भारत अब उस दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ जैविक खतरों से निपटने की तैयारी केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक संगठित, तकनीकी और रियल-टाइम नेटवर्क के रूप में सामने आएगी। भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान द्वारा शुरू की गई एक नई पहल देश की जैव-सुरक्षा रणनीति को नई दिशा देने जा रही है। इस पहल के अंतर्गत देशभर की अत्यधिक संवेदनशील और उच्च जोखिम वाली रोगजनक प्रयोगशालाओं को एक साझा राष्ट्रीय मंच पर जोड़ने की तैयारी शुरू हो चुकी है।

यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब दुनिया लगातार नए और पुराने संक्रामक रोगों के खतरे से जूझ रही है। इबोला, कांगो फीवर, बर्ड फ्लू और अन्य घातक वायरस केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गए हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता के लिए भी चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में भारत का यह प्रयास आने वाले वर्षों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उच्च सुरक्षा प्रयोगशालाओं की आवश्यकता क्यों बढ़ी
पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से वायरस तेजी से सीमाएँ पार कर रहे हैं, उसने पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि पारंपरिक स्वास्थ्य ढाँचा अब पर्याप्त नहीं है। वैश्वीकरण, जलवायु परिवर्तन, वन्यजीवों के आवास में हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय आवागमन ने रोगजनकों के फैलने की गति को कई गुना बढ़ा दिया है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है। यहाँ मानव, पशु और पर्यावरण का आपसी संबंध बहुत गहरा है। यही कारण है कि उच्च सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं की भूमिका अब केवल शोध तक सीमित न रहकर निगरानी, चेतावनी और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली का हिस्सा बन गई है।
बीएसएल-3 और बीएसएल-4 प्रयोगशालाओं की भूमिका
जैव-सुरक्षा स्तर के आधार पर प्रयोगशालाओं को विभिन्न श्रेणियों में बाँटा जाता है। बीएसएल-3 और बीएसएल-4 श्रेणी की प्रयोगशालाएँ दुनिया की सबसे सुरक्षित लैब्स मानी जाती हैं। इन प्रयोगशालाओं में ऐसे वायरस और बैक्टीरिया पर काम किया जाता है जिनसे संक्रमण का खतरा अत्यधिक होता है और जिनका इलाज या टीका अक्सर उपलब्ध नहीं होता।
भारत में वर्तमान समय में केवल दो पूर्णतः कार्यात्मक बीएसएल-4 प्रयोगशालाएँ हैं। इनमें से एक भोपाल में और दूसरी पुणे में संचालित है। इन प्रयोगशालाओं में इबोला जैसे अत्यंत घातक वायरस, कांगो फीवर और उच्च रोगजनक बर्ड फ्लू पर शोध किया जाता है। इसके अलावा देश में लगभग तीस से चालीस बीएसएल-3 प्रयोगशालाएँ भी सक्रिय हैं, जो विभिन्न चिकित्सा और पशु चिकित्सा संस्थानों में कार्य कर रही हैं।
एक साझा मंच की जरूरत कैसे महसूस हुई
अब तक इन प्रयोगशालाओं के बीच सहयोग और डेटा साझा करने की प्रक्रिया सीमित और समय-साध्य रही है। अलग-अलग संस्थानों में अलग-अलग प्रणालियाँ होने के कारण कई बार महत्वपूर्ण जानकारी समय पर एक जगह से दूसरी जगह नहीं पहुँच पाती थी। विशेषज्ञों का मानना है कि महामारी के दौरान कुछ घंटों या दिनों की देरी भी हालात को बेकाबू बना सकती है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे नेटवर्क की परिकल्पना की गई, जिसमें सभी उच्च सुरक्षा प्रयोगशालाएँ आपस में डिजिटल रूप से जुड़ी हों और रियल-टाइम डेटा साझा कर सकें। यह नेटवर्क केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं करेगा, बल्कि साझा रणनीति, संयुक्त अभ्यास और समन्वित प्रतिक्रिया की नींव भी रखेगा।
