ईरान अमेरिका शांति वार्ता इस समय पश्चिम एशिया की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक कहानी बन चुकी है। युद्ध, जवाबी हमले, होर्मुज़ स्ट्रेट पर बढ़ता तनाव और खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं के बीच हर नजर इस बात पर टिकी है कि क्या वाशिंगटन और तेहरान किसी स्थायी समझौते तक पहुंच पाएंगे। यह केवल दो देशों के बीच का मामला नहीं है, बल्कि पूरी खाड़ी की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक स्थिरता इससे जुड़ी हुई है।

हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। इससे कतर, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान जैसे देशों की चिंता और बढ़ गई। इन देशों के लिए यह सिर्फ सैन्य खतरा नहीं था, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और निवेश सुरक्षा का भी गंभीर सवाल बन गया।
इसी पृष्ठभूमि में ईरान अमेरिका शांति वार्ता को लेकर हर खाड़ी देश का रुख अलग दिखाई देता है। कोई ईरान के खिलाफ बेहद सख्त भाषा का इस्तेमाल कर रहा है, तो कोई संवाद और मध्यस्थता पर जोर दे रहा है। यही अंतर इस पूरे भू-राजनीतिक समीकरण को और दिलचस्प बनाता है।
ईरान अमेरिका शांति वार्ता और खाड़ी देशों की साझा चिंता
ईरान अमेरिका शांति वार्ता को लेकर खाड़ी देशों की पहली और सबसे बड़ी चिंता होर्मुज़ स्ट्रेट है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का बेहद महत्वपूर्ण केंद्र है। यदि यहां आवाजाही बाधित होती है, तो तेल और गैस की वैश्विक कीमतों पर सीधा असर पड़ता है।
हालिया युद्ध के दौरान इस स्ट्रेट पर तनाव ने सभी देशों को सतर्क कर दिया। जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर दिखाई देने लगा। यही कारण है कि लगभग सभी खाड़ी देशों ने युद्धविराम के बाद सबसे पहले समुद्री रास्तों की सुरक्षा की बात उठाई।
दूसरी साझा चिंता ईरान की मिसाइल क्षमता और उसके क्षेत्रीय सहयोगी समूहों को लेकर है। कई देशों का मानना है कि यदि इन गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो शांति लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी।
ईरान अमेरिका शांति वार्ता में सबसे सख्त रुख वाला देश कौन
यदि ईरान अमेरिका शांति वार्ता के संदर्भ में सबसे कड़ा रुख देखने की बात करें, तो संयुक्त अरब अमीरात सबसे मुखर आलोचक के रूप में सामने आता है।
यूएई ने ईरान के हमलों को केवल जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि सीधी आक्रामकता बताया है। उसने खुले तौर पर कहा कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ईरान की मिसाइल क्षमता, ड्रोन नेटवर्क, परमाणु कार्यक्रम और उसके समर्थित प्रॉक्सी समूहों पर कठोर कार्रवाई जरूरी है।
यूएई की चिंता सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है। दुबई और अबू धाबी जैसे आर्थिक केंद्र वैश्विक व्यापार, निवेश और पर्यटन पर निर्भर हैं। किसी भी सैन्य तनाव का सीधा असर उनकी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
इसी कारण यूएई ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बिना शर्त पूरी तरह खोलने की मांग की है। उसने युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए मुआवजे की भी बात उठाई है। इतना ही नहीं, जरूरत पड़ने पर अमेरिकी कार्रवाई के समर्थन के संकेत भी दिए गए।
यही वजह है कि ईरान अमेरिका शांति वार्ता में यूएई को सबसे सख्त पक्ष माना जा रहा है।
सऊदी अरब का संतुलित लेकिन रणनीतिक दबाव
सऊदी अरब का रुख पहली नजर में संतुलित लगता है, लेकिन इसके पीछे गहरी रणनीतिक सोच है। ईरान अमेरिका शांति वार्ता में रियाद शांति चाहता है, लेकिन वह ऐसी शांति चाहता है जिसमें ईरान की सैन्य शक्ति सीमित हो।
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था अभी भी बड़े स्तर पर तेल पर निर्भर है। विजन 2030 के तहत विविधीकरण की कोशिशें जारी हैं, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता इन योजनाओं के लिए खतरा बन सकती है।
यमन में हूती विद्रोहियों को लेकर सऊदी की चिंता अलग है। रियाद लंबे समय से मानता है कि ईरान का प्रभाव क्षेत्रीय असंतुलन पैदा करता है।
