मध्य प्रदेश में सड़क सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और दूरगामी बदलाव होने जा रहा है। राज्य के स्टेट हाईवे और प्रमुख जिला सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं के बाद अब पीड़ितों को मदद के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा। मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम यानी एमपीआरडीसी अपने एक्सीडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम को पूरी तरह आधुनिक स्वरूप में अपग्रेड कर रहा है। इस नई व्यवस्था को एआरएस 3.0 नाम दिया गया है, जो तकनीक, डेटा और आपातकालीन सेवाओं के बेहतर समन्वय का उदाहरण बनेगा।

यह अपग्रेड सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि हजारों जानें बचाने की दिशा में एक सुनियोजित प्रयास है। 2014 में शुरू हुए एक्सीडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम ने अब तक लाखों दुर्घटनाओं में सहायता पहुंचाई है, लेकिन समय के साथ नई चुनौतियां और जरूरतें सामने आईं। इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एआरएस 3.0 को विकसित किया जा रहा है।
ARS सिस्टम की शुरुआत और अब तक की यात्रा
मध्य प्रदेश में एक्सीडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम की नींव 28 दिसंबर 2014 को रखी गई थी। उस समय इसका उद्देश्य स्टेट हाईवे पर होने वाली दुर्घटनाओं की जानकारी तुरंत जुटाना और घायलों तक जल्द से जल्द मदद पहुंचाना था। शुरुआती वर्षों में यह सिस्टम एक केंद्रीकृत कॉल सेंटर और सीमित तकनीकी संसाधनों पर आधारित था।
समय के साथ इसमें सुधार होते गए और एआरएस 2.0 तक यह सिस्टम कैमरों, जीपीएस और कॉल सेंटर के जरिए बेहतर तालमेल के साथ काम करने लगा। इसके बावजूद बढ़ते ट्रैफिक, वाहनों की संख्या और सड़क दुर्घटनाओं की गंभीरता को देखते हुए एक और उन्नत संस्करण की आवश्यकता महसूस की गई। इसी सोच का परिणाम है एआरएस 3.0।
ARS 3.0 क्या है और यह क्यों जरूरी है
एआरएस 3.0 को मौजूदा सिस्टम से कहीं अधिक स्मार्ट, तेज और समन्वित बनाया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब यह सिस्टम राज्य की प्रमुख आपातकालीन सेवाओं से सीधे जुड़ा होगा। डायल 112, 108 और 100 जैसे नंबरों से मिलने वाली सूचनाएं सीधे एआरएस प्लेटफॉर्म पर एकीकृत होंगी।
इसका मतलब यह है कि जैसे ही कहीं सड़क दुर्घटना होती है, सूचना कई माध्यमों से एक साथ सिस्टम तक पहुंचेगी। इससे समय की बर्बादी रुकेगी और घायलों को गोल्डन आवर के भीतर मदद मिलने की संभावना काफी बढ़ जाएगी।
आपातकालीन सेवाओं से सीधा तालमेल
अब तक अलग-अलग इमरजेंसी नंबर अपने स्तर पर काम करते थे। कई बार एक ही हादसे की सूचना अलग-अलग जगहों पर पहुंचती थी, जिससे समन्वय में देरी होती थी। एआरएस 3.0 इस समस्या का समाधान करेगा।
डायल 112 पुलिस सहायता, 108 एंबुलेंस सेवा और 100 जैसी आपातकालीन कॉल्स को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया जाएगा। जैसे ही किसी हाईवे या प्रमुख सड़क पर दुर्घटना होती है, सिस्टम अपने आप यह तय करेगा कि किस स्थान से कौन सी एंबुलेंस, कौन सी पुलिस टीम और कौन सा पेट्रोलिंग वाहन सबसे नजदीक है।
जीपीएस, सेंसर और कैमरों से मिलेगी सटीक जानकारी
एआरएस 3.0 की रीढ़ आधुनिक तकनीक होगी। स्टेट हाईवे पर लगे हाई रेजोल्यूशन कैमरे लगातार ट्रैफिक और सड़क की निगरानी करेंगे। किसी भी असामान्य गतिविधि, वाहन के रुकने या टक्कर की स्थिति में सिस्टम अलर्ट हो जाएगा।
