आरआईसी वैश्विक व्यवस्था को लेकर दुनिया में अचानक चर्चा तेज हो गई है। रूस के राजनीतिक चिंतक एलेक्जेंडर डुगिन के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। डुगिन का मानना है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों का लंबे समय से चला आ रहा प्रभुत्व अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है और आने वाले समय में दुनिया बहुध्रुवीय स्वरूप की तरफ बढ़ सकती है। इस सोच के केंद्र में रूस, भारत और चीन का संभावित सामरिक समीकरण मौजूद है, जिसे आरआईसी यानी रूस-इंडिया-चाइना ढांचे के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि वैश्विक राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञ अब इस संभावना पर गंभीर चर्चा कर रहे हैं कि क्या वास्तव में विश्व व्यवस्था में बड़ा बदलाव आने वाला है।

दुनिया के राजनीतिक इतिहास में अक्सर वही शक्तियां लंबे समय तक प्रभावशाली बनीं जिन्होंने सैन्य ताकत, आर्थिक क्षमता और वैचारिक प्रभाव का संतुलन कायम रखा। बीते तीन दशकों में अमेरिका ने यह स्थिति लगभग अकेले संभाली। लेकिन अब चीन की आर्थिक उछाल, रूस की सैन्य सक्रियता और भारत की तेजी से बढ़ती रणनीतिक भूमिका ने वैश्विक समीकरणों को नया आकार देना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि आरआईसी वैश्विक व्यवस्था शब्द सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं बल्कि भविष्य की संभावित शक्ति संरचना के रूप में देखा जा रहा है।
पश्चिमी प्रभुत्व की लंबी कहानी
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने वैश्विक राजनीति में जिस तरह अपनी स्थिति मजबूत की, उसने पूरी दुनिया की दिशा बदल दी। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, नाटो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। आर्थिक नीतियों से लेकर सुरक्षा रणनीति तक लगभग हर बड़े फैसले में पश्चिमी देशों की भूमिका निर्णायक रही। सोवियत संघ के विघटन के बाद तो अमेरिका लगभग निर्विवाद महाशक्ति बन गया था। उस दौर में दुनिया के अधिकांश देशों को यह लगने लगा था कि आने वाले कई दशकों तक अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देना संभव नहीं होगा।
लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलती गई। चीन ने अपने आर्थिक विस्तार के जरिए पूरी दुनिया के व्यापारिक ढांचे में गहरी पैठ बनाई। रूस ने भी अपने सैन्य और ऊर्जा संसाधनों के सहारे पश्चिमी दबाव का विरोध शुरू किया। मध्य एशिया, यूरोप और पश्चिम एशिया में रूस की सक्रियता ने यह संकेत देना शुरू कर दिया कि मॉस्को अब सिर्फ क्षेत्रीय शक्ति बनकर नहीं रहना चाहता। इसी दौरान भारत ने भी वैश्विक मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान को मजबूती से स्थापित किया। यही वह मोड़ था जहां आरआईसी वैश्विक व्यवस्था जैसी अवधारणाओं को गंभीरता से देखा जाने लगा।
आरआईसी वैश्विक व्यवस्था क्यों चर्चा में
रूस और चीन लंबे समय से अमेरिका की एकध्रुवीय व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। दोनों देशों का मानना है कि वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में केवल पश्चिमी देशों का वर्चस्व लोकतांत्रिक संतुलन के खिलाफ है। चीन जहां आर्थिक शक्ति के माध्यम से प्रभाव बढ़ा रहा है, वहीं रूस सैन्य और ऊर्जा नीति के जरिए अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। ऐसे में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि भारत एक ऐसा देश है जिसके पश्चिमी देशों से भी मजबूत संबंध हैं और रूस के साथ भी ऐतिहासिक सामरिक सहयोग कायम है।
आरआईसी वैश्विक व्यवस्था की चर्चा इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि दुनिया तेजी से भू-राजनीतिक संघर्षों के दौर में प्रवेश कर चुकी है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, ताइवान संकट और वैश्विक व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संबंध और अधिक जटिल होने वाले हैं। ऐसे माहौल में कई देश अब अमेरिका पर पूर्ण निर्भरता से बचने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि ब्रिक्स जैसे मंचों को भी नई ताकत मिलती दिखाई दे रही है।
डुगिन के बयान का असर
एलेक्जेंडर डुगिन को रूस में प्रभावशाली वैचारिक रणनीतिकार माना जाता है। उन्हें अक्सर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में भी देखा जाता है। डुगिन लंबे समय से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं। उनका तर्क है कि दुनिया को केवल एक शक्ति केंद्र से नियंत्रित नहीं किया जा सकता और क्षेत्रीय सभ्यताओं को भी बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए।
