सा
आईडीबीआई बैंक का निजीकरण केवल एक बैंक की कहानी नहीं है। यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुधार, पूंजी जुटाने और सरकारी संसाधनों के बेहतर उपयोग की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
सरकार का मानना है कि निजी क्षेत्र की दक्षता, तकनीक और पूंजी के जरिए ऐसे बैंकों को दोबारा प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
निष्कर्ष
आईडीबीआई बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। छह साल से ज्यादा समय से चल रही इस कवायद के बाद अब सरकार ने फाइनल बोली की समयसीमा तय कर दी है। आने वाले हफ्ते यह तय करेंगे कि बैंक का भविष्य किसके हाथों में जाएगा।
यह फैसला न केवल बैंकिंग सेक्टर के लिए, बल्कि देश की आर्थिक नीति और सार्वजनिक संपत्तियों के प्रबंधन के नजरिए से भी ऐतिहासिक साबित हो सकता है।
