Success Story अक्सर हमें यह सिखाती है कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो तो मंजिल दूर नहीं रहती। दिल्ली के अवनीत सिंह कोहली उर्फ सन्नी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय ऐसा था जब उनके परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी चुनौती बन गया था। पिता की फैक्ट्री बंद हो गई, इलाज के लिए संपत्ति बिक गई और घर की आर्थिक स्थिति पूरी तरह डगमगा गई। लेकिन इसी संघर्ष ने एक ऐसे कारोबारी को जन्म दिया जिसने आज सेकेंड हैंड लग्जरी कारों के कारोबार में अपनी अलग पहचान बना ली।

आज वही परिवार करोड़ों रुपये की लग्जरी कारों की डील करता है। कंपनी का टर्नओवर 216 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और आने वाले वर्षों में इसे 500 करोड़ तक ले जाने की तैयारी चल रही है। यह सिर्फ व्यापार की कहानी नहीं, बल्कि धैर्य, जोखिम और लगातार सीखते रहने की मिसाल है।
Success Story की शुरुआत बचपन के संघर्ष से
दिल्ली के शालीमार बाग में जन्मे अवनीत सिंह एक सामान्य कारोबारी परिवार से थे। परिवार का जीवन आरामदायक था। उनके पिता इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे वाशिंग मशीन, टीवी और स्टीरियो सिस्टम बनाने का काम करते थे। कारोबार अच्छा चल रहा था और भविष्य सुरक्षित दिखाई देता था।
लेकिन जिंदगी ने अचानक करवट ली। जब अवनीत आठवीं कक्षा में थे, तभी उनके पिता एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गए। यह हादसा सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं था, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक रीढ़ टूटने जैसा था। पिता कई वर्षों तक बिस्तर पर रहे। इलाज में फैक्ट्री बिक गई, फिर बची हुई संपत्ति भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी।
घर की हालत इतनी खराब हो गई कि दवाइयों और खाने के बीच चुनाव करना पड़ता था। कई बार यह सोचना पड़ता था कि अगला दिन कैसे निकलेगा। यही वह दौर था जिसने अवनीत को बहुत जल्दी जीवन की वास्तविकता से परिचित करा दिया।
जब 20 हजार रुपये ने बदली दिशा
साल 1999 में परिवार ने एक बार फिर शुरुआत करने का फैसला किया। अवनीत के पिता ने घर के गहने बेचकर लगभग 20 हजार रुपये जुटाए। इसी छोटी पूंजी से स्टेबलाइजर बनाने का काम शुरू किया गया।
उस समय दिल्ली में बिजली की गुणवत्ता उतनी बेहतर नहीं थी। घरों में वोल्टेज की समस्या आम थी और लगभग हर परिवार को स्टेबलाइजर की जरूरत होती थी। यह बाजार छोटा जरूर था, लेकिन स्थिर था।
अवनीत ने भी पढ़ाई के साथ पिता का हाथ बंटाना शुरू किया। साल 2000 तक वे पूरी तरह इस काम से जुड़ गए। उन्होंने सिर्फ काम नहीं सीखा, बल्कि ग्राहक को समझना, बाजार की जरूरत पहचानना और भरोसा बनाना भी सीखा।
यही अनुभव आगे उनके बड़े कारोबार की नींव बना।
Success Story में पहला बड़ा झटका
कुछ सालों तक स्टेबलाइजर का कारोबार ठीक चला। परिवार की स्थिति सुधरने लगी। लगा कि मुश्किल समय पीछे छूट चुका है। लेकिन बाजार हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
जब दिल्ली में बिजली वितरण व्यवस्था निजी कंपनियों के हाथों में गई, तो बिजली की गुणवत्ता तेजी से सुधरने लगी। लोगों को स्टेबलाइजर की जरूरत कम पड़ने लगी। धीरे-धीरे यह कारोबार लगभग खत्म होने लगा।
