बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद राष्ट्रीय राजनीति एक बार फिर EVM की विश्वसनीयता, मतदाता सूची में SIR (स्पेशल समरी रिवीजन) प्रक्रिया और निर्वाचन व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर गर्मा गई है। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि चुनाव के दौरान मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर फेरबदल हुआ, जिसके कारण नतीजों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके जवाब में भाजपा नेता और मध्य प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि कुछ लोग शिकायत करने के लिए ही पैदा हुए हैं, जबकि जनता ने विकास के मॉडल को चुन लिया है।

यह विवाद केवल बिहार चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि देश की चुनावी प्रक्रिया में तकनीक, पारदर्शिता और राजनीतिक विश्वास कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं। यह विस्तृत रिपोर्ट केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि इन दावों और प्रतिदावों का व्यापक विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है।
दिग्विजय सिंह का आरोप
बिहार चुनाव परिणाम के तुरंत बाद कांग्रेस की ओर से सबसे तीखी प्रतिक्रिया दिग्विजय सिंह की रही। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि 62 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए और 20 लाख नए नाम जोड़े गए। उनका दावा है कि इनमें से लगभग 5 लाख नाम बिना SIR फॉर्म की प्रक्रिया के जोड़े गए। यह गंभीर आरोप चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है।
दिग्विजय सिंह का तर्क है कि हटाए गए अधिकांश मतदाता गरीब, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग से आते हैं। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में यह वर्ग अक्सर उपेक्षित होता है, और जब बड़ी संख्या में उनके वोट हटाए जाते हैं, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। उनके अनुसार, यह सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी नहीं बल्कि एक संरचनात्मक समस्या है जिसे गंभीरता से लेना चाहिए।
SIR प्रक्रिया क्या है और यह विवाद में क्यों आई
SIR (स्पेशल समरी रिवीजन) वह प्रक्रिया है जिसके जरिए चुनाव से पहले मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है। इसमें नए नाम जोड़े जाते हैं, पुराने नाम हटाए जाते हैं और डुप्लीकेट प्रविष्टियों को सुधार किया जाता है। यह प्रक्रिया समयबद्ध, डेटा आधारित और नियमों से नियंत्रित होती है। लेकिन विरोधी पार्टियों का आरोप है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने या जोड़ने की गतिविधि कभी-कभी पारदर्शी तरीके से नहीं होती।
दिग्विजय सिंह द्वारा उठाया गया मुद्दा नया नहीं है। देश में कई चुनावों से पहले राजनीतिक दल SIR को लेकर असहमति जताते रहे हैं। उनका कहना है कि जमीनी स्तर पर जिन कर्मचारियों को सूची अपडेट करने की जिम्मेदारी दी जाती है, वे अक्सर समय या संसाधनों की कमी के कारण गलत प्रविष्टियाँ कर देते हैं। विपक्ष का यह भी कहना है कि कई बार अपडेट की जानकारी मतदाताओं तक सही तरीके से नहीं पहुंचती, जिससे लोग चुनाव के दिन अपना नाम गायब पाते हैं।
कांग्रेस का आरोप है कि बिहार चुनाव में यह समस्या विकराल रूप में सामने आई और इससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुए।
EVM पर संदेह एक बार फिर गर्माया
दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और कहा कि शक अभी भी जस का तस है। उनका कहना है कि जब मतगणना पूरी तरह मशीनों पर आधारित हो, तो संदेह दूर करने के लिए अधिक पारदर्शिता जरूरी है। उनका यह भी कहना है कि कई देशों ने EVM से हटकर बैलेट पेपर पर वापसी की है, क्योंकि चुनाव जनता के विश्वास पर चलता है और यदि विश्वास डगमगाए तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है।
