यूरोप में रूस को लेकर चिंता कोई नई नहीं है, लेकिन हाल में सामने आए एक वॉरगेम अभ्यास ने इस डर को कहीं अधिक ठोस और डरावना बना दिया है। इस सिमुलेशन अभ्यास में जो निष्कर्ष निकले हैं, उन्होंने न केवल यूरोपीय देशों की सैन्य तैयारियों पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि नाटो की सामूहिक रक्षा क्षमता को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी है। अभ्यास में यह सामने आया कि यदि रूस और नाटो के बीच सीधा युद्ध होता है और अमेरिका किसी कारणवश दूरी बनाए रखता है, तो कुछ ही दिनों में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूरोप के अहम हिस्सों पर कब्जा जमा सकते हैं।

यह आकलन ऐसे समय में आया है जब फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद से यूरोप लगातार यह दावा करता रहा है कि वह किसी भी संभावित संघर्ष के लिए तैयार है। रक्षा बजट बढ़ाने, हथियारों की खरीद और संयुक्त सैन्य अभ्यासों की बातें लगातार होती रहीं, लेकिन इस वॉरगेम के नतीजे इन तमाम दावों के उलट तस्वीर पेश करते हैं।
रूस-नाटो तनाव की पृष्ठभूमि
यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा संरचना को पूरी तरह झकझोर दिया है। रूस और पश्चिमी देशों के बीच अविश्वास अपने चरम पर है। नाटो ने अपने पूर्वी सदस्य देशों में सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है, जबकि रूस ने इसे अपने लिए सीधा खतरा बताया है। बीते वर्षों में बाल्टिक देशों, पोलैंड और पूर्वी यूरोप में सैन्य गतिविधियां तेज हुई हैं। बावजूद इसके, यह वॉरगेम बताता है कि जमीनी हकीकत कागजी तैयारियों से काफी अलग हो सकती है।
इस अभ्यास का मकसद यह समझना था कि अगर रूस अचानक नाटो क्षेत्र पर हमला करता है, तो पश्चिमी गठबंधन कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से प्रतिक्रिया दे पाएगा। नतीजे चौंकाने वाले रहे।
वॉरगेम किसने और क्यों किया
इस वॉरगेम अभ्यास को पूर्व जर्मन और नाटो से जुड़े अनुभवी अधिकारियों ने डिजाइन किया। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक बयानबाजी को हवा देना नहीं, बल्कि एक संभावित युद्ध परिदृश्य को यथार्थ के करीब रखकर परखना था। इसमें सैन्य क्षमताओं, राजनीतिक हिचकिचाहट, निर्णय लेने की गति और सहयोगी देशों के आपसी तालमेल जैसे पहलुओं को शामिल किया गया।
अभ्यास से यह स्पष्ट हुआ कि यूरोपीय देश भले ही सार्वजनिक रूप से एकजुटता दिखाते हों, लेकिन वास्तविक संकट की स्थिति में निर्णय लेने में देरी और आपसी मतभेद रूस के लिए बड़ा मौका बन सकते हैं।
लिथुआनिया बना संघर्ष का केंद्र
इस वॉरगेम में रूस की संभावित घुसपैठ के लिए लिथुआनिया को केंद्र बिंदु बनाया गया। लिथुआनिया नाटो का सदस्य है और बाल्टिक क्षेत्र में इसकी रणनीतिक अहमियत बेहद ज्यादा है। यह देश रूस के कलिनिनग्राद एन्क्लेव और बेलारूस के बीच स्थित है, जिससे होकर एक महत्वपूर्ण सड़क मार्ग गुजरता है।
अभ्यास में यह कल्पना की गई कि रूस कलिनिनग्राद में मानवीय संकट का हवाला देकर लिथुआनियाई शहर मारिजमपोल में अपनी सेना भेज देता है। मारिजमपोल एक अहम शहरी इलाका है, जहां से रूस और बेलारूस को जोड़ने वाला मार्ग गुजरता है। इस कदम को रूस एक सीमित और जरूरी सैन्य कार्रवाई के रूप में पेश करता है।
अक्टूबर 2026 का काल्पनिक परिदृश्य
वॉरगेम में इस हमले की समय-सीमा अक्टूबर 2026 मानी गई। यह वह समय है जब वैश्विक राजनीति में कई अनिश्चितताएं चरम पर हो सकती हैं। अभ्यास में यह भी माना गया कि उस वक्त अमेरिका का नेतृत्व पूरी तरह सक्रिय नहीं है या वह यूरोप के मामलों से कुछ हद तक पीछे हट चुका है।
इस परिदृश्य में नाटो देशों की हिचकिचाहट और धीमी प्रतिक्रिया रूस को बढ़त दिलाती है। अभ्यास के मुताबिक, रूस केवल 15,000 सैनिकों की शुरुआती ताकत के साथ इस ऑपरेशन की शुरुआत करता है, लेकिन सीमित प्रतिरोध और तेज रणनीतिक बढ़त के कारण वह कुछ ही दिनों में अपने अधिकतर लक्ष्य हासिल कर लेता है।