यह एक और बड़ा झटका था। लेकिन इस बार अवनीत पहले जैसे नहीं थे। अब उनके पास अनुभव था, आत्मविश्वास था और जोखिम लेने की हिम्मत भी।
उन्होंने तय किया कि अब नया रास्ता तलाशना होगा।
सेकेंड हैंड कार कारोबार की तरफ कदम
अवनीत ने देखा कि सेकेंड हैंड कारों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। लोग नई कार की जगह अच्छी स्थिति वाली पुरानी कार खरीदने में रुचि दिखा रहे थे। खासकर दिल्ली जैसे शहर में यह बाजार तेजी से फैल रहा था।
उन्होंने पहले सीखने का फैसला किया। करोल बाग में एक परिचित कारोबारी के पास जाकर काम समझना शुरू किया। लगभग एक साल तक उन्होंने बाजार की बारीकियां सीखीं—गाड़ी की असली कीमत कैसे तय होती है, ग्राहक किस आधार पर फैसला लेता है, भरोसा कैसे बनाया जाता है और बिक्री के बाद संबंध कैसे बनाए जाते हैं।
यह सीख बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई।
पहला प्रयास असफल रहा
सीखने के बाद उन्होंने एक फ्लैट बेचकर पूंजी जुटाई और अपना पहला सेकेंड हैंड कार कारोबार शुरू किया। लेकिन व्यापार उम्मीद के मुताबिक नहीं चला। कुछ ही महीनों में उन्हें नुकसान झेलना पड़ा और काम बंद करना पड़ा।
यह वह मोड़ था जहां कई लोग हार मान लेते हैं। लेकिन अवनीत ने इसे असफलता नहीं, सीख माना। उन्होंने समझा कि सिर्फ बाजार में उतरना काफी नहीं है, सही सेगमेंट चुनना भी जरूरी है।
यहीं से उनकी असली Success Story ने नया मोड़ लिया।
लग्जरी कारों में दिखा बड़ा अवसर
उन्होंने महसूस किया कि सामान्य सेकेंड हैंड कारों की तुलना में लग्जरी कारों का बाजार अलग है। यहां ग्राहक कम होते हैं, लेकिन भरोसा और मार्जिन दोनों बड़े होते हैं।
साल 2011 में उन्होंने नारायणा में एक छोटी सी जगह पर ‘ऑटो बेस्ट’ नाम से शोरूम शुरू किया। जगह लगभग 800 वर्ग फुट की थी और वहां एक समय में 6 से 8 गाड़ियां ही रखी जा सकती थीं।
उस समय पजेरो, क्रूज, वेरना, एकॉर्ड, एल्टिस जैसी प्रीमियम गाड़ियां उनकी इन्वेंट्री का हिस्सा थीं। हर महीने 4 से 5 गाड़ियां बिकती थीं। शुरुआत छोटी थी, लेकिन दिशा सही थी।
यही सही दिशा आगे साम्राज्य में बदल गई।
इंटरनेट ने कारोबार को दी रफ्तार
जब उन्होंने शोरूम शुरू किया, उसी समय इंटरनेट पर सेकेंड हैंड कारों की खरीद-बिक्री का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा था। यह उनके लिए बड़ा अवसर बन गया।
ऑनलाइन लिस्टिंग से ग्राहक सिर्फ स्थानीय नहीं रहे। दूसरे शहरों और राज्यों से भी पूछताछ आने लगी। भरोसेमंद प्रीमियम कार विक्रेता के रूप में उनकी पहचान बनने लगी।
हर महीने बिक्री बढ़ने लगी। ग्राहक अनुभव बेहतर हुआ और रेफरल से नया नेटवर्क बनता गया।
यही वह दौर था जब उनका कारोबार तेजी से ऊपर उठने लगा।
भाई के साथ मिलकर बना बड़ा ब्रांड
साल 2013 में उनके भाई जसप्रीत सिंह उर्फ हन्नी भी इस कारोबार से जुड़ गए। दोनों भाइयों ने मिलकर व्यापार को अगले स्तर पर ले जाने का फैसला किया।
दिल्ली के अशोक विहार में बड़ा शोरूम खोला गया। यहां 25 गाड़ियों तक की इन्वेंट्री रखी जा सकती थी। इससे ग्राहक अनुभव और बेहतर हुआ।
फिर कंपनी का नाम बदलकर ‘ऑटो बेस्ट एंपेरियो’ रखा गया। यह सिर्फ नाम का बदलाव नहीं था, बल्कि ब्रांड की नई पहचान थी।
उन्होंने ग्राहकों को सिर्फ कार नहीं, एक प्रीमियम अनुभव देना शुरू किया।
जब लोगों ने कहा पागलपन है
