ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से बदली है, उसमें सबसे बड़ा योगदान सेफ्टी टेक्नोलॉजी का रहा है। पहले जहां कारों की पहचान सिर्फ इंजन पावर, माइलेज और डिजाइन से होती थी, वहीं अब खरीदार सबसे पहले सेफ्टी फीचर्स के बारे में पूछते हैं। इसी बदलाव के केंद्र में है ADAS, यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम। यह कोई एक फीचर नहीं, बल्कि कई तकनीकों का ऐसा समूह है जो ड्राइवर को सड़क पर सुरक्षित रखने में मदद करता है।

ADAS को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह ड्राइविंग के दौरान होने वाली मानवीय गलतियों को कम कर सके। आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटनाओं का बड़ा कारण ड्राइवर की चूक होती है, जैसे ध्यान भटकना, थकान, गलत आकलन या देर से प्रतिक्रिया देना। ADAS इन सभी स्थितियों में ड्राइवर की आंख, कान और दिमाग की तरह काम करता है। यह आसपास के माहौल पर लगातार नजर रखता है और जरूरत पड़ने पर चेतावनी देता है या खुद ही एक्शन ले लेता है।
ADAS क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी
ADAS एक इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सिस्टम है, जो वाहन में लगे कई सेंसर और कैमरों से डेटा लेकर उसे प्रोसेस करता है। इसका उद्देश्य ड्राइवर की मदद करना है, न कि उसे पूरी तरह से बदल देना। आधुनिक ट्रैफिक, बढ़ती गाड़ियों की संख्या और तेज रफ्तार ने ड्राइविंग को पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे में ADAS ड्राइवर के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच की तरह काम करता है।
दुनिया भर में हुए अध्ययनों से यह सामने आया है कि ADAS से लैस वाहनों में दुर्घटनाओं की संभावना 30 से 60 प्रतिशत तक कम हो सकती है। यह आंकड़ा सिर्फ तकनीक की ताकत नहीं, बल्कि उसके सही इस्तेमाल की ओर भी इशारा करता है। खास बात यह है कि अब यह फीचर सिर्फ लग्जरी कारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किफायती सेगमेंट में भी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा है।
ADAS कैसे करता है काम: तकनीक के पीछे की पूरी प्रक्रिया
ADAS का काम करने का तरीका बेहद दिलचस्प है। यह सिस्टम गाड़ी के चारों ओर के वातावरण को लगातार स्कैन करता रहता है। सामने चल रही गाड़ी, साइड में मौजूद वाहन, सड़क पर चल रहे पैदल यात्री, लेन मार्किंग, ट्रैफिक साइन और यहां तक कि मौसम की स्थिति तक पर नजर रखी जाती है। यह सब कुछ रियल टाइम में होता है, यानी सेकेंड के हजारवें हिस्से में फैसले लिए जाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत सेंसर से होती है। कार में लगे कैमरे दृश्य जानकारी देते हैं, रडार दूरी और स्पीड का अनुमान लगाता है, LiDAR सड़क का थ्री-डायमेंशनल नक्शा तैयार करता है और अल्ट्रासोनिक सेंसर पार्किंग जैसी कम दूरी की स्थितियों में मदद करते हैं। इन सभी से मिलने वाला डेटा वाहन के इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट या सिस्टम ऑन चिप तक पहुंचता है।
प्रोसेसिंग यूनिट इस डेटा को एक साथ जोड़कर, यानी डेटा फ्यूजन करके, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग एल्गोरिदम की मदद से विश्लेषण करती है। अगर सिस्टम को लगता है कि कोई खतरा है, तो वह तुरंत ड्राइवर को अलर्ट देता है। अगर खतरा ज्यादा गंभीर हो, तो सिस्टम खुद ही ब्रेक लगाना या स्टीयरिंग को थोड़ा एडजस्ट करना जैसे कदम उठा सकता है।
सेंसर, कैमरा और AI: ADAS की रीढ़
