बॉलीवुड की चमक-दमक के पीछे छिपे संघर्ष की कहानियां अक्सर लोगों को प्रेरित करती हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो सपनों की कीमत और मेहनत की असली परिभाषा समझा देती हैं। नोरा फतेही की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज जिन स्टेजों पर तालियों की गूंज होती है, जिन गानों पर करोड़ों लोग झूमते हैं और जिन डांस मूव्स को देखकर लोग उन्हें “डांसिंग क्वीन” कहते नहीं थकते, उसी मुकाम तक पहुंचने के लिए नोरा ने भूख, तानों, अकेलेपन और असुरक्षा का लंबा दौर झेला है।

कनाडा के टोरंटो में जन्मी नोरा फतेही का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। उनका परिवार रूढ़िवादी सोच वाला था, जहां डांस को करियर के रूप में देखना आसान नहीं था। घर में डांस को लेकर सख्ती थी और यही वजह थी कि नोरा को अपने सपने को छुपाकर जीना पड़ा। वह अपने कमरे में दरवाजा बंद करके चुपचाप डांस की प्रैक्टिस करती थीं, ताकि परिवार को इसकी भनक तक न लगे। उस वक्त वह नहीं जानती थीं कि यही छुपा हुआ सपना एक दिन उनकी पहचान बन जाएगा।
नोरा को बचपन से ही फिल्मों और खासतौर पर बॉलीवुड के गानों में दिलचस्पी थी। वह हिंदी सिनेमा के गाने देखकर उनके स्टेप्स कॉपी करने की कोशिश करती थीं। खास बात यह है कि उन्होंने कभी किसी प्रोफेशनल डांस अकादमी से ट्रेनिंग नहीं ली। इंटरनेट और वीडियो ही उनके गुरु बने। बैली डांस जैसी कठिन कला उन्होंने खुद ही सीख ली, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। इसी वजह से नोरा को महज 16 साल की उम्र में ही नौकरी करनी पड़ी। उनकी पहली नौकरी कनाडा के एक जेंट्स शॉपिंग मॉल में थी, जहां वह हाई स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ काम करती थीं। उस मॉल में उन्हें स्टोर संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी। यह दौर उनके लिए सीखने का था, जहां उन्होंने मेहनत, अनुशासन और आत्मनिर्भरता का मतलब समझा।
इसके बाद उन्होंने कई तरह की नौकरियां कीं। कभी वह सेल्स गर्ल बनीं, तो कभी कॉफी शॉप में वेट्रेस के तौर पर काम किया। ग्राहकों को कॉफी सर्व करना, घंटों खड़े रहना और कम सैलरी में काम करना उनके लिए मजबूरी थी। इसी दौरान उन्होंने टेलीकॉलर की नौकरी भी की, जहां वह लॉटरी टिकट बेचा करती थीं। इस काम में उन्हें बेस सैलरी के साथ इंसेंटिव भी मिलता था, लेकिन मानसिक दबाव बहुत ज्यादा था। लगातार कॉल करना, लोगों की बातें सुनना और रिजेक्शन झेलना आसान नहीं था। यह नौकरी उन्होंने करीब छह महीने तक की, फिर दूसरी नौकरी की तलाश शुरू की।
नोरा के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्होंने भारत आने का फैसला किया। कनाडा जैसी सुविधाजनक जिंदगी छोड़कर एक अनजान देश में सपनों के पीछे भागना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था। नोरा भारत सिर्फ 5,000 रुपये लेकर आई थीं। उनके पास न कोई मजबूत संपर्क था, न कोई गारंटी कि उन्हें काम मिलेगा। मुंबई पहुंचकर उन्हें असली संघर्ष का सामना करना पड़ा।
शुरुआती दिनों में वह नौ लोगों के साथ एक तीन बेडरूम के फ्लैट में रहती थीं। उन्हें दो अन्य लड़कियों के साथ एक कमरा शेयर करना पड़ता था। निजी जगह न के बराबर थी और हालात मानसिक रूप से बेहद थका देने वाले थे। उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि कई बार उन्हें लगता था कि उन्होंने भारत आकर बहुत बड़ी गलती कर दी है। डर, असुरक्षा और भविष्य की चिंता उन्हें हर वक्त घेरे रहती थी।
भाषा भी उनके लिए सबसे बड़ी बाधा थी। हिंदी न आने की वजह से ऑडिशन देना मुश्किल हो जाता था। कई बार लोग उनका मजाक उड़ाते थे और भद्दे कमेंट्स करते थे। वह रोती थीं, टूटती थीं, लेकिन हार मानने को तैयार नहीं थीं। डांस ही उनका सहारा था, जो उन्हें हर बार फिर से खड़ा करता था।
इस दौर में आर्थिक तंगी इतनी थी कि नोरा दिन में सिर्फ एक अंडा और रोटी खाकर गुजारा करती थीं। उनका कहना रहा है कि एजेंट उनके काम का बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में ले लेते थे और उनके हाथ में बहुत कम पैसे बचते थे। फिर भी वह ऑडिशन देती रहीं, सीखती रहीं और खुद को बेहतर बनाती रहीं।
उनके करियर में असली बदलाव उस वक्त आया, जब उन्हें रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ में वाइल्ड कार्ड एंट्री मिली। शुरुआत में वहां भी उन्हें खुद को साबित करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे उनके डांस और आत्मविश्वास ने दर्शकों का दिल जीत लिया। यह शो उनके लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। पहली बार लोग उन्हें सिर्फ एक विदेशी लड़की के रूप में नहीं, बल्कि एक मेहनती कलाकार के रूप में देखने लगे।
‘बिग बॉस’ के बाद नोरा के लिए अवसरों के दरवाजे खुलने लगे। उन्हें फिल्मों में आइटम सॉन्ग्स मिलने लगे, जिसने उनकी किस्मत बदल दी। ‘दिलबर दिलबर’, ‘ओ साकी साकी’, ‘कमरिया’ जैसे गानों ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया। उनके डांस स्टेप्स, एक्सप्रेशन और स्क्रीन प्रेजेंस ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।
आज नोरा फतेही सोशल मीडिया पर भी बड़ी हस्ती हैं। उनके डांस वीडियो लाखों-करोड़ों बार देखे जाते हैं और हर नया स्टेप ट्रेंड बन जाता है। लेकिन इस सफलता के पीछे छिपा संघर्ष आज भी उनकी कहानी का सबसे अहम हिस्सा है।
नोरा फतेही की यह यात्रा सिर्फ एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस जज्बे की मिसाल है, जो हालात से हार मानने से इनकार कर देता है। एक अंडे और रोटी पर गुजारा करने वाली लड़की आज दुनिया भर में अपनी कला का लोहा मनवा रही है।