हाल ही में उन्होंने कहा कि अगर भारत भी रूस और चीन के साथ व्यापक रणनीतिक समझ विकसित करता है तो दुनिया में चार प्रमुख ध्रुव बन सकते हैं। यह बयान केवल कूटनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि एक बड़ी रणनीतिक सोच का हिस्सा माना जा रहा है। रूस के भीतर यह धारणा मजबूत हो रही है कि आने वाले समय में एशियाई देशों का प्रभाव तेजी से बढ़ेगा और पश्चिमी देशों की निर्णायक भूमिका धीरे-धीरे कम होगी। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल विचारधारा के स्तर पर किसी गठजोड़ की बात करना आसान है लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इसे लागू करना बेहद कठिन होगा।
भारत की संतुलित विदेश नीति
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक संतुलन पर आधारित रही है। भारत ने कभी भी पूरी तरह किसी एक गुट के साथ खुद को नहीं जोड़ा। शीत युद्ध के दौर में गुटनिरपेक्ष आंदोलन इसका उदाहरण था और आज भी भारत उसी सोच को आधुनिक रूप में आगे बढ़ाता दिखाई देता है। भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और व्यापारिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं रूस से रक्षा सहयोग बनाए हुए है। दूसरी तरफ चीन के साथ सीमा विवाद होने के बावजूद आर्थिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
यही संतुलन भारत को आरआईसी वैश्विक व्यवस्था में सबसे अलग स्थान देता है। भारत न तो पूरी तरह पश्चिम विरोधी मंच का हिस्सा बनना चाहता है और न ही चीन-रूस धुरी के अधीन रहना चाहता है। नई दिल्ली की रणनीति स्पष्ट रूप से यह संकेत देती है कि वह खुद को स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहती है। यही वजह है कि भारत हर मंच पर रणनीतिक स्वायत्तता शब्द का उपयोग करता है।
चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा
दुनिया की राजनीति में चीन की भूमिका सबसे तेजी से बदली है। कुछ दशक पहले तक केवल विनिर्माण केंद्र के रूप में देखे जाने वाला चीन अब तकनीक, रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक व्यापार का बड़ा केंद्र बन चुका है। बेल्ट एंड रोड परियोजना के जरिए चीन ने एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ाया है।
लेकिन चीन की यही आक्रामक विस्तारवादी नीति कई देशों को चिंतित भी करती है। दक्षिण चीन सागर, ताइवान और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी गतिविधियों को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी लगातार सतर्क हैं। भारत के लिए भी चीन सबसे बड़ी सामरिक चुनौतियों में शामिल है। गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के संबंधों में अविश्वास काफी बढ़ा है। इसलिए आरआईसी वैश्विक व्यवस्था की संभावना पर चर्चा करते समय यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत और चीन वास्तव में किसी दीर्घकालिक रणनीतिक तालमेल तक पहुंच पाएंगे।
रूस की बदलती मजबूरियां
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की स्थिति भी काफी बदल गई है। पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया, लेकिन इसके बावजूद मॉस्को पूरी तरह अलग-थलग नहीं हुआ। चीन और भारत जैसे देशों के साथ ऊर्जा व्यापार ने रूस को राहत दी। यही कारण है कि रूस अब एशियाई साझेदारियों को और अधिक मजबूत करना चाहता है।
रूस के लिए आरआईसी वैश्विक व्यवस्था केवल वैचारिक मुद्दा नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बनती जा रही है। यूरोप के साथ तनाव बढ़ने के बाद रूस को नए आर्थिक और राजनीतिक सहयोगियों की जरूरत महसूस हो रही है। भारत और चीन दोनों ही विशाल बाजार और बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं, इसलिए रूस इनके साथ अपने रिश्तों को और गहरा करना चाहता है।
अमेरिका की चिंता क्यों बढ़ी
अमेरिका अब भी दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति है। डॉलर का प्रभाव वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में कायम है और तकनीकी क्षेत्र में भी अमेरिकी कंपनियों का दबदबा बना हुआ है। लेकिन इसके बावजूद वॉशिंगटन के लिए चुनौती बढ़ती जा रही है। चीन का आर्थिक विस्तार, रूस की सैन्य सक्रियता और वैश्विक दक्षिण के देशों की बदलती प्राथमिकताएं अमेरिका के लिए नई रणनीतिक मुश्किलें पैदा कर रही हैं।
आरआईसी वैश्विक व्यवस्था की चर्चा अमेरिकी रणनीतिक हलकों में इसलिए भी गंभीरता से देखी जा रही है क्योंकि यदि भारत पूरी तरह पश्चिमी खेमे से दूरी बनाता है तो एशिया में शक्ति संतुलन बदल सकता है। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में भारत के पूरी तरह किसी धुरी में शामिल होने की संभावना कम दिखाई देती है, लेकिन अमेरिका यह समझता है कि भारत की भूमिका भविष्य की विश्व राजनीति में निर्णायक होगी।
