देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर आतंक के साये में है। कुछ हफ्ते पहले लाल किले के पास हुए बम धमाके ने पूरे देश को हिला दिया था। अब इस मामले की जांच में जो खुलासे हो रहे हैं, उन्होंने खुफिया एजेंसियों की चिंता और बढ़ा दी है। दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा, एनआईए (NIA) और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की संयुक्त जांच में यह पता चला है कि इस हमले की प्लानिंग भारत में नहीं बल्कि तुर्किये की राजधानी अंकारा से की गई थी।
सूत्रों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए आरोपियों का सीधा संपर्क एक विदेशी हैंडलर से था, जो अंकारा से ऑपरेट कर रहा था। इस व्यक्ति की पहचान कोडनेम “उकासा” (Ukasa) के नाम से हुई है — अरबी में जिसका अर्थ है मकड़ी, यानी एक ऐसा जीव जो जाल बुनता है। प्रतीकात्मक रूप से यही नाम बताता है कि कैसे यह व्यक्ति भारत में एक बड़ा आतंक का जाल बुन रहा था।

सेशन एप बना साजिश का गुप्त हथियार
जांच एजेंसियों को पता चला है कि इस पूरे नेटवर्क में एक खास एप का इस्तेमाल किया गया — “Session App”। यह एक ऐसा एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप है, जिसमें न तो मोबाइल नंबर की जरूरत होती है और न ही ईमेल आईडी की। संदेश सीधे एक ब्लॉकचेन आधारित आईडी के जरिये भेजे जाते हैं, जिससे उनका ट्रैक करना लगभग असंभव होता है। यही कारण है कि जांच एजेंसियों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
सेशन एप के जरिए अंकारा में बैठा “उकासा” भारतीय डॉक्टरों और प्रोफेसरों से जुड़ा रहा। फंडिंग, निर्देश और कट्टरपंथी कंटेंट सब कुछ इसी एप के जरिये शेयर किया गया।
दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ी चौंकाने वाली कड़ियां
जांच में अब तक तीन बड़े खुलासे हुए हैं —
- पहला: जनवरी 2025 में ही हमले की योजना बन चुकी थी।
गिरफ्तार आरोपी डॉ. मुजम्मिल गनी (Al-Falah University, फरीदाबाद) और डॉ. उमर नबी ने कई बार लाल किले की रेकी की। वे वहां की सुरक्षा व्यवस्था, गश्त के समय और लोगों की भीड़ का विश्लेषण कर रहे थे। प्रारंभिक लक्ष्य 26 जनवरी था, लेकिन सुरक्षा बढ़ने के कारण साजिश नाकाम रही। - दूसरा: 6 दिसंबर को दिल्ली में दूसरा धमाका करने की योजना थी। लेकिन डॉ. मुजम्मिल की गिरफ्तारी के बाद प्लान विफल हो गया।
इस मॉड्यूल का केंद्र फरीदाबाद में था और इसमें 8 आरोपी शामिल थे, जिनमें 6 डॉक्टर बताए जा रहे हैं। डॉ. निसार अहमद, जो श्रीनगर का रहने वाला और डॉक्टर्स एसोसिएशन ऑफ कश्मीर का अध्यक्ष था, अब भी फरार है। - तीसरा: डॉ. मुजम्मिल गनी विस्फोटक सामग्री को खाद की बोरियों के नाम पर किराए के कमरे में जमा कर रहा था। उसने पड़ोसियों को बताया था कि यह कृषि सामग्री है जिसे कश्मीर ले जाना है। पुलिस को वहां से कई विस्फोटक पदार्थ, वायरिंग और डेटोनेटर मिले।
तुर्किये ने सभी आरोपों को बताया निराधार
इन खुलासों के बाद तुर्किये सरकार ने एक आधिकारिक बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि भारत या किसी भी अन्य देश में तुर्किये द्वारा किसी तरह के आतंक को बढ़ावा देने का आरोप पूरी तरह झूठा और निराधार है। तुर्किये ने कहा —
“हम हर तरह के आतंकवाद का विरोध करते हैं, चाहे वह कहीं भी हो। इस तरह की खबरें दोनों देशों के आपसी रिश्तों को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से फैलाई जा रही हैं।”
