संस्कृत — वह भाषा जो न केवल भारत की आत्मा है बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता की चेतना का आधार भी।
बीते सप्ताह कोयम्बटूर के अमृता विश्वविद्यालय में आयोजित अखिल भारतीय राष्ट्रीय संस्कृत अधिवेशन ने इस प्राचीन भाषा को पुनः जन-जन की वाणी बनाने का संकल्प लिया।
यह अधिवेशन 7 से 9 नवंबर तक चला, जिसमें भारत सहित 27 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
सीहोर जिले की संस्कृत भारती समिति के सदस्यों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई, जिन्होंने यह दिखाया कि छोटे शहरों और गांवों में भी संस्कृत की चेतना कितनी गहराई तक जीवित है।

संस्कृत भारती का उद्देश्य: भाषा नहीं, जीवन दर्शन का प्रसार
संस्कृत भारती, एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है जो पिछले कई दशकों से यह प्रयास कर रहा है कि संस्कृत केवल मंदिरों और ग्रंथों की भाषा न रहे, बल्कि आम जनजीवन में बोले और जिए जाने वाली भाषा बने।
इस संगठन के स्वयंसेवक गांव-गांव जाकर लोगों को बोलचाल की संस्कृत सिखाते हैं, बिना किसी धर्म या पंथ के भेदभाव के।
उनका उद्देश्य यह है कि संस्कृत के माध्यम से लोग भारतीयता, नैतिकता और आत्मसम्मान का अनुभव करें।
कोयम्बटूर अधिवेशन: विश्व संस्कृत परिवार का संगम
अधिवेशन में भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, नेपाल, मॉरीशस, श्रीलंका, थाईलैंड, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
इनमें से कई विदेशी प्रतिभागी संस्कृत के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी हैं जिन्होंने संस्कृत को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया है।
कार्यक्रम का उद्घाटन अमृता विश्वविद्यालय की कुलाधिपति माता अमृतानंदमयी देवी के आशीर्वचनों के साथ हुआ। उन्होंने कहा —
“संस्कृत वह धारा है, जिसमें मानवता की आत्मा बहती है। इसे बोलना केवल भाषा का अभ्यास नहीं, बल्कि संस्कारों का अनुभव है।”
तीन दिवसीय अधिवेशन के मुख्य सत्र
अधिवेशन के दौरान कई महत्वपूर्ण सत्र हुए —
- संस्कृत और विज्ञान:
वैज्ञानिकों और भाषाविदों ने बताया कि संस्कृत केवल धार्मिक भाषा नहीं बल्कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और गणितीय संरचना में भी उपयोगी हो सकती है।
कई शोधों ने सिद्ध किया है कि संस्कृत की व्याकरणिक संरचना अत्यंत तार्किक है, जो भविष्य की तकनीकी भाषाओं के लिए आदर्श हो सकती है। - संस्कृत और भारतीय संस्कृति:
विद्वानों ने बताया कि संस्कृत केवल वेदों-उपनिषदों की भाषा नहीं, बल्कि कला, संगीत, चिकित्सा और राजनीति तक में इसकी गहरी जड़ें हैं।
आज भी आयुर्वेद, योग और दर्शन के शास्त्र इसी भाषा में अपने प्रामाणिक रूप में उपलब्ध हैं। - संस्कृत और आधुनिक शिक्षा:
शिक्षाविदों ने सुझाव दिया कि संस्कृत को केवल विषय के रूप में नहीं बल्कि “संवाद की भाषा” के रूप में प्राथमिक शिक्षा में शामिल किया जाए।
इसके लिए संस्कृत भारती की “संस्कृत संभाषण” कार्यशालाओं को देशभर में विस्तार देने का निर्णय लिया गया। - संस्कृत और विश्व संस्कृति:
विदेशी प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि संस्कृत अध्ययन ने उन्हें आत्मशांति और वैश्विक दृष्टि दी है।
