ढाका से लेकर नई दिल्ली तक कूटनीतिक गलियारों में इस समय एक ही नाम चर्चा में है — मोहम्मद यूनुस, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार। वह व्यक्ति, जिसे कभी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, आज भारत के लिए संभावित खतरे का प्रतीक बनता जा रहा है। यूनुस की हालिया गतिविधियाँ — खासकर एक विवादित नक्शे वाली किताब का विदेशी प्रतिनिधिमंडलों को उपहार में देना — इस ओर इशारा कर रही हैं कि उनके नेतृत्व में बांग्लादेश की राजनीति खतरनाक इस्लामी एजेंडे की ओर झुक रही है।

कनाडाई प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात में विवाद
13 नवंबर 2025 को ढाका के सरकारी गेस्टहाउस जमुना में मोहम्मद यूनुस ने कनाडाई प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कनाडा की सीनेटर सलमा अताउल्लाहजान कर रही थीं। उनके साथ सांसद सलमा जाहिद और समीर जुबेरी भी मौजूद थे।
इस बैठक के दौरान यूनुस ने एक किताब भेंट की, जिसके कवर पर बांग्लादेश के नक्शे की एक कलात्मक छवि बनी थी — लेकिन यही छवि विवाद की जड़ बन गई। नक्शे में बांग्लादेश की सीमाएँ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों — असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम और बंगाल के कुछ हिस्सों तक फैली हुई दिखाई दीं।
भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘कूटनीतिक भूल’ नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक संकेत है — एक ग्रेटर बांग्लादेश का प्रतीकात्मक प्रदर्शन।
क्या है ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ की अवधारणा?
यह अवधारणा 1980 के दशक से कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के बीच चर्चा में रही है।
‘सल्तनत-ए-बांग्ला’ नामक संगठन लंबे समय से इस विचार को प्रचारित कर रहा है कि भारत के पूर्वोत्तर हिस्से — विशेषकर असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र — सांस्कृतिक रूप से “बांग्लादेश का हिस्सा” हैं।
इस संगठन का लक्ष्य एक ऐसा इस्लामी राष्ट्र बनाना है जो मौजूदा बांग्लादेश से लेकर भारत के पूर्वोत्तर तक फैला हो।
यह वही सोच है जो भारत की अखंडता और आंतरिक सुरक्षा के लिए बेहद गंभीर खतरा मानी जाती है।
पहले भी दो बार कर चुके हैं यही ‘हरकत’
यह कोई पहला मौका नहीं है जब मोहम्मद यूनुस ने ऐसा कदम उठाया हो।
कुछ सप्ताह पहले उन्होंने पाकिस्तान के शीर्ष जनरल शमशाद मिर्ज़ा से मुलाकात के दौरान भी वही विवादास्पद किताब भेंट की थी।
जनरल मिर्ज़ा को पाकिस्तान में आर्मी चीफ असीम मुनीर के बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली जनरल के रूप में देखा जाता है।
इससे साफ़ है कि यूनुस का यह कदम महज़ सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश है — भारत के खिलाफ इस्लामी गठजोड़ को मज़बूत करने की कोशिश।
भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान
यूनुस पहले भी कई बार भारत के खिलाफ विवादास्पद बयान दे चुके हैं।
उन्होंने एक बार कहा था कि भारत का पूर्वोत्तर “landlocked region” है, जो समुद्र से कट चुका है — और बांग्लादेश ही उसका “guardian of the sea” है।
उनका यह बयान नई दिल्ली में उकसावे वाला और अपमानजनक माना गया।
भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तुरंत पलटवार करते हुए याद दिलाया कि भारत के पास बंगाल की खाड़ी में 6500 किमी लंबी तटरेखा है — जो उसे सागर-मित्र राष्ट्र बनाती है, न कि landlocked।
कूटनीतिक संकेत या इस्लामी रणनीति?
विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि यूनुस की गतिविधियों को केवल व्यक्तिगत गलती मानना भूल होगी।
उनकी नीतियाँ पाकिस्तान और तुर्की के साथ गहराते रिश्तों की तरफ इशारा करती हैं।
पिछले महीने वे चीन के दौरे पर गए थे और वहाँ भी उन्होंने भारत को “पूर्वी एशिया में बाधा डालने वाला देश” कहा था।
यानी, यूनुस बांग्लादेश की विदेश नीति को एक नए ध्रुव — इस्लामी वामपंथी गठजोड़ — की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
ढाका की सियासत में बढ़ती ध्रुवीकरण की लहर
बांग्लादेश की राजनीति इस समय अशांत दौर से गुजर रही है।
शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता से बाहर है, और यूनुस की अंतरिम सरकार पर इस्लामिक कट्टरपंथियों का दबाव बढ़ता जा रहा है।
ढाका की सड़कों पर हफ्तों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, और अब तो सेना की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है।
कई सूत्रों का दावा है कि पाकिस्तान की ISI और तुर्की की खुफिया एजेंसी MIT ढाका में यूनुस सरकार के संपर्क में हैं।
भारत के लिए खतरे की घंटी
भारत के लिए यह परिदृश्य बेहद संवेदनशील है।
पूर्वोत्तर में पहले से ही अवैध घुसपैठ, जनसंख्या असंतुलन और सीमा पार तस्करी जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं।
अब अगर ढाका से “ग्रेटर बांग्लादेश” जैसी सोच को वैधता मिलती है, तो यह क्षेत्रीय स्थिरता को हिला सकता है।
भारतीय खुफिया एजेंसियाँ पहले ही सतर्क हो गई हैं। RAW और IB के सूत्रों के अनुसार, यूनुस की सरकार के कुछ अधिकारी सीमा पार उग्रवादी गुटों से संपर्क में हैं।
चीन और पाकिस्तान की भूमिका
कई रिपोर्टों में कहा गया है कि चीन यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार को “कूटनीतिक ढाल” के रूप में देखता है, ताकि भारत के पूर्वी सीमांत पर दबाव बनाया जा सके।
दूसरी तरफ पाकिस्तान इस विचार को इस्लामी “उम्मा एकता” के नाम पर प्रचारित कर रहा है।
यह स्थिति दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को अस्थिर बना सकती है।
भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया
भारत ने आधिकारिक रूप से इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा —
“भारत किसी भी प्रकार के क्षेत्रीय अतिक्रमण या भ्रामक प्रचार को बर्दाश्त नहीं करेगा। भारत की भौगोलिक अखंडता अटूट है।”
नई दिल्ली अब इस मामले को कूटनीतिक मंचों पर उठाने की तैयारी कर रही है।
संभावना है कि यह मुद्दा सार्क और आसियान स्तर पर भी उठेगा।
यूनुस की छवि में गिरावट
कभी गरीबों के लिए सूक्ष्म ऋण योजना लाकर नायक बने मोहम्मद यूनुस की अंतरराष्ट्रीय छवि अब तेजी से धूमिल हो रही है।
संयुक्त राष्ट्र और वर्ल्ड बैंक के कुछ अधिकारी अब उनके “राजनीतिक रवैये” को लेकर चिंतित हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यूनुस का यह नया राजनीतिक रुख उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सत्ता लालसा का परिणाम है।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत को अब तीन स्तरों पर तैयारी करनी होगी:
- राजनयिक प्रतिक्रिया — अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यूनुस की चाल को उजागर करना।
- सीमाई सुरक्षा — पूर्वोत्तर में घुसपैठ और चरमपंथी गतिविधियों पर नियंत्रण।
- क्षेत्रीय साझेदारी — नेपाल, भूटान और म्यांमार जैसे पड़ोसियों के साथ सुरक्षा नेटवर्क को मजबूत करना।
निष्कर्ष
मोहम्मद यूनुस का ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ एजेंडा सिर्फ एक नक्शे का विवाद नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक संतुलन को हिला देने वाला संकेत है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह न केवल सतर्क रहे, बल्कि पूर्वोत्तर के विकास और एकता को अपनी प्राथमिकता बनाए।