हालांकि भारतीय जांच एजेंसियों ने दावा किया है कि उनके पास डिजिटल सबूत, सर्वर लॉग्स, और सेशन एप चैट डेटा जैसे प्रमाण मौजूद हैं, जो अंकारा स्थित सर्वर से जुड़े हैं।
अल-फलाह यूनिवर्सिटी फिर विवादों में
दिल्ली ब्लास्ट कांड में एक और नाम सामने आया — फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी। इस यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले कई शिक्षक, जिनमें डॉ. मुजम्मिल भी शामिल है, जांच के घेरे में हैं। यह वही विश्वविद्यालय है जिसे हाल ही में NAAC ने “झूठी मान्यता दिखाने” के लिए नोटिस जारी किया था। अब दिल्ली ब्लास्ट मामले में इसके प्रोफेसरों के नाम आने से यह संस्थान दोहरी जांच के दायरे में आ गया है। एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि क्या यूनिवर्सिटी के ट्रस्ट फंड्स या अन्य स्रोतों का इस्तेमाल किसी तरह आतंक की फंडिंग में हुआ।
कैसे बना डॉक्टरों का आतंकी नेटवर्क
इस मॉड्यूल का सबसे हैरान करने वाला पहलू है कि इसमें अधिकांश आरोपी डॉक्टर हैं। इनमें से कुछ ने तुर्किये में मेडिकल कॉन्फ्रेंस के नाम पर यात्रा की थी, लेकिन वास्तव में उनका मकसद वहां कट्टरपंथी प्रशिक्षण लेना था। जांच में यह भी पाया गया कि कुछ डॉक्टरों ने सीरिया और जॉर्डन से भी ऑनलाइन कोर्स और ट्रेनिंग सेशन लिए थे।
खुफिया सूत्रों का कहना है कि कट्टरपंथी विचारधारा को ‘ह्यूमैनिटेरियन हेल्थ मिशन’ के नाम पर फैलाया जा रहा था। सेशन एप के जरिये “उकासा” उनके विचारों को नियंत्रित करता और ऑपरेशन की योजना बनाता था।
लाल किला क्यों था निशाने पर
भारत के प्रतीक चिन्हों में से एक — लाल किला, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस दोनों का ऐतिहासिक स्थल है। यहां किसी भी हमले का मतलब होता है भारत की अस्मिता पर हमला। इसी कारण इसे निशाना चुना गया था। जनवरी में कड़ी सुरक्षा के कारण हमले की योजना नाकाम रही, लेकिन आरोपियों ने दिसंबर में दूसरा मौका तलाशने की कोशिश की।
सेशन एप और एन्क्रिप्शन की चुनौती
सेशन एप की खासियत यह है कि यह डिसेंट्रलाइज्ड नेटवर्क पर चलता है। यह किसी कंपनी के सर्वर पर नहीं बल्कि नोड्स पर आधारित होता है। इसका मतलब है कि भारत में किसी यूजर के मैसेज का डेटा किसी विदेशी देश में हो सकता है। इसलिए भारत की एजेंसियों के लिए इसे ट्रेस करना लगभग असंभव है। एनआईए ने इस मामले में ऑस्ट्रेलियन साइबर सिक्योरिटी यूनिट से मदद मांगी है, क्योंकि सेशन एप का मुख्य डेवलपर ऑस्ट्रेलिया में स्थित है।
भारत की सुरक्षा एजेंसियों की नई रणनीति
इस हमले के बाद गृह मंत्रालय ने सभी खुफिया एजेंसियों को निर्देश दिया है कि:
- एन्क्रिप्टेड एप्स जैसे टेलीग्राम, सिग्नल, सेशन पर निगरानी बढ़ाई जाए।
- संवेदनशील शिक्षण संस्थानों में कार्यरत विदेशी मूल के कर्मचारियों की बैकग्राउंड जांच की जाए।
- विश्वविद्यालयों में साइबर सुरक्षा सेल स्थापित किए जाएं।
इसके साथ ही, डिजिटल कम्युनिकेशन ट्रैकिंग बिल का प्रारूप भी तेजी से तैयार किया जा रहा है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई आसान हो सके।
निष्कर्ष
दिल्ली ब्लास्ट सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं बल्कि भारत के सामने खड़ी डिजिटल आतंकवाद की नई चुनौती है। अब आतंकवादी न तो सीमाओं पर हमला करते हैं, न खुले प्रशिक्षण शिविरों में दिखते हैं — वे क्लासरूम, लैब्स और एन्क्रिप्टेड चैट्स में छिपे हैं। भारत के लिए यह लड़ाई सिर्फ बंदूकों की नहीं बल्कि डेटा, विचार और तकनीक की भी है।