जर्मनी से आई प्रोफेसर एलिसा रॉथ ने कहा — “संस्कृत ने मुझे यह सिखाया कि भाषा केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है।”
सीहोर की भागीदारी: छोटे शहर से उठी बड़ी आवाज
सीहोर जिले की संस्कृत भारती जिला समिति ने इस अधिवेशन में अपने प्रयासों का विवरण प्रस्तुत किया।
उन्होंने बताया कि जिले के कई विद्यालयों में अब संस्कृत बोलचाल की कक्षाएँ नियमित रूप से चल रही हैं।
गांव-गांव में संस्कृत सप्ताह मनाने की परंपरा भी शुरू हुई है, जिसमें बच्चे, किसान और गृहिणियाँ भी भाग लेते हैं।
संस्कृत भारती सीहोर के प्रमुख सदस्य ने कहा —
“हमारा लक्ष्य है कि आने वाले पाँच वर्षों में कम से कम एक हजार परिवार संस्कृत में वार्तालाप करने लगें।”
संस्कृत: एकता की भाषा, संस्कृति की आत्मा
संस्कृत भारत की एकमात्र भाषा है जो हर भारतीय भाषा से जुड़ी हुई है।
हिंदी, मराठी, गुजराती, बंगाली, उड़िया, असमी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल — सभी भाषाओं की जड़ें कहीं न कहीं संस्कृत से जुड़ी हैं।
इसलिए संस्कृत को पुनर्जीवित करना केवल एक भाषा को बचाना नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता को सशक्त करना है।
संस्कृत के बिना भारत की परंपरा अधूरी है।
संस्कृत और युवा पीढ़ी
आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया, तकनीक और ग्लोबल संस्कृति में रची-बसी है।
संस्कृत को उनके बीच लोकप्रिय बनाना चुनौती है, लेकिन संस्कृत भारती जैसी संस्थाएँ इसे रोचक बनाकर सिखा रही हैं।
“संस्कृत गेम्स”, “ऑनलाइन संभाषण कोर्स”, “यूट्यूब शॉर्ट्स” जैसे माध्यमों से युवा अब संस्कृत सीखने लगे हैं।
संस्कृत और अंतरराष्ट्रीय पहचान
संयुक्त राष्ट्र, जर्मनी, जापान और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में संस्कृत पर नए शोध प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
संस्कृत के श्लोक और व्याकरण अब AI आधारित अनुवाद मॉडलों में भी प्रयोग हो रहे हैं।
यह प्रमाण है कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की भी भाषा बन सकती है।
अधिवेशन का समापन: संकल्प और शपथ
अधिवेशन के अंतिम दिन सभी प्रतिनिधियों ने एक स्वर में संकल्प लिया —
“हम संस्कृत को केवल अध्ययन की नहीं, जीवन की भाषा बनाएँगे।”
साथ ही, यह निर्णय लिया गया कि अगले तीन वर्षों में देशभर में 5000 से अधिक संस्कृत संभाषण केंद्र खोले जाएंगे।
विदेशों में भी संस्कृत भारती शाखाएँ खोली जाएँगी ताकि यह भाषा विश्व बंधुत्व की आधारशिला बन सके।
संस्कृत का भविष्य उज्ज्वल क्यों है
संस्कृत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सार्वभौमिकता है।
यह भाषा किसी धर्म, जाति या क्षेत्र की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की है।
इसकी व्याकरणिक सुंदरता, शब्दों की गहराई और विचारों की व्यापकता इसे अनंत काल तक जीवित रखेगी।
निष्कर्ष
संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है।
कोयम्बटूर अधिवेशन में लिया गया यह संकल्प आने वाले युगों के लिए दिशा देगा —
जहाँ संस्कृत फिर से घर-घर बोलेगी, बच्चे संस्कृत में संवाद करेंगे, और भारत अपने स्वर्णिम संस्कारों के साथ आधुनिक युग में अग्रसर होगा।