यह तथ्य भी राजनीतिक बहस को और तीखा बनाता है कि भारत में EVM का उपयोग दो दशक से अधिक समय से किया जा रहा है, और कई चुनावों में इसे लेकर विवाद उठते रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग, तकनीकी विशेषज्ञ और अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि EVM पूरी तरह सुरक्षित हैं। परंतु राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में संदेहों का खत्म होना आसान नहीं है।
प्रह्लाद सिंह पटेल का पलटवार और भाजपा की प्रतिक्रिया
जब कांग्रेस नेता आरोपों की झड़ी लगा रहे थे, तब मध्य प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि शिकायत करने वालों के लिए चुनाव सिर्फ आरोप लगाने का माध्यम बन चुका है। उन्होंने कहा कि जनता ने बिहार में स्पष्ट जनादेश दिया है और यह जनादेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की विकास नीतियों के प्रति भरोसे का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर कोई अपनी बात कह सकता है, लेकिन बिना प्रमाण के लगाए गए आरोप केवल जनादेश का अपमान हैं। उनका कहना है कि विपक्ष को जनता का विश्वास जीतने के लिए मेहनत करनी चाहिए, न कि मशीनों या प्रक्रियाओं पर दोषारोपण करना चाहिए।
यह प्रतिक्रिया बताती है कि भाजपा विपक्ष के आरोपों को गंभीरता से लेने की बजाय उन्हें राजनीतिक निराशा का परिणाम मानती है।
विवाद के राजनीतिक निहितार्थ
यह विवाद आने वाले चुनावों की रणनीतियों पर बड़ा असर डाल सकता है। विपक्ष SIR और EVM को बड़ा मुद्दा बना सकता है, जबकि सत्ता पक्ष विकास और जनादेश की ताकत पर चुनाव लड़ना पसंद करेगा। वहीं चुनाव आयोग पर भी दबाव बढ़ेगा कि वह अपनी प्रक्रियाओं को और पारदर्शी बनाए और किसी भी तरह की गलतफहमी दूर करे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे आरोप लोकतंत्र की नींव को हिलाते हैं। भारत एक विशाल मतदाता आधार वाला देश है, और यहां चुनावी प्रक्रियाएं बेहद जटिल हैं। यदि मतदाता यह मानने लगें कि उनकी आवाज़ सुनी नहीं जा रही, तो लोकतंत्र की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।
दिग्विजय सिंह की कांग्रेस नेतृत्व को सलाह
दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस हाईकमान को यह कहते हुए सलाह दी कि अब चुनाव बूथ स्तर पर लड़ने का समय है। उन्होंने कहा कि जनसभाएं और बड़ी रैलियां अब उतनी प्रभावशाली नहीं रहीं, जितना कि घर-घर जाकर संवाद करना। उनके अनुसार, संगठन की मजबूती और वास्तविक जनसंपर्क ही चुनावी सफलता का मंत्र है।
यह बयान केवल बिहार की हार पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि कांग्रेस की व्यापक रणनीति पर भी टिप्पणी है। यह संदेश पार्टी नेतृत्व के लिए भी एक संकेत है कि नए जमाने की राजनीति में जमीन पर मजबूत नेटवर्क और जमीनी कार्यकर्ता अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष: चुनावी प्रक्रिया पर सवाल या राजनीतिक नैरेटिव
इस पूरी बहस को दो तरह से देखा जा सकता है। एक दृष्टिकोण यह कहता है कि विपक्ष के आरोप चुनावी प्रक्रिया में खामियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं, जिन्हें दूर किया जाना जरूरी है। दूसरी दृष्टि यह मानती है कि ऐसे आरोप चुनावी हार को छिपाने का माध्यम बन गए हैं और इससे लोकतंत्र की विश्वसनीयता को नुकसान होता है।
सच्चाई शायद कहीं बीच में है। परंतु इतना तय है कि मतदाता सूची, SIR, EVM और तकनीकी प्रक्रियाओं को लेकर विश्वास बहाल करना चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों दोनों की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र केवल वोट देने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं, बल्कि विश्वास और पारदर्शिता की नींव पर खड़ा होता है।