नारायणा में बड़े किराए पर एक एक्सपीरियंस सेंटर बनाया गया। यह पारंपरिक कार शोरूम जैसा नहीं था। इसे लगभग एक लग्जरी रेस्टोरेंट जैसे अनुभव के साथ तैयार किया गया।
कई लोगों ने कहा कि यह अनावश्यक खर्च है। लोगों को लगा कि सेकेंड हैंड कारों के लिए इतना प्रीमियम सेटअप बेकार है।
लेकिन अवनीत जानते थे कि लग्जरी ग्राहक सिर्फ उत्पाद नहीं खरीदता, वह अनुभव खरीदता है।
उनका यह निर्णय सही साबित हुआ। बिक्री तेजी से बढ़ी और हर महीने 30 से 35 गाड़ियां बिकने लगीं।
Success Story में कोरोना काल बना अवसर
जहां कई कारोबार कोरोना के दौरान संघर्ष कर रहे थे, वहीं लग्जरी सेकेंड हैंड कार बाजार में नई मांग पैदा हुई। लोग निजी वाहन को प्राथमिकता देने लगे।
नई कारों की डिलीवरी में देरी हो रही थी। ऐसे में अच्छी स्थिति वाली प्रीमियम सेकेंड हैंड कारों की मांग अचानक बढ़ गई।
ऑटो बेस्ट एंपेरियो ने इस अवसर को सही समय पर पहचाना। नए अनुभव केंद्र खुले और कारोबार राष्ट्रीय स्तर पर फैलने लगा।
यहीं से कंपनी ने कई गुना तेज़ी पकड़ी।
आज 216 करोड़ का टर्नओवर
आज कंपनी मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी, लैम्बोरगिनी, वोल्वो, बेंटले, लैंड रोवर जैसी लग्जरी कारों की डील करती है।
यहां 50 लाख रुपये से लेकर 7-8 करोड़ रुपये तक की कारें उपलब्ध होती हैं। ग्राहकों में बड़े उद्योगपति, कारोबारी और फिल्म जगत से जुड़े नाम शामिल हैं।
कंपनी का वार्षिक टर्नओवर 216 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। हर समय 50 से 60 करोड़ रुपये की इन्वेंट्री मौजूद रहती है।
यह किसी सपने जैसा लगता है, लेकिन इसकी नींव संघर्ष पर बनी है।
Success Story से मिलने वाले बड़े सबक
यह कहानी सिर्फ पैसे कमाने की नहीं है। यह बताती है कि असफलता अंत नहीं होती।
पहला सबक है—बाजार बदलता है, इसलिए खुद को भी बदलना पड़ता है।
दूसरा सबक है—सीखने में कभी शर्म नहीं करनी चाहिए। अवनीत ने पहले काम सीखा, फिर व्यापार शुरू किया।
तीसरा सबक है—ग्राहक अनुभव ही असली ब्रांड बनाता है।
और सबसे बड़ा सबक—कठिन समय स्थायी नहीं होता, लेकिन मजबूत इरादा स्थायी हो सकता है।
भविष्य की बड़ी तैयारी
अब कंपनी का लक्ष्य अगले तीन वर्षों में 500 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल करना है। इसके साथ ही आईपीओ लाने की तैयारी भी की जा रही है।
अगर यह योजना सफल होती है, तो यह सेकेंड हैंड लग्जरी कार बाजार में एक और बड़ा मील का पत्थर होगा।
अवनीत और हन्नी का मानना है कि भारत में प्रीमियम सेकेंड हैंड कार बाजार अभी शुरुआती दौर में है और आने वाले वर्षों में इसमें भारी संभावनाएं हैं।
निष्कर्ष
Success Story हमें बार-बार याद दिलाती है कि सफलता अचानक नहीं आती। उसके पीछे वर्षों का संघर्ष, गलत फैसलों से मिली सीख और लगातार आगे बढ़ने का साहस होता है।
जिस परिवार के सामने कभी रोटी का संकट था, वही आज करोड़ों की लग्जरी कारों का कारोबार चला रहा है। यह सिर्फ आर्थिक सफलता नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता की जीत है।
आज जब लोग उनकी महंगी घड़ियां, शानदार कारें और बड़े शोरूम देखते हैं, तो शायद उन्हें वह समय याद नहीं आता जब दवा खरीदना भी मुश्किल था। लेकिन असली ताकत वही यादें होती हैं।
यही Success Story हर युवा को यह विश्वास देती है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन मंजिल बहुत बड़ी हो सकती है।