यूरोपीय कमजोरी के कारण
वॉरगेम के नतीजों ने यह भी उजागर किया कि यूरोप की कमजोरी केवल सैन्य संसाधनों की कमी नहीं है। असली समस्या राजनीतिक इच्छाशक्ति, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और आपसी तालमेल की कमी है। अलग-अलग देशों की अपनी घरेलू राजनीति, आर्थिक दबाव और जनता की राय युद्ध जैसे फैसलों को जटिल बना देती है।
जर्मनी जैसे बड़े और प्रभावशाली देश की हिचकिचाहट को भी इस अभ्यास में एक अहम कारक माना गया। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि अगर निर्णायक नेतृत्व की कमी रही, तो रूस के लिए रास्ता और आसान हो जाएगा।
विशेषज्ञों की राय
पोलिश सुरक्षा विश्लेषक बार्टलोमी कोट का कहना है कि रूस अपनी सैन्य इकाइयों को बड़े पैमाने पर हिलाए बिना भी अपने रणनीतिक लक्ष्य हासिल कर सकता है। उनके अनुसार, यह रूस की योजना और तैयारी की गहराई को दर्शाता है। वहीं, वियना स्थित सैन्य विश्लेषक फ्रांज-स्टीफन गैडी का मानना है कि जर्मनी और कुछ अन्य यूरोपीय देशों की अनिच्छा रूस को मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक बढ़त देती है।
इन विशेषज्ञों की राय इस बात को मजबूत करती है कि खतरा केवल काल्पनिक नहीं है, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है।
नाटो क्षेत्र में बढ़ती घुसपैठ की घटनाएं
पिछले कुछ समय में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें रूसी ड्रोन और फाइटर जेट कथित तौर पर नाटो के हवाई क्षेत्र में घुसपैठ करते पाए गए। इन घटनाओं को भले ही सीमित या तकनीकी गलती बताया गया हो, लेकिन वॉरगेम के संदर्भ में ये संकेत और भी गंभीर लगने लगते हैं।
ये घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि रूस नाटो की प्रतिक्रिया क्षमता को लगातार परख रहा है। अगर प्रतिक्रिया कमजोर या असंगठित रही, तो यह भविष्य में बड़े कदम के लिए प्रेरणा बन सकती है।
अमेरिका की भूमिका और उसका महत्व
इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका की भूमिका सबसे अहम मानी गई है। नाटो की सैन्य ताकत काफी हद तक अमेरिकी समर्थन पर निर्भर करती है। अगर किसी कारणवश अमेरिका सक्रिय भागीदारी नहीं करता या नेतृत्व से पीछे हटता है, तो यूरोपीय देशों के लिए रूस का सामना करना बेहद मुश्किल हो सकता है।
वॉरगेम ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या यूरोप वास्तव में अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बन पाया है या अब भी वह अमेरिका की छाया में ही खड़ा है।
यूरोप के लिए चेतावनी या अतिशयोक्ति
हालांकि कुछ लोग इस वॉरगेम को जरूरत से ज्यादा निराशाजनक मानते हैं, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इसे एक गंभीर चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि इस तरह के अभ्यास का मकसद डर फैलाना नहीं, बल्कि कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करना होता है।
अगर यूरोप इन निष्कर्षों को गंभीरता से लेता है, तो वह अपनी सैन्य और राजनीतिक रणनीतियों में जरूरी सुधार कर सकता है। लेकिन अगर इसे नजरअंदाज किया गया, तो भविष्य में हालात और ज्यादा जटिल हो सकते हैं।
निष्कर्ष: बदलती सुरक्षा वास्तविकता
नाटो वॉरगेम के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की संख्या से नहीं जीते जाते, बल्कि राजनीतिक एकता, तेज निर्णय और रणनीतिक स्पष्टता से तय होते हैं। रूस की संभावित तेज जीत की आशंका यूरोप के लिए एक आईना है, जिसमें उसे अपनी कमजोरियां साफ दिखाई दे रही हैं।
यह अभ्यास भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक संभावना है। लेकिन इतिहास बताता है कि संभावनाओं को नजरअंदाज करने की कीमत अक्सर बहुत भारी पड़ती है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यूरोप इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेता है और अपनी सुरक्षा व्यवस्था को किस दिशा में ले जाता है।
