मध्य पूर्व की राजनीति हमेशा से वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र रही है। यहां की हलचल केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका असर यूरोप, एशिया और अमेरिका तक महसूस किया जाता है। हाल के दिनों में एक बार फिर “इस्लामिक नेटो” या अरब-इस्लामिक सैन्य गठबंधन की चर्चा तेज हो गई है। यह बहस अचानक नहीं उभरी, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में बदलते कूटनीतिक समीकरणों, सैन्य तनावों और रणनीतिक साझेदारियों की पृष्ठभूमि में आकार ले रही है।

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की सऊदी अरब और मिस्र यात्राओं के बाद इस मुद्दे ने फिर से सुर्खियां बटोरीं। इन यात्राओं को केवल सामान्य कूटनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इन्हें क्षेत्रीय पुनर्संतुलन की दिशा में एक संभावित कदम के रूप में समझा गया। ऐसे समय में जब अमेरिका के ईरान पर संभावित हमले की तैयारियों को लेकर सैन्य गतिविधियों में बढ़ोतरी की खबरें सामने आईं, तब अरब और मुस्लिम देशों के बीच एक व्यापक राजनीतिक-सैन्य मंच की संभावना पर चर्चाएं और तेज हो गईं।
इस विचार की पृष्ठभूमि
मुस्लिम देशों के एक साझा सैन्य गठबंधन का विचार पहली बार हाल में नहीं आया। सितंबर 2024 में तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने सार्वजनिक रूप से मुस्लिम देशों को एकजुट होने का आह्वान किया था। उनका कहना था कि इसराइल की ओर से बढ़ते विस्तारवादी खतरे का सामना करने के लिए इस्लामी दुनिया को साझा रणनीति की जरूरत है। उस समय यह बयान केवल राजनीतिक संदेश माना गया था, लेकिन धीरे-धीरे इसने एक व्यापक बहस का रूप ले लिया।
सितंबर 2025 में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने भी “इस्लामिक नेटो” स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 17 सितंबर को हुए रक्षा समझौते ने इस विचार को और गति दी। इस समझौते को केवल द्विपक्षीय रक्षा सहयोग नहीं, बल्कि एक बड़े क्षेत्रीय ढांचे की ओर संकेत के रूप में भी देखा गया।
अब जब अर्दोआन ने सऊदी अरब और मिस्र की यात्राएं कीं, तो अरब मीडिया में इस्लामिक नेटो के प्रस्ताव को फिर से प्रमुखता मिली। कुछ विश्लेषकों ने इसे तीन प्रमुख देशों—तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र—के इर्द-गिर्द बनने वाले संभावित गठबंधन की दिशा में शुरुआती कदम बताया।
किन देशों के शामिल होने की चर्चा
अरब मीडिया की रिपोर्टों में संकेत दिए गए कि संभावित गठबंधन में तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हो सकते हैं। तर्क यह है कि इन देशों के पास या तो बड़ी सैन्य क्षमता है, या वे मुस्लिम दुनिया में राजनीतिक प्रभाव रखते हैं।
रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि तीन देशों के केंद्र में एक राजनीतिक और सैन्य गठबंधन का ढांचा तैयार किया जा सकता है, जो आगे चलकर परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और बड़ी मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया तक विस्तार पा सकता है। हालांकि, कुछ सऊदी सूत्रों ने यह स्पष्ट किया है कि फिलहाल तुर्की और पाकिस्तान को शामिल करते हुए सऊदी नेतृत्व में किसी औपचारिक इस्लामिक नेटो की योजना नहीं है।
यही विरोधाभास इस पूरे विचार को जटिल बनाता है। एक ओर मीडिया में चर्चा तेज है, दूसरी ओर आधिकारिक स्तर पर सावधानीपूर्ण बयान दिए जा रहे हैं।
गठबंधन की चर्चा के पीछे मौजूदा हालात
हाल के महीनों में गाजा में इसराइल के युद्ध और ईरान के साथ 12 दिन चले संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया। इसी दौरान अमेरिका की ओर से अरब सागर में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की खबरों ने नई चिंताएं पैदा कीं। अमेरिकी नौसेना द्वारा अपने अब्राहम लिंकन कैरियर की तस्वीर जारी करना प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण माना गया।
इन घटनाओं ने यह सवाल उठाया कि क्या मुस्लिम देशों के पास कोई ऐसा साझा सुरक्षा तंत्र है, जो क्षेत्रीय संकटों का सामूहिक जवाब दे सके। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामिक नेटो का विचार इसी आवश्यकता से जन्म ले रहा है।
