साल 2026 खगोलीय घटनाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस वर्ष आकाश में चार प्रमुख ग्रहण लगेंगे, जिनमें दो सूर्यग्रहण और दो चंद्रग्रहण शामिल हैं। ग्रहण केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के कारण भी विशेष महत्व रखते हैं। भारतीय संस्कृति में ग्रहण को एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना माना जाता है, जिसका प्रभाव जीवन, प्रकृति और धार्मिक अनुष्ठानों पर पड़ता है।

इस वर्ष का पहला सूर्यग्रहण 17 फरवरी को लगेगा। हालांकि यह सूर्यग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। ज्योतिषीय परंपराओं के अनुसार जिस क्षेत्र में ग्रहण दिखाई नहीं देता, वहां उसका सूतक काल मान्य नहीं होता। इसलिए 17 फरवरी के सूर्यग्रहण का भारत में धार्मिक दृष्टि से विशेष प्रभाव नहीं माना जाएगा। इसके बाद वर्ष का दूसरा सूर्यग्रहण 12 अगस्त को लगेगा। यह भी भारत में दृश्य नहीं होगा, इसलिए इसका भी सूतक काल देश में मान्य नहीं रहेगा।
अब बात करते हैं वर्ष के सबसे चर्चित ग्रहण की, जो तीन मार्च को पड़ने वाला चंद्रग्रहण है। यह ग्रहण विशेष इसलिए है क्योंकि यह भारत में दिखाई देगा और होली के त्योहार के समय के आसपास पड़ेगा। होलिका दहन के अगले दिन यह चंद्रग्रहण लगेगा, जिससे लोगों के मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या इसका प्रभाव होली के उत्सव पर पड़ेगा या नहीं।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार तीन मार्च को लगने वाला यह चंद्रग्रहण खग्रास स्वरूप का होगा, हालांकि इसे हल्का ग्रहण बताया जा रहा है। इस दौरान चंद्रमा शनि की राशि कुंभ में स्थित रहेगा। शनि की राशि में चंद्रग्रहण का लगना ज्योतिषीय दृष्टि से विचारणीय माना जाता है। कई विद्वान इसे मानसिक और सामाजिक प्रभावों से जोड़कर देखते हैं।
ग्रहण का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। तीन मार्च को चंद्रमा का छाया में प्रवेश दोपहर 2 बजकर 15 मिनट पर होगा। इसके बाद स्पर्श काल 3 बजकर 20 मिनट पर आरंभ होगा। ग्रहण का मध्य काल 5 बजकर 54 मिनट पर रहेगा और मोक्ष काल 6 बजकर 47 मिनट पर समाप्त होगा। इस प्रकार यह ग्रहण शाम तक प्रभावी रहेगा।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार चंद्रग्रहण का सूतक काल नौ घंटे पहले आरंभ हो जाता है। इस गणना के अनुसार सुबह लगभग 9 बजकर 39 मिनट से सूतक प्रभावी माना जाएगा। सूतक काल में सामान्यतः शुभ कार्य, पूजा-पाठ, हवन और नए कार्यों का आरंभ नहीं किया जाता। गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। मंदिरों के कपाट भी कई स्थानों पर बंद कर दिए जाते हैं और ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धिकरण की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
हालांकि ज्योतिषाचार्यों का स्पष्ट मत है कि होलिका दहन और होली खेलने पर इस ग्रहण का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। ग्रहण समाप्त होने के बाद लोग सामान्य रूप से त्योहार मना सकते हैं। परंपराओं के अनुसार ग्रहण के दौरान मंत्र जाप, ध्यान और दान करना शुभ माना जाता है।
यह चंद्रग्रहण केवल भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप, एशिया, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में भी देखा जा सकेगा। इसलिए यह एक वैश्विक खगोलीय घटना होगी। दूसरी ओर वर्ष का दूसरा चंद्रग्रहण 28 अगस्त को लगेगा, लेकिन वह भारत में दिखाई नहीं देगा। इस कारण उसका सूतक काल भी भारत में मान्य नहीं होगा।
वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहण तब लगता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा एक सीध में आ जाते हैं। चंद्रग्रहण तब होता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और उसकी छाया चंद्रमा पर पड़ती है। यह एक प्राकृतिक खगोलीय प्रक्रिया है, जो निश्चित गणनाओं के आधार पर घटित होती है।
भारतीय परंपरा में ग्रहण को आत्मचिंतन और साधना का समय माना गया है। कई लोग इस दौरान मंत्रों का जाप करते हैं और ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान कर दान-पुण्य करते हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आज भी ग्रहण को लेकर विशेष उत्सुकता देखी जाती है।
तीन मार्च का चंद्रग्रहण इसलिए भी खास है क्योंकि यह होली जैसे उल्लासपूर्ण पर्व के समय पड़ रहा है। होली बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। ऐसे में ग्रहण का पड़ना एक खगोलीय संयोग है, जिसे लोग जिज्ञासा और श्रद्धा दोनों दृष्टियों से देख रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। ग्रहण एक प्राकृतिक घटना है और त्योहारों की खुशियों पर इसका कोई प्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हुए लोग सामान्य जीवनचर्या जारी रख सकते हैं।
इस प्रकार वर्ष 2026 में चार ग्रहणों का संयोग खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण रहेगा। इनमें से तीन मार्च का चंद्रग्रहण भारत में दिखाई देने के कारण विशेष महत्व रखेगा। सूतक काल, धार्मिक मान्यताओं और त्योहार के संयोग के कारण यह चर्चा का विषय बना हुआ है।
आकाशीय घटनाएं हमें ब्रह्मांड की विशालता और प्रकृति की अद्भुत व्यवस्था का एहसास कराती हैं। ग्रहण चाहे सूर्य का हो या चंद्रमा का, वह हमें यह याद दिलाता है कि हम एक विशाल खगोलीय तंत्र का हिस्सा हैं, जहां हर घटना पूर्व निर्धारित गणनाओं के अनुसार घटित होती है।
साल 2026 का यह ग्रहण चक्र खगोल विज्ञान के साथ-साथ भारतीय परंपराओं और आस्थाओं को भी एक साथ जोड़ता है। ऐसे में तीन मार्च का दिन आकाश और आस्था दोनों दृष्टियों से विशेष रहेगा।
