डिजिटल युग में अपराध के तरीके जितनी तेजी से बदल रहे हैं, उतनी ही चुनौती कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने खड़ी हो रही है। इंटरनेट, मोबाइल बैंकिंग और ऑनलाइन निवेश के बढ़ते चलन के साथ साइबर ठगी के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे ही एक जटिल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले साइबर ठगी नेटवर्क का भोपाल पुलिस ने खुलासा किया है, जिसमें दुबई में बैठे साइबर ठगों को भारत से बैंक खाते उपलब्ध कराए जा रहे थे।

इस पूरे नेटवर्क की एक अहम कड़ी केरल निवासी निजामुद्दीन था, जिसे भोपाल पुलिस की क्राइम ब्रांच की साइबर सेल ने कालीकट एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी न केवल एक फरार आरोपी की पकड़ है, बल्कि साइबर ठगी के उस मॉडल को उजागर करती है, जिसके जरिए विदेश में बैठे अपराधी भारत के आम नागरिकों को अपना शिकार बना रहे थे।
दो साल पुराना मामला और 9.35 लाख रुपये की ठगी
इस कार्रवाई की जड़ें वर्ष 2024 में दर्ज एक साइबर ठगी के मामले से जुड़ी हैं। उस समय भोपाल में निवेश के नाम पर 9.35 लाख रुपये की ठगी की शिकायत सामने आई थी। पीड़ित को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए आकर्षक मुनाफे का झांसा दिया गया और धीरे-धीरे उससे बड़ी रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवा ली गई।
शिकायत दर्ज होने के बाद भोपाल पुलिस ने जांच शुरू की, लेकिन शुरुआती जांच में सामने आए खाते और मोबाइल नंबर लगातार बदलते रहे। इससे यह साफ हो गया कि मामला किसी संगठित गिरोह से जुड़ा हुआ है, जो तकनीकी समझ और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का इस्तेमाल कर रहा है।
बैंक खातों की खरीद-फरोख्त का खतरनाक खेल
जांच में सामने आया कि निजामुद्दीन का काम बेहद सुनियोजित और खतरनाक था। वह केरल के अलग-अलग इलाकों में ऐसे लोगों की तलाश करता था, जो कुछ पैसों के लालच में अपने बैंक खाते, एटीएम कार्ड और उससे जुड़े दस्तावेज देने को तैयार हो जाएं। कई मामलों में लोगों को यह भी नहीं बताया जाता था कि उनके खाते किस काम में इस्तेमाल होंगे।
इन खातों को वह दुबई में बैठे साइबर ठगों को बेच देता था। ठगी की रकम जब इन खातों में आती थी, तो वह सीधे ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के बजाय एटीएम से नकद निकालने की व्यवस्था करता था। इसका उद्देश्य यह था कि मुख्य मास्टरमाइंड तक डिजिटल ट्रेल न पहुंचे और जांच एजेंसियां असली अपराधियों तक न पहुंच सकें।
दुबई कनेक्शन और एटीएम से नकदी निकालने की रणनीति
पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि ठगी की रकम को दुबई तक पहुंचाने के लिए बेहद चालाक तरीका अपनाया जाता था। रकम बैंक खातों में आने के बाद उसे एटीएम से नकद निकाल लिया जाता था और फिर हवाला या अन्य अनौपचारिक माध्यमों से दुबई भेज दिया जाता था।
इस प्रक्रिया में न तो सीधे अंतरराष्ट्रीय बैंक ट्रांसफर का इस्तेमाल होता था और न ही ऐसे डिजिटल साधन, जिनसे आसानी से ट्रैकिंग हो सके। यही वजह थी कि पुलिस को शुरुआती दौर में मास्टरमाइंड तक पहुंचने में कठिनाई हो रही थी।
फरारी, लुकआउट सर्कुलर और गिरफ्तारी की कहानी
जब जांच तेज हुई और निजामुद्दीन की भूमिका स्पष्ट होने लगी, तब वह फरार हो गया। पुलिस को सूचना मिली कि वह दुबई भागने की फिराक में है। इसके बाद उसके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया, ताकि वह देश से बाहर न जा सके।