हालांकि 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच रिश्तों में नरमी आई थी, लेकिन भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हुआ। इसलिए सऊदी अरब बातचीत का समर्थन करता है, लेकिन मजबूत अमेरिकी दबाव को भी जरूरी मानता है।
कतर की प्राथमिकता स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा
ईरान अमेरिका शांति वार्ता में कतर का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत व्यावहारिक और मध्यस्थता केंद्रित है। कतर के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा प्रवाह की सुरक्षा है।
कतर दुनिया के बड़े गैस निर्यातकों में से एक है। होर्मुज़ स्ट्रेट और समुद्री मार्गों की सुरक्षा उसके आर्थिक हितों से सीधे जुड़ी है।
कतर ने लगातार युद्धविराम को मजबूत करने और उसे स्थायी शांति में बदलने की बात कही है। वह किसी एक पक्ष की खुली आलोचना करने के बजाय बहुपक्षीय संवाद के ढांचे पर जोर देता है।
कतर यह भी मानता है कि समुद्री सुरक्षा किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक व्यवस्था का हिस्सा होनी चाहिए। इसी कारण वह पाकिस्तान, अमेरिका और अन्य मध्यस्थों के साथ समन्वय बनाए हुए है।
बहरीन का स्पष्ट सुरक्षा केंद्रित रुख
बहरीन ने ईरान अमेरिका शांति वार्ता के दौरान सुरक्षा और जवाबदेही दोनों पर जोर दिया है। उसने युद्धविराम का स्वागत जरूर किया, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट किया कि ईरान के परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों पर नियंत्रण जरूरी है।
बहरीन ने ईरान समर्थित क्षेत्रीय नेटवर्क को भी अस्थिरता का बड़ा कारण बताया। उसने हमलों से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग की और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया।
बहरीन का रुख सऊदी और यूएई के करीब माना जाता है, हालांकि उसकी भाषा अपेक्षाकृत संयमित रही है।
कुवैत का फोकस संप्रभुता और समुद्री कानून
कुवैत का दृष्टिकोण अधिक कानूनी और संस्थागत दिखाई देता है। ईरान अमेरिका शांति वार्ता में उसने सबसे ज्यादा जोर अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सम्मान पर दिया है।
कुवैत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी देश को समुद्री मार्गों पर दबाव बनाने का अधिकार नहीं है। उसने संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून के तहत मुक्त आवाजाही की गारंटी की बात उठाई।
ड्रोन हमलों और मिसाइल खतरों के बाद कुवैत ने सुरक्षा को गंभीरता से लिया है, लेकिन उसका जोर प्रत्यक्ष टकराव की बजाय नियम आधारित व्यवस्था पर अधिक है।
ईरान अमेरिका शांति वार्ता में सबसे नरम रुख किसका
यदि सबसे नरम और संवाद केंद्रित रुख की बात करें, तो ओमान इस सूची में सबसे अलग खड़ा दिखाई देता है।
ओमान लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। उसकी विदेश नीति का मूल सिद्धांत है—सभी के मित्र, किसी के शत्रु नहीं।
ओमान ने न केवल युद्धविराम का समर्थन किया, बल्कि अमेरिका की आलोचना भी की जब उसे लगा कि तनाव बढ़ाने में बाहरी भूमिका अधिक है। उसने बार-बार यह संदेश दिया कि स्थायी समाधान केवल बातचीत से ही निकल सकता है।
मस्कट की रणनीति यह है कि जीसीसी की सदस्यता और ईरान के साथ पुराने संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। होर्मुज़ स्ट्रेट की निगरानी और सुरक्षित समुद्री यातायात को लेकर ओमान ने सीधे तेहरान के साथ समन्वय की कोशिश भी की है।
इसी कारण ईरान अमेरिका शांति वार्ता में ओमान को सबसे नरम और सबसे प्रभावी संवादकर्ता माना जाता है।
क्या जीसीसी एक समान नीति बना पाएगा
यह बड़ा सवाल है कि क्या गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के सदस्य देश ईरान को लेकर एक साझा रणनीति बना पाएंगे।
सुरक्षा चिंताएं लगभग समान हैं, लेकिन समाधान को लेकर मतभेद स्पष्ट हैं। यूएई और सऊदी जहां कठोर नियंत्रण चाहते हैं, वहीं ओमान और कतर संवाद को प्राथमिकता देते हैं।
ऐसी स्थिति में किसी भी अमेरिका-ईरान समझौते की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि खाड़ी देशों की न्यूनतम साझा अपेक्षाएं क्या हैं।
यदि समझौते में होर्मुज़ की सुरक्षा, परमाणु सीमाएं और प्रॉक्सी नेटवर्क पर नियंत्रण शामिल होता है, तो व्यापक समर्थन मिल सकता है।
