बैतूल जिले के शांत, हरियाली से भरे गाँव गन्नाबाड़ी की पहचान अब सिर्फ खेती-किसानी तक सीमित नहीं रही। कभी जहां धान, मक्का और सोयाबीन की फसलें लहराती थीं, वहां अब धीरे-धीरे अवैध कॉलोनियों की कतारें उभर रही हैं। खेतों के बीच से पक्के रास्ते निकाले जा रहे हैं, जमीन की बाड़ हटाकर प्लॉटों की नापजोख शुरू हो चुकी है।

यह कहानी सिर्फ गन्नाबाड़ी की नहीं है — यह उन सैकड़ों गाँवों की भी है जहां शहरीकरण की आंधी अब खेती की मिट्टी को निगलने लगी है।
खेती की जमीन पर कब्ज़े की कहानी: कब, कैसे और क्यों?
गन्नाबाड़ी बैतूल तहसील के अंतर्गत एक छोटा-सा मगर उपजाऊ इलाका है। यहाँ के किसान दशकों से पारंपरिक खेती करते आए हैं। लेकिन पिछले तीन-चार वर्षों में यहाँ जमीन के दाम तेजी से बढ़े हैं — खासकर तब से जब बैतूल-इटारसी मार्ग के पास नई सड़क बनी और आसपास छोटे औद्योगिक प्रोजेक्ट्स आने लगे।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, कुछ प्रभावशाली लोगों ने इन अवसरों को भुनाते हुए किसानों से सस्ती दरों पर जमीन खरीद ली। फिर खेतों की मेढ़ हटाकर अवैध रूप से कॉलोनी का नक्शा तैयार कर दिया।
इन कॉलोनियों में कोई स्वीकृत नक्शा नहीं, न ही टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से अनुमति। बावजूद इसके, खेतों के बीच से रास्ते काट दिए गए हैं, छोटे-छोटे प्लॉटों पर “सेल फॉर प्लॉट” के बोर्ड भी लग गए हैं।
‘अवैध कॉलोनी काटने वालों को प्रशासन का डर नहीं’
गन्नाबाड़ी के ही एक किसान रामकिशोर पवार बताते हैं —
“हमारे खेत के बगल में कुछ लोगों ने रातोंरात मिट्टी हटाकर रास्ता बना लिया। जब हमने विरोध किया तो कहा गया कि ‘ऊपर तक बात सेट है’। हमने तहसील में शिकायत की, पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।”
यह “ऊपर तक सेट” वाला जुमला गाँव में अब आम हो चुका है। लोगों को लगता है कि अवैध कॉलोनियों के पीछे कुछ रसूखदार लोग हैं जिनकी पकड़ स्थानीय प्रशासन तक है।
प्रशासन की चुप्पी और किसानों की बेबसी
तहसील स्तर पर राजस्व विभाग को इस पूरी गतिविधि की जानकारी है। लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर कॉलोनी काटने वालों के खिलाफ FIR दर्ज नहीं की गई है।
एक राजस्व अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा —
“हमें कुछ मामलों की शिकायत मिली है, लेकिन कई बार सीमांकन विवाद और पुराने रकबे की स्थिति स्पष्ट नहीं होती। जांच जारी है।”
यह “जांच जारी है” वाला जवाब ग्रामीणों के लिए कोई नया नहीं। यही वो वाक्य है, जो हर अवैध निर्माण को वैधता का समय दे देता है।
नक्शे पर नहीं, मगर जमीन पर हकीकत मौजूद
जब हमारी टीम गन्नाबाड़ी पहुँची, तो यह साफ दिखा कि खेतों के बीच से करीब 15 फीट चौड़ी पक्की सड़क बना दी गई है। सड़क के दोनों ओर नींव के निशान और ईंटों के ढेर पड़े थे। कुछ जगहों पर तो पाइपलाइन डालने का भी काम हो चुका है।
स्थानीय निवासी संतोष उइके बताते हैं —
“यह कॉलोनी सरकारी रिकॉर्ड में कहीं दर्ज नहीं है। न तो बिजली का परमिशन लिया गया है, न ही जल निकासी का सिस्टम तय हुआ है। पर बेचने का काम धड़ल्ले से चल रहा है।”
अवैध कॉलोनियों का नेटवर्क: खेतों से लेकर शहर तक
यह पूरा खेल कुछ दलालों, भू-माफियाओं और स्थानीय ठेकेदारों के गठजोड़ से चलता है। वे किसान से 20–25 लाख रुपए प्रति एकड़ में जमीन खरीदते हैं, फिर छोटे-छोटे 1000–1500 वर्गफीट के प्लॉट काटकर ₹400–₹600 प्रति वर्गफीट में बेच देते हैं।
इस तरह एक एकड़ की खेती की जमीन कागजों में लाखों का प्रॉपर्टी मुनाफा बन जाती है।
गांव की हरियाली खतरे में