इसके अलावा एंबुलेंस और पेट्रोलिंग वाहनों में लगे जीपीएस और सेंसर भी दुर्घटना की जानकारी तुरंत भेजेंगे। इन सभी सूचनाओं को एक केंद्रीकृत कंट्रोल रूम में प्रोसेस किया जाएगा, जहां कंप्यूटर एडेड डिस्पैच सिस्टम के जरिए तुरंत कार्रवाई शुरू हो जाएगी।
कॉल सेंटर की भूमिका होगी और मजबूत
एआरएस 3.0 में कॉल सेंटर की भूमिका पहले से कहीं अधिक अहम होगी। यहां प्रशिक्षित ऑपरेटर हर कॉल को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लॉग करेंगे। दुर्घटना की लोकेशन, घायलों की संख्या और स्थिति का आकलन कर तुरंत फील्ड टीम को निर्देश दिए जाएंगे।
इस प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप के साथ-साथ ऑटोमेटेड सिस्टम भी काम करेगा, जिससे गलती की संभावना कम होगी और प्रतिक्रिया समय घटेगा।
9.25 करोड़ रुपये का निवेश और टेंडर प्रक्रिया
एमपीआरडीसी इस पूरे अपग्रेडेशन पर लगभग 9 करोड़ 25 लाख रुपये खर्च करने जा रहा है। इसके लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह राशि तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, हार्डवेयर इंस्टॉलेशन और मानव संसाधन प्रशिक्षण पर खर्च की जाएगी।
यह निवेश इस बात का संकेत है कि राज्य सरकार सड़क सुरक्षा को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्राथमिकता के रूप में देख रही है।
आंकड़े जो सिस्टम की जरूरत बताते हैं
एआरएस सिस्टम के आंकड़े खुद इसकी अहमियत बयान करते हैं। 3 फरवरी 2026 तक इस सिस्टम के जरिए 7 लाख 1 हजार से अधिक दुर्घटनाओं में सहायता पहुंचाई जा चुकी है। सिर्फ 1 जनवरी से 3 फरवरी 2026 के बीच 502 दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे जुड़ी 4,117 कॉल कॉल सेंटर पर प्राप्त हुईं।
वर्ष 2024 में स्टेट हाईवे पर सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं सामने आईं। इस दौरान करीब 3 लाख 85 हजार हादसों की जानकारी एआरएस सिस्टम में दर्ज की गई। ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटनाएं एक गंभीर सामाजिक समस्या हैं और इनके लिए मजबूत तकनीकी समाधान जरूरी है।
गोल्डन आवर में मदद पहुंचाने का लक्ष्य
सड़क दुर्घटनाओं में पहले एक घंटे को गोल्डन आवर कहा जाता है। इस दौरान अगर घायल को सही इलाज मिल जाए तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। एआरएस 3.0 का सबसे बड़ा उद्देश्य इसी गोल्डन आवर का बेहतर इस्तेमाल करना है।
सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि दुर्घटना की सूचना मिलने और एंबुलेंस के मौके पर पहुंचने के बीच का समय न्यूनतम हो।
डिजिटल डेटाबेस से भविष्य की योजना
एआरएस 3.0 सिर्फ रिस्पॉन्स सिस्टम नहीं होगा, बल्कि यह एक व्यापक डिजिटल डेटाबेस भी तैयार करेगा। इसमें दुर्घटनाओं के स्थान, समय, कारण और गंभीरता से जुड़ी जानकारी सुरक्षित रहेगी।
इस डेटा का इस्तेमाल भविष्य में सड़क डिजाइन सुधारने, ब्लैक स्पॉट पहचानने और ट्रैफिक नीति बनाने में किया जा सकेगा। यानी यह सिस्टम न सिर्फ हादसों के बाद मदद करेगा, बल्कि उन्हें रोकने में भी सहायक बनेगा।
राज्य के लिए एक मॉडल सिस्टम
एमपीआरडीसी का यह प्रयास अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है। अगर एआरएस 3.0 अपने उद्देश्यों में सफल रहता है, तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने की दिशा में भी कदम बढ़ सकते हैं।
मध्य प्रदेश की सड़कों पर सफर करने वाले लाखों लोगों के लिए यह एक भरोसे की खबर है कि अब दुर्घटना की स्थिति में मदद ज्यादा तेज, ज्यादा सटीक और ज्यादा संगठित होगी।
