भोपाल में आलमी तब्लिगी इज्तिमा का 78वां आयोजन शुरू हो चुका है। चार दिनों तक चलने वाले तकरीरों, शिक्षाओं और इबादत के इस विशाल धार्मिक समागम में दुनिया भर से लाखों मुसलमान शामिल हो रहे हैं। यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐसा ऐतिहासिक व सामाजिक अध्याय है जिसने 1947 के बंटवारे के बाद भारत में मुस्लिम समाज के बीच भरोसा, साहस और एकता की नई भावना जगाई थी। 1948 में ताजुल मसाजिद की अधूरी इमारत में सिर्फ 500 लोगों के साथ शुरू हुआ यह आयोजन आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक सम्मेलन बन चुका है। इस रिपोर्ट में हम इस इज्तिमा के इतिहास, सामाजिक प्रभाव, इसके संस्थापकों, इसके उद्देश्यों और इसके वर्तमान महत्व का विस्तृत विश्लेषण कर रहे हैं।

भोपाल इज्तिमा की शुरुआत क्यों हुई
आजादी और बंटवारे के बाद पूरा देश भय, अफवाहों और अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रहा था। लाखों लोग जगह छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे। भोपाल नवाबी रियासत होने के कारण यहां भी बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवार रहते थे। अफवाहें थीं कि रियासतें खत्म होंगी और मुसलमानों को यहां से पलायन करना होगा। ऐसे कठिन समय में उलेमाओं के बीच चिंता बढ़ने लगी। समुदाय को यह संदेश देना जरूरी था कि भारत उनका अपना देश है और पलायन समाधान नहीं है।
इसी पृष्ठभूमि में मौलाना मोहम्मद इमरान खान नदवी अजहरी और मौलाना मिस्कीन साहब ने मिलकर तय किया कि लोगों को एक साथ बुलाया जाए और उनमें भरोसा जगाया जाए। यही वह क्षण था जब 1948 में ताजुल मसाजिद की अधूरी इमारत में पहला आधिकारिक तब्लिगी इज्तिमा आयोजित हुआ। लगभग 500 लोगों की उपस्थिति में शुरू हुआ यह छोटा-सा प्रयास आगे चलकर एक ऐसा आंदोलन बन गया जिसे पूरी दुनिया ने देखा और सराहा।
पहला इज्तिमा: नेतृत्व, संदेश और प्रभाव
पहले इज्तिमा के मुख्य संयोजक मौलाना इमरान खान नदवी अजहरी थे। वे तब्लीग के संस्थापक मौलाना इलियास कांधलावी के संपर्क में रहे थे और मध्य भारत में तब्लीगी आंदोलन की जिम्मेदारी उन्हें ही सौंपी गई थी। इज्तिमा में उन्होंने लोगों को समझाया कि भारत उनकी मातृभूमि है, और इसे छोड़ना कमजोरी नहीं बल्कि मजबूती है। उनका संदेश था कि डर, अफवाह और गलतफहमियों के आधार पर जीवन का निर्णय नहीं होना चाहिए। उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया कि देश उन्हें सुरक्षा, सम्मान और अधिकार देता है।
पहले ही आयोजन का प्रभाव इतना व्यापक था कि बड़ी संख्या में लोग पलायन की सोच से पीछे हटे। उन्होंने अपने घरों, अपनी जमीनों, अपने रोजगार और अपने सामाजिक रिश्तों को छोड़कर जाने के विचार को त्याग दिया। इस आयोजन ने यह साबित किया कि एक सशक्त नेतृत्व और सही संदेश समाज में कितना बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
ताजुल मसाजिद और मरकज की स्थापना: धार्मिक शिक्षा और सामाजिक सुधार की नई दिशा
पहले इज्तिमा के बाद मौलाना इमरान खान नदवी ने ताजुल मसाजिद की अधूरी इमारत का निर्माण कार्य तेज किया। ताजुल मसाजिद केवल एक विशाल मस्जिद नहीं, बल्कि भोपाल की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है। उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान मौलाना सैयद सुलेमान रिजवी के साथ मिलकर दारुल उलूम स्थापित करने की योजना बनाई। इसी कड़ी में 1949 में मस्जिद शकूर खान में एक अस्थायी मरकज बनाया गया और फिर 1950 में इसे ताजुल मसाजिद में स्थानांतरित कर दिया गया।
मरकज के तीन प्रमुख उद्देश्य तय किए गए:
- दीन की तालीम देना
- तब्लीगी जमात के संदेश का प्रचार
- मुसलमानों को पलायन से रोकना और भारत में सुरक्षित भविष्य का भरोसा दिलाना
इन उद्देश्यों ने मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सामाजिक स्थिरता और धार्मिक समझ बढ़ाने में भूमिका निभाई।
