दुनिया एक बार फिर उस दौर की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, जहां परमाणु हथियारों को लेकर अनिश्चितता और अविश्वास का माहौल गहराता जा रहा है। शीत युद्ध के बाद बनी कई व्यवस्थाएं अब कमजोर पड़ती नजर आ रही हैं और हथियार नियंत्रण की पुरानी संधियां धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका ने रूस और चीन को साथ लेकर एक नई त्रिपक्षीय परमाणु संधि की मांग उठाई है, जिसने वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर दी है।

अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों पर नियंत्रण रखने वाली न्यू स्टार्ट संधि के खत्म होने के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि अब दुनिया किस दिशा में जाएगी। यह संधि वर्षों तक दोनों देशों के परमाणु हथियारों की संख्या और तैनाती पर एक तरह की लगाम लगाए हुए थी। इसके खत्म होते ही परमाणु हथियारों की नई होड़ का खतरा एक बार फिर सामने आ गया है।
न्यू स्टार्ट संधि का अंत और उसका महत्व
न्यू स्टार्ट समझौता अमेरिका और रूस के बीच रणनीतिक परमाणु हथियारों को सीमित करने के लिए किया गया था। इसके तहत दोनों देश अपने तैनात परमाणु हथियारों और लॉन्च सिस्टम की संख्या पर नियंत्रण रखते थे और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए निरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं भी थीं। यह संधि केवल दो देशों का मामला नहीं थी, बल्कि वैश्विक रणनीतिक स्थिरता की एक अहम आधारशिला मानी जाती थी।
जब यह संधि समाप्त हुई, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह चिंता पैदा हो गई कि अब कोई ऐसी बाधा नहीं बची है जो परमाणु हथियारों की संख्या को नियंत्रित कर सके। इसी संदर्भ में अमेरिका ने यह तर्क देना शुरू किया कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में केवल द्विपक्षीय संधियां पर्याप्त नहीं हैं।
ट्रंप प्रशासन की नई सोच
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट किया कि वह रूस के साथ पुरानी शर्तों पर समझौते को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय अमेरिका एक ऐसी नई संधि चाहता है जिसमें चीन को भी शामिल किया जाए। अमेरिकी नेतृत्व का मानना है कि चीन की तेजी से बढ़ती सैन्य और परमाणु शक्ति को नजरअंदाज कर कोई भी नई व्यवस्था अधूरी होगी।
अमेरिका का कहना है कि बीते वर्षों में चीन ने अपने परमाणु हथियारों के जखीरे में तेजी से इजाफा किया है और यह प्रक्रिया काफी हद तक गोपनीय तरीके से चल रही है। ऐसे में यदि केवल अमेरिका और रूस ही हथियार नियंत्रण की जिम्मेदारी उठाते हैं, तो वैश्विक संतुलन बिगड़ सकता है।
अमेरिका का तर्क और चीन पर आरोप
अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने यह तर्क दिया है कि हथियार नियंत्रण अब केवल दो देशों के बीच का मुद्दा नहीं रह गया है। उनका कहना है कि जिन देशों के पास रणनीतिक क्षमता बढ़ रही है, उन्हें भी वैश्विक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इस संदर्भ में चीन का नाम सबसे ऊपर रखा जा रहा है।
अमेरिका का आरोप है कि चीन अपने परमाणु कार्यक्रम में पारदर्शिता नहीं रखता और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट जानकारी साझा करने से बचता है। यह भी कहा गया है कि चीन कानूनी रूप से बाध्यकारी अमेरिकी-रूसी समझौतों का फायदा उठाकर अपने हथियारों के जखीरे का विस्तार कर रहा है।
चीन की प्रतिक्रिया और साफ इनकार
अमेरिका की इस मांग के तुरंत बाद चीन की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई। बीजिंग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह इस स्तर पर किसी भी परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता में शामिल होने की योजना नहीं बना रहा है। चीन का कहना है कि जिन देशों के पास सबसे बड़े परमाणु हथियारों का जखीरा है, उनकी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है और उन्हें पहले अपने दायित्व निभाने चाहिए।
चीन के राजनयिकों ने अमेरिकी आरोपों को गैर जिम्मेदाराना बताते हुए खारिज कर दिया। उनका कहना है कि चीन की परमाणु नीति रक्षात्मक रही है और उसने हमेशा न्यूनतम प्रतिरोध की रणनीति अपनाई है। बीजिंग का तर्क है कि वह अपनी सुरक्षा जरूरतों के अनुसार ही कदम उठाता है।