गन्नाबाड़ी और आसपास के खेत सिर्फ आय का स्रोत नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन खेतों से गांव की जलधारा और नालों का संतुलन बना रहता है। लेकिन जब ये खेत पक्की कॉलोनियों में बदलने लगते हैं, तो भूमिगत जल स्तर पर गंभीर असर पड़ता है।
स्थानीय शिक्षक मधुसूदन चोपड़ा कहते हैं —
“अगर ऐसे ही जमीन बिकती रही, तो पांच साल में यहां बारिश का पानी भी नहीं ठहरेगा। खेत खत्म होंगे, तो गांव की पहचान भी खत्म होगी।”
कानूनी स्थिति: भूमि रूपांतरण और टीएनसीपी की भूमिका
मध्य प्रदेश नगर और ग्राम निवेश अधिनियम (Town and Country Planning Act) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति के कृषि भूमि को आवासीय उपयोग में नहीं ला सकता। भूमि रूपांतरण (Land Diversion) और कॉलोनी डेवलपमेंट के लिए योजना विभाग से स्वीकृति अनिवार्य है।
यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है, तो उसके खिलाफ राजस्व संहिता की धारा 248 और नगर निवेश अधिनियम की धारा 52 के तहत कार्रवाई हो सकती है — जिसमें जुर्माना, निर्माण ध्वस्तीकरण और भूमि की जब्ती तक का प्रावधान है। फिर सवाल उठता है — जब कानून इतना स्पष्ट है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
गन्नाबाड़ी की घटना ने पूरे जिले को जगाया
बैतूल जिले में यह मामला अब सुर्खियों में है। कई सामाजिक संगठनों ने इस पर कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है। “हरित बैतूल अभियान” नामक संस्था के संयोजक दीपक भोसले का कहना है —
“यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सांसों का सवाल है। खेती की मिट्टी बची रही, तभी बैतूल हरा रहेगा।”
उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन कार्रवाई नहीं करता, तो वे ग्रामीणों के साथ धरना प्रदर्शन करेंगे।
सरकार की नीतियाँ बनाम जमीनी हकीकत
सरकार एक तरफ “लालफीताशाही खत्म करने” और “आवासीय विकास को बढ़ावा देने” की बात करती है, वहीं दूसरी ओर अनियंत्रित अवैध कॉलोनीकरण को रोकने में नाकाम दिखाई देती है।
ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारी कहते हैं कि वे कानूनी कॉलोनाइजेशन के लिए ई-गवर्नेंस सिस्टम बना रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अब भी दलाल और बिचौलिये ही असली नियंत्रण में हैं।
ग्रामीणों की मांग: सर्वे कराकर कार्रवाई की जाए
गन्नाबाड़ी के किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे इलाके का ड्रोन सर्वे कराया जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कितनी कृषि भूमि को अवैध रूप से कॉलोनी में बदला गया है। वे चाहते हैं कि दोषियों पर मामला दर्ज हो और उन किसानों को न्याय मिले, जिनकी जमीन बिना अनुमति काटी गई है।
क्या होगा आगे?
कलेक्टर कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, अब इस मामले में संयुक्त निरीक्षण दल बनाया जा रहा है जिसमें राजस्व, नगर निवेश और ग्राम पंचायत अधिकारी शामिल होंगे। लेकिन यह टीम कब तक कार्रवाई करेगी, यह अब भी सवाल बना हुआ है।
निष्कर्ष: अवैध कॉलोनी सिर्फ ज़मीन नहीं, सोच की चोरी है
गन्नाबाड़ी का यह मामला हमें याद दिलाता है कि विकास का मतलब केवल इमारतें नहीं, बल्कि संतुलन भी है। जब खेती की जमीनें कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होती हैं, तो सिर्फ भूगोल नहीं, जीवनशैली भी बदल जाती है।
यदि प्रशासन ने अब भी आंखें मूंदे रखीं, तो गन्नाबाड़ी जैसे गाँव इतिहास बन जाएंगे — और तब हम सिर्फ यह कह पाएंगे कि “कभी यहां खेत हुआ करते थे…”