कुछ पूर्व राजनयिकों ने इसे क्षेत्र के इतिहास में संभावित अहम मोड़ बताया है। उनका मानना है कि यदि सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की, पाकिस्तान और कतर जैसे देश साझा रणनीति बनाते हैं, तो इससे क्षेत्र में संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
तुर्की का रुख
तुर्की की मीडिया में इस संभावित गठबंधन को गेम चेंजर के रूप में प्रस्तुत किया गया। हालांकि समय के साथ बयानबाजी का स्वर थोड़ा बदला और जोर व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता पर दिया जाने लगा।
तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान ने क्षेत्रीय स्थिरता का मंच बनाने की बात कही। उन्होंने संकेत दिया कि यह किसी एक देश के प्रभुत्व का मंच नहीं होगा, बल्कि क्षेत्रीय जिम्मेदारी साझा करने का प्रयास होगा। उन्होंने यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि यूरोप शून्य से एक संघ बना सकता है, तो क्षेत्रीय देश भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते।
तुर्की मिस्र और सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। खबरें हैं कि तुर्की ने मिस्र को 35 करोड़ डॉलर के सैन्य साजो-सामान निर्यात पर सहमति दी है और वहां गोला-बारूद उत्पादन लाइन स्थापित करने की योजना है। साथ ही सऊदी अरब के तुर्की के “कान” फाइटर जेट कार्यक्रम में निवेश की संभावना जताई गई है।
संभावित मकसद
इस संभावित गठबंधन के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। पहला कारण क्षेत्र में इसराइल की बढ़ती सैन्य ताकत है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम देश एक सामूहिक प्रतिरोध क्षमता विकसित करना चाहते हैं।
दूसरा कारण ईरान को लेकर अनिश्चितता है। यदि अमेरिका और इसराइल ईरान की परमाणु क्षमता को खत्म करने के उद्देश्य से हमला करते हैं, तो क्षेत्रीय संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। ऐसे में मुस्लिम देशों का एक साझा मंच रणनीतिक सुरक्षा कवच बन सकता है।
तीसरा कारण ग्रीस और साइप्रस के साथ इसराइल का त्रिपक्षीय सहयोग है, जिसे तुर्की अपने हितों के खिलाफ मानता है। इस संदर्भ में भी एक व्यापक मुस्लिम गठबंधन तुर्की के लिए संतुलनकारी कदम हो सकता है।
चुनौतियां और बाधाएं
हालांकि विचार आकर्षक लगता है, लेकिन इसके सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं। इतिहास गवाह है कि अरब और मुस्लिम देशों के बीच कई रक्षा समझौते कागजों तक सीमित रह गए। कई बार तो समझौते करने वाले देश आपस में ही टकराव की स्थिति में आ गए।
तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब के बीच मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। क्षेत्रीय राजनीतिक बदलावों को लेकर तीनों देशों की प्राथमिकताएं अलग-अलग रही हैं। ऐसे में एक गहरे रणनीतिक गठबंधन के लिए भरोसे का स्तर और बढ़ाना होगा।
कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इसराइल और अमेरिका इस तरह के गठबंधन को सहजता से उभरने नहीं देंगे। अमेरिकी राजनीतिक ढांचे में सक्रिय लॉबी समूह इसे रोकने की कोशिश कर सकते हैं।
भविष्य की संभावनाएं
विशेषज्ञों का आकलन है कि निकट भविष्य में कोई औपचारिक, संस्थागत इस्लामिक नेटो बनना कठिन है। अधिक संभावना एक लचीले समन्वय तंत्र की है, जहां देश मुद्दों के आधार पर साथ आएं, लेकिन पूर्ण सैन्य गठबंधन से बचें।
यह भी संभव है कि इस विचार का उपयोग कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा हो। जब क्षेत्रीय देश एकजुटता का संकेत देते हैं, तो इससे वैश्विक शक्तियों को संदेश जाता है कि वे अकेले नहीं हैं।
निष्कर्ष
इस्लामिक नेटो की चर्चा केवल एक सैन्य गठबंधन की बहस नहीं है, बल्कि यह बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य का प्रतीक है। तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के बीच बढ़ती नजदीकियां, पाकिस्तान की सक्रियता और अमेरिका-ईरान तनाव ने मिलकर एक नया समीकरण बनाया है।
फिलहाल यह विचार अधिकतर कूटनीतिक विमर्श और मीडिया बहस तक सीमित है, लेकिन इसके संकेत यह बताते हैं कि मध्य पूर्व एक नए दौर की दहलीज पर खड़ा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह चर्चा वास्तविक गठबंधन में बदलती है या केवल रणनीतिक संदेश बनकर रह जाती है।
