मध्य प्रदेश में सरकारी व्यवस्था और शिक्षा विभाग की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा कर देने वाला एक व्यापक घोटाला सामने आया है। स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की महीनों लंबी जांच ने राज्य में फैले फर्जी डिग्री सिंडिकेट का ऐसा चेहरा उजागर किया है, जिसने न सिर्फ सरकारी नौकरियों की चयन प्रक्रिया को कलंकित किया, बल्कि भविष्य गढ़ने वाले शिक्षा तंत्र की जड़ों को भी कमजोर किया। लगभग 100 से अधिक शिक्षक फर्जी डीएड (डिप्लोमा इन एजुकेशन) प्रमाणपत्रों के दम पर वर्षों से सरकारी स्कूलों में नौकरी कर रहे थे। इनमें से कई ऐसे हैं जो 10 से 15 वर्षों तक वेतन उठाते रहे, पदोन्नति लेते रहे और बच्चों को पढ़ाते रहे।

यह खुलासा किसी छोटी चोरी जैसा नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित अपराध, संगठित गिरोह और सरकारी तंत्र में बैठे कुछ लोगों की मिलीभगत का गंभीर उदाहरण है। STF की शुरुआती कार्रवाई ने 34 शिक्षकों को चिन्हित किया, जिनमें 8 पर प्रत्यक्ष नामजद मुकदमा दर्ज किया गया है और 26 संदेहियों की जांच जारी है। लेकिन अफसरों के अनुसार असली संख्या 100 से कहीं अधिक हो सकती है।
यह रिपोर्ट सिर्फ जांच नहीं, बल्कि शिक्षा, प्रशासन, नैतिकता और सरकारी तंत्र के भविष्य से जुड़ी एक जटिल कहानी है। अब इस पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं।
घोटाले की जड़ें कहाँ थीं: एक शिकायत और खुलता बड़ा राज
इस पूरे फर्जीवाड़े की शुरुआत एक साधारण लेकिन महत्वपूर्ण शिकायत से हुई। किसी अज्ञात व्यक्ति ने STF को गोपनीय रूप से सूचना दी कि कई शिक्षकों के पास मौजूद डीएड डिग्रियाँ संदिग्ध हैं। शुरुआती स्तर पर यह सिर्फ एक छोटी शिकायत लग रही थी, लेकिन जब STF की टीम ने दस्तावेज़ों का मिलान शुरू किया, तो असली खेल का परदा उठ गया।
STF अधिकारी बताते हैं कि कुछ शिक्षकों के दस्तावेज़ों में तारीख, रोल नंबर, हस्ताक्षर और मार्कशीट का प्रारूप संदिग्ध लग रहा था। इसके बाद जैसे-जैसे दस्तावेज़ों की जांच गहराई में गई, वैसे-वैसे जाल बड़ा होता गया।
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल (MPBSE) ने आधिकारिक सत्यापन में साफ कहा कि संबंधित डिग्रियाँ उनके द्वारा जारी ही नहीं की गईं।
यही वह बिंदु था, जहाँ से जांच ने गति पकड़ी और पूरा रैकेट सामने आने लगा।
फर्जी डिग्री कैसे बनी: असली जैसी हूबहू नकली मार्कशीटें
इस घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन डिग्रियों की क्वालिटी बेहद उच्च स्तर की थी।
STF की जांच में पता चला कि फर्जीवाड़ा करने वालों ने
- बिल्कुल असली जैसी मार्कशीट तैयार की
- माध्यमिक शिक्षा मंडल के पुराने प्रारूप का अध्ययन कर उसे हूबहू कॉपी किया
- उस समय के सचिव के नकली हस्ताक्षर बनवाए
- नकली सीलें तैयार कीं
- सीरियल नंबर और रोल नंबर तक ऐसा रखा कि साधारण जांच में पकड़ न आए
यह सिर्फ किसी स्थानीय फर्जीवाड़े वाले का काम नहीं था, बल्कि एक संगठित गिरोह की सहभागिता का संकेत था। STF को शक है कि राज्य के कई जिलों में यह नेटवर्क सक्रिय था और सरकारी तंत्र के कुछ कर्मचारी भी इसमें शामिल थे।
कौन-कौन फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी कर रहा था
STF ने इंदौर, मुरैना, ग्वालियर और शिवपुरी जिलों में पहले चरण में 34 शिक्षकों को चिन्हित किया। इनमें 8 के खिलाफ नामजद FIR दर्ज हुई।
दर्ज मामलों में शामिल शिक्षक:
- गंधर्व सिंह रावत
- साहब सिंह कुशवाह
- बृजेश रोरिया
- महेंद्र सिंह रावत
- लोकेन्द्र सिंह
- रूबी कुशवाह
- रविंद्र सिंह राणा
- अर्जुन सिंह चौहान
ये सभी वर्तमान में विभिन्न सरकारी स्कूलों में पदस्थ थे। वर्षों से बच्चों को पढ़ा रहे थे और सरकारी वेतन लेते आ रहे थे।
कितने बड़े स्तर पर फैला है यह रैकेट: STF का विश्लेषण
STF की 5 सदस्यीय टीम इस फर्जीवाड़े की तह तक पहुँचने में लगी है। जांच में पाया गया:
- रैकेट पिछले 15 साल से सक्रिय था
- 5 से 15 साल तक नौकरी कर चुके शिक्षक पकड़े गए
- राज्य के विभिन्न जिलों में नेटवर्क फैला था
- विभागीय अधिकारियों की भी भूमिका संदिग्ध है
- फर्जी डिग्री बनाने के लिए संगठित गिरोह जिम्मेदार था
एसटीएफ का ऑपरेशन अभी जारी है, और सूत्र बताते हैं कि 100 से अधिक शिक्षकों की सूची पहले से तैयार हो चुकी है।
15 साल तक नौकरी कैसे चलती रही? कहाँ था सिस्टम?