रूस की स्थिति और वैकल्पिक प्रस्ताव
रूस ने भी इस पूरे घटनाक्रम में अपनी अलग स्थिति रखी है। मॉस्को का कहना है कि यदि नई संधि की बात होती है, तो उसमें केवल चीन ही नहीं बल्कि अन्य परमाणु-सशस्त्र देशों को भी शामिल किया जाना चाहिए। रूस के अनुसार ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों को बाहर रखकर कोई भी व्यापक समझौता अधूरा रहेगा।
रूस और अमेरिका मिलकर दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक परमाणु हथियारों को नियंत्रित करते हैं। यही वजह है कि इन दोनों देशों की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा मानी जाती है। लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों में अन्य देशों की भूमिका भी बढ़ती जा रही है।
परमाणु हथियारों की नई होड़ का खतरा
न्यू स्टार्ट संधि के खत्म होने के बाद सबसे बड़ा डर यह है कि दुनिया एक नई हथियार दौड़ की ओर बढ़ सकती है। जब कोई कानूनी या राजनीतिक बंधन नहीं होता, तो देशों के लिए अपने सैन्य कार्यक्रमों को तेज करना आसान हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका, रूस और चीन के बीच कोई साझा ढांचा नहीं बन पाया, तो आने वाले वर्षों में परमाणु हथियारों की संख्या और तैनाती दोनों में इजाफा हो सकता है। इसका सीधा असर वैश्विक सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ेगा।
चीन के परमाणु कार्यक्रम पर सवाल
अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी आरोप लगाया है कि चीन गुप्त तरीके से परमाणु परीक्षण कर रहा है। उनका कहना है कि चीन ने अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पालन किए बिना अपने कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है और विस्फोटों को अस्पष्ट तरीके से अंजाम देकर उन्हें छिपाने की कोशिश की गई है।
अमेरिका का दावा है कि आने वाले वर्षों में चीन अपने परमाणु हथियारों की संख्या को हजार तक पहुंचा सकता है। यह आंकड़ा कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और आकलनों पर आधारित बताया जा रहा है।
वैश्विक संस्थानों की भूमिका
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। निरस्त्रीकरण से जुड़े सम्मेलन अब पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं, क्योंकि पुराने ढांचे कमजोर पड़ चुके हैं।
हालांकि समस्या यह है कि जब बड़े देश आपसी सहमति नहीं बना पाते, तो वैश्विक संस्थाओं की भूमिका सीमित हो जाती है। यही वजह है कि नई परमाणु व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
दुनिया के लिए इसके मायने
यह विवाद केवल अमेरिका, रूस और चीन तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ने का मतलब है कि किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष के वैश्विक युद्ध में बदलने का खतरा बढ़ जाएगा।
छोटे और मध्यम देश भी इस स्थिति से प्रभावित होंगे, क्योंकि वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव का असर आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता पर पड़ता है।
आगे की राह क्या होगी
फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। अमेरिका नई त्रिपक्षीय संधि की बात कर रहा है, चीन साफ इनकार कर चुका है और रूस अपनी शर्तें रख रहा है। ऐसे में निकट भविष्य में किसी व्यापक समझौते की संभावना कम ही नजर आती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अनौपचारिक बातचीत और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। लेकिन जब तक तीनों देशों के हित एक साझा बिंदु पर नहीं मिलते, तब तक वैश्विक परमाणु व्यवस्था अस्थिर बनी रह सकती है।
निष्कर्ष
न्यू स्टार्ट संधि के खत्म होने के बाद दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां पुराने नियम काम नहीं कर रहे और नए नियम अभी बने नहीं हैं। अमेरिका की त्रिपक्षीय परमाणु संधि की मांग और चीन का इनकार इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में परमाणु राजनीति और जटिल हो सकती है।
यह केवल कूटनीति की परीक्षा नहीं है, बल्कि वैश्विक नेतृत्व और जिम्मेदारी की भी कसौटी है। दुनिया की नजर अब इस पर टिकी है कि क्या बड़े देश मिलकर नई व्यवस्था बना पाएंगे या परमाणु अस्थिरता का दौर और गहरा होगा।