भोपाल से शुरू हुई राष्ट्रीय पहल
भोपाल स्थित संस्थान द्वारा शुरू की गई यह पहल देश की जैव-सुरक्षा नीति में एक निर्णायक बदलाव के रूप में देखी जा रही है। इस परियोजना के तहत न केवल मौजूदा प्रयोगशालाओं को जोड़ा जाएगा, बल्कि भविष्य में बनने वाली उच्च सुरक्षा प्रयोगशालाओं को भी इसी नेटवर्क का हिस्सा बनाया जाएगा।
यह नेटवर्क एक तरह से देश की जैविक ढाल की तरह काम करेगा, जो संभावित वायरस अटैक या महामारी की स्थिति में तुरंत सक्रिय हो सकेगा। इसका उद्देश्य केवल प्रतिक्रिया देना नहीं है, बल्कि समय रहते खतरे की पहचान कर उसे फैलने से रोकना भी है।
‘वन हेल्थ’ अवधारणा को मिलेगी मजबूती
इस राष्ट्रीय नेटवर्क की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ‘वन हेल्थ’ की अवधारणा को व्यवहार में उतारने में मदद करेगा। ‘वन हेल्थ’ का मतलब है मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानना।
भारत जैसे देश में जहाँ पशुपालन, वन्यजीव और मानव आबादी का संपर्क बहुत अधिक है, वहाँ कई बीमारियाँ पशुओं से इंसानों तक पहुँचती हैं। ऐसे रोगों की समय पर पहचान तभी संभव है जब पशु रोग प्रयोगशालाएँ और मानव स्वास्थ्य संस्थान एक-दूसरे से सीधे जुड़े हों। यह नेटवर्क उसी दिशा में एक ठोस कदम है।
रियल-टाइम डेटा से बदलेगी तस्वीर
नेटवर्क के पूरी तरह सक्रिय होने के बाद खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया से जुड़े शोध, परीक्षण और निगरानी के आंकड़े तुरंत साझा किए जा सकेंगे। इससे किसी भी नए संक्रमण के संकेत मिलते ही संबंधित संस्थान अलर्ट हो जाएंगे।
अक्सर देखा गया है कि महामारी के शुरुआती चरण में जानकारी बिखरी रहती है और निर्णय लेने में देरी हो जाती है। इस नई व्यवस्था से ऐसी देरी को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की महामारियों से निपटने में यह नेटवर्क निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
जैव-सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का संबंध
आज के समय में जैविक खतरे केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं रह गए हैं। कई देश इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देखते हैं। किसी खतरनाक वायरस का जानबूझकर या अनजाने में फैलना पूरे देश की व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
इस नेटवर्क के माध्यम से भारत अपनी जैव-सुरक्षा को मजबूत कर रहा है। यह न केवल प्राकृतिक महामारी से निपटने में मदद करेगा, बल्कि किसी भी संभावित जैविक आपात स्थिति के लिए देश को तकनीकी रूप से तैयार रखेगा।
शोध और नवाचार को मिलेगी गति
जब प्रयोगशालाएँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं, तो शोध की गति अपने आप बढ़ जाती है। साझा डेटा, संयुक्त अध्ययन और अनुभवों के आदान-प्रदान से वैज्ञानिक अधिक प्रभावी समाधान विकसित कर सकते हैं। यह नेटवर्क युवा शोधकर्ताओं के लिए भी नए अवसर खोलेगा और देश में उच्च स्तरीय जैविक अनुसंधान को बढ़ावा देगा।
भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयारी
इस परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह नेटवर्क केवल वर्तमान जरूरतों को ध्यान में रखकर नहीं बनाया जा रहा है, बल्कि आने वाले दशकों की चुनौतियों को देखते हुए इसकी रूपरेखा तैयार की गई है। जलवायु परिवर्तन, नए रोगजनकों का उभरना और वैश्विक स्वास्थ्य संकट जैसी स्थितियों में यह नेटवर्क भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