यह पूरी कहानी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि:
जब कई शिक्षक 10–15 साल तक फर्जी डिग्री पर नौकरी करते रहे,
- तो भर्ती प्रक्रिया ने इसे कैसे पकड़ा नहीं?
- विभागीय सत्यापन क्यों नहीं हुआ?
- नियमित ऑडिट क्यों फेल हुआ?
- पदोन्नति के समय दस्तावेज़ों की जांच क्यों नहीं हुई?
STF की प्रारंभिक रिपोर्ट में संकेत है कि विभागीय स्तर पर कुछ कर्मचारियों या अधिकारियों ने जानबूझकर इन डिग्रियों को नजरअंदाज किया या उन्हें सही माना।
यह घोटाला सिर्फ दस्तावेज़ों का अपराध नहीं, बल्कि प्रशासनिक नजरदारी की असफलता भी है।
शिक्षा व्यवस्था पर प्रभाव: भविष्य की पीढ़ी के साथ धोखा
फर्जी डिग्री के दम पर नौकरी पाने वाले शिक्षकों का सीधा असर बच्चों पर पड़ा होगा। सवाल यह है कि:
- क्या वे पढ़ाने में सक्षम थे?
- क्या उनकी अकादमिक दक्षता उतनी थी जितनी होनी चाहिए?
- क्या स्कूलों ने प्रदर्शन मूल्यांकन किया?
शिक्षक सिर्फ किताबें पढ़ाने वाले नहीं होते, बल्कि बच्चों के भविष्य को आकार देते हैं।
ऐसे में शिक्षकों का फर्जी डिग्री पर पढ़ाना समाज और शिक्षा प्रणाली, दोनों के साथ न्याय नहीं है।
सरकारी प्रतिक्रिया और STF की कार्रवाई
STF के एसपी राजेश सिंह भदौरिया का कहना है:
“गैंग की धरपकड़ के लिए ऑपरेशन चल रहा है। 100 से अधिक शिक्षक चिन्हित किए गए हैं। 34 पर कार्रवाई की जा चुकी है। विभाग के कई अधिकारी भी जांच के दायरे में हैं।”
इस बयान से साफ है कि अभी यह सिर्फ शुरुआत है। बड़े स्तर पर गिरफ्तारी और निलंबन तय है।
क्या यह घोटाला रुक जाएगा? या अभी और खुलासे होने बाकी हैं
शिक्षा एवं प्रशासन विशेषज्ञों का मानना है कि:
- यह कथित रैकेट राज्य के कई जिलों में फैला है
- फर्जी डिग्रियों का नेटवर्क पूरे देश में मौजूद है
- ऐसे घोटाले सिर्फ शिक्षा विभाग तक सीमित नहीं
- बिहार, यूपी और राजस्थान में भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं
आने वाले महीनों में यह केस और भी बड़े खुलासे कर सकता है।
निष्कर्ष: एक गंभीर चेतावनी
यह घोटाला बताता है कि:
- सरकारी भर्ती प्रणाली कितनी कमजोर है
- सत्यापन प्रक्रिया कितनी लापरवाह है
- फर्जीवाड़ा किस स्तर तक फैला हो सकता है
- प्रशासनिक तंत्र में सुधार की कितनी जरूरत है
STF की कार्रवाई स्वागतयोग्य है, लेकिन चुनौती यह है कि भविष्य में ऐसे मामलों को रोका कैसे जाए।
सख्त सत्यापन, डिजिटल रिकॉर्ड, बाहरी एजेंसी द्वारा जांच और भर्ती प्रणाली में पारदर्शिता ही समाधान हो सकते हैं।