तब्लीगी आंदोलन की जड़ें: मेवात से भोपाल तक
तब्लीगी जमात की नींव 1926 में मौलाना इलियास कांधलावी ने हरियाणा के मेवात क्षेत्र में रखी थी। उनका उद्देश्य था कि लोग इस्लामी जीवन की मूल शिक्षाओं, नमाज और नैतिकता को समझें और अमल में लाएँ। गांव-गांव जाकर शुरू हुई यह मुहिम जितनी शांत थी, उतनी ही प्रभावशाली भी थी। इसी आंदोलन के विस्तार ने भोपाल इज्तिमा जैसे बड़े आयोजन का मार्ग प्रशस्त किया।
मौलाना इमरान खान नदवी अजहरी की मौलाना इलियास से मुलाकात ने मध्य भारत में तब्लीग के विस्तार को मजबूत आधार दिया। यही कारण है कि आज भोपाल इज्तिमा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में एक है।
भोपाल इज्तिमा का विकास: 13 लोगों से लेकर 13 लाख तक का सफर
पहले आयोजन में जहां 500 लोग शामिल हुए थे, वहीं आज के 78वें आयोजन में दुनिया भर से 13 लाख तक लोगों के आने की उम्मीद है। यह विकास केवल संख्या के बढ़ने का संकेत नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि यह आयोजन दुनिया भर के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।
पहले यह आयोजन ताजुल मसाजिद के परिसर में होता था, लेकिन जनसंख्या बढ़ने के कारण अब इसे भोपाल के घाराकोटा रोड स्थित विशाल मैदान में आयोजित किया जाता है। आयोजन स्थल पर विशाल टेंट, भोजन व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएँ, यातायात प्रबंधन और सुरक्षा इंतजाम इतने बड़े पैमाने पर किए जाते हैं कि यह एक अस्थायी शहर जैसा रूप ले लेता है।
वैश्विक पहचान: दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक सम्मेलन
हज के बाद भोपाल इज्तिमा दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्लामी जमावड़ा माना जाता है। इसकी वैश्विक पहचान इसलिए भी है क्योंकि इसमें शामिल होने वाले लोग केवल भारत से नहीं बल्कि एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व, यूरोप और अमेरिका तक से आते हैं। यह आयोजन समय, भाषा और संस्कृति की सीमाओं को पार कर मानवीय एकता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
इज्तिमा की आध्यात्मिक और सामाजिक महत्ता
इज्तिमा केवल धार्मिक तकरीरों का आयोजन नहीं है। इसका उद्देश्य है:
लोगों को नैतिक जीवन की ओर प्रेरित करना
आपसी भाईचारा और एकता को बढ़ावा देना
समाज से कटे लोगों को जोड़ना
नशा, अपराध, और सामाजिक बुराइयों से दूर रहने की शिक्षा देना
लोगों को विनम्रता, अनुशासन और आपसी सहयोग का संदेश देना
इज्तिमा में शामिल लोग यहां से केवल धार्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक अनुशासित तरीका भी सीखते हैं।
आधुनिक समय में इज्तिमा की प्रासंगिकता
भारत में धार्मिक आयोजन अक्सर राजनीतिक रंग भी ले लेते हैं, पर भोपाल इज्तिमा की खासियत है कि यह पूरी तरह धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम है। यह किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं जुड़ा। यही कारण है कि इसका सम्मान हर पक्ष से मिलता है।
आज के समय में जब समाज में विभाजन, नफरत और भ्रम फैलाने की कोशिशें बढ़ रही हैं, ऐसे में इज्तिमा जैसे आयोजन लोगों को एकता, शांति और सद्भाव का संदेश देते हैं। यह आयोजन यह भी याद दिलाता है कि भारत एक ऐसा देश है जहां विविधता में एकता की सबसे सुंदर मिसालें देखने को मिलती हैं।
निष्कर्ष
भोपाल का आलमी तब्लिगी इज्तिमा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, विश्वास और सामाजिक समरसता का जीवंत दस्तावेज है। 1948 में डर और पलायन के माहौल से शुरू होकर आज यह दुनिया भर में शांति और आध्यात्मिकता की पहचान बन चुका है। यह आयोजन आज भी वही संदेश देता है—भारत हमारी मातृभूमि है, हमारा घर है, और यहां भाईचारे, सहयोग और एकता की सबसे मजबूत नींव है।