बहुध्रुवीय दुनिया की वास्तविकता
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का विचार नया नहीं है। कई दशक पहले भी यूरोप, रूस, चीन और अमेरिका जैसे शक्ति केंद्र मौजूद थे। लेकिन आधुनिक दौर में वैश्वीकरण और तकनीकी विकास ने शक्ति संतुलन को और जटिल बना दिया है। अब केवल सैन्य ताकत ही निर्णायक नहीं रही। तकनीक, ऊर्जा, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आपूर्ति श्रृंखलाएं भी वैश्विक शक्ति का हिस्सा बन चुकी हैं।
आरआईसी वैश्विक व्यवस्था इसी बदलती वास्तविकता का हिस्सा मानी जा रही है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बहुध्रुवीय दुनिया हमेशा स्थिरता नहीं लाती। कई बार शक्ति संतुलन की प्रतिस्पर्धा बड़े संघर्षों को जन्म देती है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध भी ऐसे ही शक्ति संघर्षों की पृष्ठभूमि में हुए थे। इसलिए भविष्य की व्यवस्था कैसी होगी, यह केवल गठबंधनों से तय नहीं होगा बल्कि आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा भी इसमें बड़ी भूमिका निभाएगी।
भारत के सामने बड़ी चुनौतियां
अगर भारत भविष्य में चौथे बड़े शक्ति केंद्र के रूप में उभरना चाहता है तो उसे कई चुनौतियों का सामना करना होगा। सबसे बड़ी जरूरत आर्थिक मजबूती की है। भारत को विनिर्माण, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी नवाचार और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी। केवल जनसंख्या और बाजार के आधार पर महाशक्ति नहीं बना जा सकता। इसके लिए दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमता जरूरी होती है।
भारत के सामने दूसरी बड़ी चुनौती चीन के साथ प्रतिस्पर्धा है। चीन पहले से ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और विनिर्माण क्षेत्र में मजबूत स्थिति रखता है। भारत को शिक्षा, अनुसंधान और बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। तभी वह आरआईसी वैश्विक व्यवस्था जैसे किसी संभावित ढांचे में बराबरी की भूमिका निभा सकेगा।
वैश्विक दक्षिण की नई आवाज
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों में अब पश्चिमी प्रभाव को लेकर पहले जैसी स्वीकार्यता नहीं रही। ये देश अधिक संतुलित वैश्विक व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। ब्रिक्स के विस्तार और वैकल्पिक व्यापार व्यवस्थाओं की चर्चा इसी बदलाव का हिस्सा हैं।
भारत इस वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने विकासशील देशों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। यही कारण है कि भारत को केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि संभावित वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में भी देखा जाने लगा है। आरआईसी वैश्विक व्यवस्था की बहस में भारत की यही भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भविष्य की दिशा क्या होगी
दुनिया फिलहाल संक्रमण के दौर से गुजर रही है। एक तरफ अमेरिका अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, दूसरी तरफ चीन और रूस नई शक्ति संरचना की बात कर रहे हैं। भारत इस पूरी बहस में संतुलित और स्वतंत्र भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले वर्षों में यह साफ होगा कि दुनिया वास्तव में बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ती है या फिर अमेरिका और चीन के बीच नई द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा शुरू होती है।
फिलहाल इतना तय है कि आरआईसी वैश्विक व्यवस्था को लेकर जो चर्चा शुरू हुई है, वह आने वाले समय में और तेज होगी। यह केवल तीन देशों का समीकरण नहीं बल्कि बदलती विश्व राजनीति का संकेत है। भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। अगर नई दिल्ली अपनी आर्थिक, तकनीकी और सामरिक क्षमता को मजबूत करती है तो वह केवल किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था का निर्णायक केंद्र बन सकती है।
आरआईसी वैश्विक व्यवस्था पर अंतिम संकेत
आरआईसी वैश्विक व्यवस्था की अवधारणा अभी पूरी तरह वास्तविक राजनीतिक गठबंधन में नहीं बदली है, लेकिन इसके पीछे छिपे संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दुनिया में शक्ति संतुलन बदल रहा है और एशिया का महत्व लगातार बढ़ रहा है। रूस और चीन पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भारत अपनी स्वतंत्र पहचान को मजबूत कर रहा है। यही कारण है कि आने वाले दशक में विश्व राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही हो सकता है कि क्या भारत वास्तव में चौथा ध्रुव बन पाएगा या फिर वह संतुलन की नीति पर चलते हुए अपनी अलग राह बनाए रखेगा।
