जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अक्सर बड़े मुद्दे सीमा, सुरक्षा, आतंकवाद या विकास को लेकर सामने आते रहे हैं, लेकिन इस बार विवाद किसी नीति या कानून से ज्यादा एक शब्द, एक क्षेत्रीय पहचान और एक ऐतिहासिक नाम को लेकर खड़ा हो गया। विधानसभा के भीतर दिया गया एक बयान देखते ही देखते ऐसा मुद्दा बन गया, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष को आमने-सामने खड़ा कर दिया। यह पूरा विवाद पीर पंजाल क्षेत्र के अस्तित्व, उसकी पहचान और उससे जुड़ी भावनाओं को लेकर है।

राजनीति में कई बार शब्द साधारण नहीं होते। वे इतिहास, भूगोल और लोगों की स्मृतियों से जुड़े होते हैं। पीर पंजाल भी ऐसा ही एक नाम है, जो केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि वहां रहने वाले हजारों लोगों की सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान का प्रतीक माना जाता है।
विधानसभा में उठी चिंगारी कैसे बनी बड़ा विवाद
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में उस समय हंगामा मच गया, जब नेता प्रतिपक्ष और भाजपा विधायक सुनील शर्मा ने एक चर्चा के दौरान यह टिप्पणी कर दी कि उन्हें यह नहीं पता कि पीर पंजाल नाम का कोई क्षेत्र आखिर है क्या। उनका यह कथन उस समय आया, जब पीर पंजाल क्षेत्र में एक राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग पर सवाल किया गया था।
यह टिप्पणी सुनते ही सदन का माहौल बदल गया। सत्ता पक्ष के विधायकों के साथ-साथ इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं ने इसे न केवल भौगोलिक अज्ञानता, बल्कि क्षेत्र के लोगों की पहचान और सम्मान पर हमला बताया। देखते ही देखते यह बयान केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी न रहकर एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले बैठा।
पीर पंजाल आखिर है क्या और कहां स्थित है
पीर पंजाल कोई नया या काल्पनिक शब्द नहीं है। यह पश्चिमी हिमालय की एक महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला का नाम है, जो उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप के निचले हिमालयी क्षेत्र में स्थित है। यह पर्वतमाला दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की दिशा में फैली हुई है और ब्यास तथा नीलम-किशनगंगा नदियों के बीच प्राकृतिक सीमा बनाती है।
यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर दोनों में फैला हुआ है। इसका उत्तर-पश्चिमी सिरा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर तक जाता है। यही कारण है कि पीर पंजाल केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि रणनीतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है।
इन्हीं पहाड़ों से होकर ब्यास, रावी, झेलम और चेनाब जैसी प्रमुख नदियां बहती हैं, जो उत्तर भारत की कृषि और जीवनरेखा मानी जाती हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक संदर्भ में पीर पंजाल
राजनीतिक रूप से जम्मू-कश्मीर में राजौरी और पुंछ जिलों को आम तौर पर पीर पंजाल क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है, जबकि रामबन, डोडा और किश्तवाड़ जिलों को चेनाब घाटी के रूप में पहचाना जाता है। यही क्षेत्रीय वर्गीकरण इस पूरे विवाद की जड़ में है।
कुछ राजनीतिक दल और क्षेत्रीय नेता मानते हैं कि इन पहाड़ी और दूरस्थ इलाकों को प्रशासनिक और विकास के स्तर पर पर्याप्त ध्यान नहीं मिला है। इसी भावना के तहत अलग पहचान और अलग प्रशासनिक संरचना की मांग समय-समय पर उठती रही है।
पीर पंजाल नाम की ऐतिहासिक जड़ें
पीर पंजाल नाम का उल्लेख कोई आधुनिक राजनीतिक गढ़ंत नहीं है। इसका ऐतिहासिक संदर्भ बारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध इतिहासकार और कवि कल्हण के ग्रंथ राजतरंगिणी में मिलता है। राजतरंगिणी में कश्मीर के राजा श्रीवर के शासनकाल का उल्लेख करते हुए पीर पंजाल दर्रे का जिक्र किया गया है।
इतिहासकारों का मानना है कि इस क्षेत्र का नामकरण पीर पंजाल दर्रे के आधार पर हुआ। प्रसिद्ध विद्वान एम ए स्टाइन के अनुसार, इस क्षेत्र के इस्लामीकरण के बाद संभव है कि किसी स्थानीय देवता की अवधारणा को पीर की अवधारणा में बदला गया हो और धीरे-धीरे यह नाम प्रचलन में आ गया।
यह तथ्य इस बात को रेखांकित करता है कि पीर पंजाल नाम किसी राजनीतिक एजेंडे का परिणाम नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान है।
बयान पर क्यों भड़के विधायक
जब सुनील शर्मा ने यह कहा कि उन्होंने पीर पंजाल नाम का क्षेत्र किसी शब्दकोश में नहीं सुना, तो यह टिप्पणी राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायकों को अपमानजनक लगी। उनका कहना था कि यह बयान न केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के अस्तित्व को नकारता है, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की पहचान और इतिहास को भी खारिज करता है।
सत्तारूढ़ दल के कई विधायकों ने सदन में खड़े होकर माफी की मांग की। उनका कहना था कि ऐसे बयान से सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है।