लगातार निगरानी और तकनीकी इनपुट के आधार पर भोपाल क्राइम ब्रांच की साइबर सेल को यह जानकारी मिली कि निजामुद्दीन केरल के कालीकट एयरपोर्ट से विदेश जाने की कोशिश कर रहा है। सही समय पर कार्रवाई करते हुए पुलिस टीम ने उसे एयरपोर्ट से ही गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी साइबर अपराध के खिलाफ चल रही मुहिम में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है।
पूछताछ में खुल सकते हैं बड़े नाम
गिरफ्तारी के बाद निजामुद्दीन से गहन पूछताछ की जा रही है। पुलिस का मानना है कि उसके जरिए दुबई में बैठे साइबर ठगों और भारत में सक्रिय अन्य बिचौलियों की जानकारी मिल सकती है। यह भी संभावना जताई जा रही है कि इस नेटवर्क से जुड़े कई अन्य खाते और लोग अभी जांच के दायरे में नहीं आए हैं।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, निजामुद्दीन अकेले काम नहीं कर रहा था। उसके संपर्क कई राज्यों में फैले हुए थे और वह साइबर ठगी के इस नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
साइबर ठगी का बदलता स्वरूप और बढ़ती चुनौती
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि साइबर अपराध अब केवल कॉल या मैसेज तक सीमित नहीं रह गए हैं। अब ये अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं, जहां एक देश में बैठे अपराधी दूसरे देश के लोगों को निशाना बना रहे हैं और तीसरे देश के माध्यम से पैसा घुमाया जा रहा है।
ऐसे मामलों में बैंक खातों की खरीद-फरोख्त एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। कई लोग मामूली लालच में अपने खाते दूसरों को दे देते हैं, लेकिन बाद में वही खाते गंभीर अपराधों में इस्तेमाल होते हैं और कानूनी मुश्किलें उनके लिए खड़ी हो जाती हैं।
आम नागरिकों के लिए सबक
इस पूरे मामले से आम नागरिकों के लिए एक बड़ा सबक निकलता है। किसी भी कीमत पर अपने बैंक खाते, एटीएम कार्ड, ओटीपी या केवाईसी दस्तावेज किसी को भी देना बेहद खतरनाक हो सकता है। कुछ हजार रुपये के लालच में लिया गया यह फैसला भविष्य में कानूनी परेशानी और आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है।
पुलिस लगातार लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसके बावजूद ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। डिजिटल साक्षरता और सतर्कता ही साइबर ठगी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।
भोपाल पुलिस की रणनीति और आगे की कार्रवाई
भोपाल पुलिस की साइबर सेल अब इस मामले को अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार से खंगाल रही है। जिन खातों में ठगी की रकम आई थी, उनकी पूरी चेन तैयार की जा रही है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि कितने अन्य मामलों में इसी नेटवर्क का इस्तेमाल हुआ है।
पुलिस का फोकस अब केवल बिचौलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुबई में बैठे मास्टरमाइंड तक पहुंचने की रणनीति बनाई जा रही है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और तकनीकी सहयोग का सहारा लिया जा सकता है।
निष्कर्ष
केरल से गिरफ्तार निजामुद्दीन का मामला यह दिखाता है कि साइबर ठगी अब स्थानीय अपराध नहीं रही, बल्कि एक संगठित और वैश्विक चुनौती बन चुकी है। भोपाल पुलिस की यह कार्रवाई न केवल एक आरोपी की गिरफ्तारी है, बल्कि उन हजारों संभावित पीड़ितों के लिए राहत है, जो भविष्य में ऐसे जाल में फंस सकते थे।
डिजिटल युग में सुरक्षा केवल तकनीक से नहीं, बल्कि जागरूकता और जिम्मेदारी से भी आती है। यह मामला इसी सच्चाई की एक बड़ी मिसाल है।