भाजपा का पक्ष और तर्क
भाजपा विधायकों का तर्क अलग था। उनका कहना था कि जम्मू-कश्मीर एक इकाई है और क्षेत्रीय नामों के आधार पर लोगों को बांटना सही नहीं है। उनके अनुसार पीर पंजाल या चेनाब जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्षेत्रवाद को बढ़ावा देता है, जो राज्य की एकता के खिलाफ है।
सुनील शर्मा ने बाद में यह भी आरोप लगाया कि पीर पंजाल जैसे शब्द कुछ क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़कर एक नई राजनीतिक पहचान गढ़ना है। उन्होंने इसे ‘ग्रेटर कश्मीर’ जैसी अवधारणा से जोड़ते हुए खारिज कर दिया।
विवाद के पीछे की पृष्ठभूमि
यह विवाद अचानक नहीं उभरा। इसके पीछे हाल के महीनों की राजनीतिक गतिविधियां भी हैं। कुछ सप्ताह पहले पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने राजौरी और पुंछ जिलों को चेनाब घाटी के जिलों के साथ मिलाकर एक अलग प्रशासनिक प्रभाग बनाने की मांग की थी।
उनका तर्क था कि ये सभी इलाके पहाड़ी हैं, दूरस्थ हैं और बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा था कि अलग प्रशासनिक ढांचे से इन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा।
इस मांग का भाजपा ने कड़ा विरोध किया था। माना जा रहा है कि मौजूदा विवाद उसी बहस की अगली कड़ी है।
पीर पंजाल और चेनाब घाटी के लोगों की शिकायतें
राजौरी और पुंछ जिले कश्मीर घाटी के दक्षिण में और नियंत्रण रेखा के नजदीक स्थित हैं। यह क्षेत्र सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां रहने वाले लोग लंबे समय से यह शिकायत करते आए हैं कि विकास, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक ध्यान के मामले में उन्हें नजरअंदाज किया गया है।
इसी तरह चेनाब घाटी के डोडा, किश्तवाड़ और रामबन जिले भी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से गुजरते हैं। चेनाब नदी द्वारा तराशे गए ये इलाके ऊबड़-खाबड़ हैं और यहां तक पहुंचना आसान नहीं है।
इन क्षेत्रों के लोगों का मानना है कि जम्मू डिवीजन और कश्मीर घाटी के बीच उनका इलाका अक्सर प्राथमिकताओं से बाहर रह जाता है।
सीमावर्ती इलाकों की संवेदनशीलता और बलिदान
विवाद के दौरान कई विधायकों ने इस बात पर जोर दिया कि पीर पंजाल और चेनाब घाटी के इलाके सीमावर्ती हैं और यहां के लोगों ने समय-समय पर भारी बलिदान दिए हैं। राजौरी जिले के थानामंडी से निर्दलीय विधायक मुजफ्फर इकबाल खान ने सदन में कहा कि इस तरह के बयान सीमावर्ती इलाकों के लोगों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाते हैं।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि हाल के सैन्य अभियानों के दौरान पुंछ जैसे इलाकों में आम नागरिकों ने जान गंवाई है। ऐसे में इन क्षेत्रों की पहचान पर सवाल उठाना उनके बलिदानों का अपमान माना जा रहा है।
माफी की मांग और इनकार
सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने सुनील शर्मा से सार्वजनिक माफी की मांग की। उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और वन मंत्री जावेद राणा, जो दोनों इसी क्षेत्र से आते हैं, ने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां अस्वीकार्य हैं।
हालांकि शर्मा ने माफी मांगने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्होंने किसी समुदाय या क्षेत्र का अपमान करने के इरादे से यह बयान नहीं दिया, बल्कि क्षेत्रीय विभाजन की राजनीति पर सवाल उठाया है।
राजनीतिक विवाद से आगे की तस्वीर
यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है। यह जम्मू-कश्मीर की जटिल सामाजिक, भौगोलिक और राजनीतिक संरचना को भी उजागर करता है। यहां हर क्षेत्र की अपनी पहचान, समस्याएं और अपेक्षाएं हैं।
पीर पंजाल और चेनाब घाटी जैसे इलाकों की मांगें विकास, प्रतिनिधित्व और सम्मान से जुड़ी हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ दल इन मांगों को क्षेत्रीय राजनीति का हिस्सा मानते हैं।
भविष्य में क्या असर पड़ेगा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर की राजनीति में और गहराई से असर डाल सकता है। क्षेत्रीय पहचान का सवाल संवेदनशील होता है और यदि इसे संतुलित तरीके से नहीं संभाला गया, तो यह सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकता है।
साथ ही यह मुद्दा प्रशासनिक पुनर्गठन और विकास योजनाओं पर भी असर डाल सकता है। यदि सरकार इन क्षेत्रों की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देती है, तो विवाद की तीव्रता कम हो सकती है।
निष्कर्ष
पीर पंजाल विवाद ने यह साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर में शब्दों का भी वजन होता है। एक टिप्पणी पूरे सदन को हिला सकती है, क्योंकि वह इतिहास, भूगोल और जनभावनाओं से जुड़ी होती है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह संदेश भी मिलता है कि राजनीतिक बहस में क्षेत्रीय संवेदनशीलता को समझना और सम्मान देना कितना जरूरी है। यदि संवाद और समझदारी के साथ इस मुद्दे को आगे बढ़ाया गया, तो यह विवाद समाधान की दिशा भी ले सकता है, अन्यथा यह लंबे समय तक सियासी तनाव का कारण बन सकता है।