ADAS की सफलता का सबसे बड़ा कारण इसके हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का तालमेल है। कैमरे सड़क पर मौजूद ऑब्जेक्ट्स को पहचानते हैं, जैसे गाड़ियां, लोग या जानवर। रडार खराब मौसम, धुंध या बारिश में भी काम करता है, जहां कैमरे की क्षमता सीमित हो सकती है। LiDAR तकनीक बेहद सटीक 3D मैपिंग करती है, जिससे कार को अपने आसपास की दूरी और गहराई का सही अंदाजा मिलता है।
इन सबके साथ AI का रोल सबसे अहम है। AI न सिर्फ मौजूदा स्थिति को समझता है, बल्कि पिछले डेटा के आधार पर संभावित खतरे का अनुमान भी लगाता है। यही कारण है कि ADAS सिर्फ प्रतिक्रिया देने वाला सिस्टम नहीं, बल्कि एक प्रिडिक्टिव सेफ्टी सिस्टम बन चुका है।
ADAS के लेवल: ऑटोमेशन की छह सीढ़ियां
ड्राइविंग ऑटोमेशन को समझने के लिए इसे अलग-अलग लेवल में बांटा गया है। ये लेवल बताते हैं कि कार और ड्राइवर के बीच जिम्मेदारी कैसे बंटी हुई है। शुरुआती स्तर पर ड्राइवर का रोल सबसे ज्यादा होता है, जबकि ऊंचे लेवल पर कार खुद ज्यादा फैसले लेती है।
लेवल जीरो में कोई ऑटोमेशन नहीं होता। यहां सिस्टम सिर्फ चेतावनी देता है, जैसे आगे टक्कर का खतरा होने पर अलर्ट। लेवल वन में कार किसी एक फंक्शन में मदद करती है, जैसे स्पीड कंट्रोल या लेन में रहने में सहायता। लेवल टू में स्टीयरिंग और ब्रेकिंग दोनों में सिस्टम मदद करता है, लेकिन ड्राइवर को हर समय सतर्क रहना जरूरी होता है। आज भारत में मिलने वाली ज्यादातर ADAS कारें इसी स्तर की हैं।
लेवल थ्री में सिस्टम कुछ खास परिस्थितियों में पूरा कंट्रोल ले सकता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर ड्राइवर को हस्तक्षेप करना होता है। लेवल फोर और फाइव को पूरी तरह ऑटोनॉमस ड्राइविंग माना जाता है, जहां कार लगभग हर स्थिति में खुद चल सकती है। हालांकि यह तकनीक अभी आम सड़कों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है।
ADAS के प्रमुख फीचर्स और उनका असर
ADAS के फीचर्स ड्राइविंग के अलग-अलग पहलुओं को कवर करते हैं। एडैप्टिव क्रूज कंट्रोल हाईवे ड्राइविंग को आसान बनाता है, क्योंकि यह आगे चल रही गाड़ी से सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए स्पीड को खुद एडजस्ट करता है। ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग अचानक सामने आए खतरे में कार को खुद रोक सकती है, जिससे टक्कर की संभावना काफी कम हो जाती है।
लेन डिपार्चर वार्निंग और लेन कीप असिस्ट लंबे सफर में बेहद उपयोगी हैं, जहां थकान के कारण ड्राइवर का ध्यान भटक सकता है। ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग साइड से आने वाले वाहनों को पहचानकर चेतावनी देता है। पैदल यात्री पहचान प्रणाली शहरों में खास तौर पर फायदेमंद है, जहां अचानक लोग सड़क पर आ जाते हैं।
ट्रैफिक साइन रिकग्निशन सिस्टम सड़क किनारे लगे बोर्ड पढ़कर ड्राइवर को स्पीड लिमिट या अन्य नियमों की याद दिलाता है। ऑटो हाई बीम फीचर रात में ड्राइविंग को सुरक्षित बनाता है, क्योंकि यह सामने से आने वाले वाहन को देखकर लाइट की तीव्रता खुद बदल लेता है। रियर क्रॉस ट्रैफिक अलर्ट और पार्किंग असिस्ट तंग जगहों में गाड़ी चलाना आसान बनाते हैं। ड्राइवर मॉनिटरिंग सिस्टम ड्राइवर की आंखों और हावभाव से यह समझने की कोशिश करता है कि वह थका हुआ या असावधान तो नहीं है।
ADAS के फायदे: सिर्फ सेफ्टी नहीं, आराम भी
ADAS का सबसे बड़ा फायदा दुर्घटनाओं में कमी है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, इन फीचर्स से सड़क हादसों में 40 से 60 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इसके अलावा, लंबी दूरी की ड्राइविंग में ड्राइवर पर पड़ने वाला मानसिक और शारीरिक दबाव कम होता है। एडैप्टिव क्रूज कंट्रोल जैसी तकनीकें फ्यूल एफिशिएंसी को भी बेहतर बनाती हैं।
कुछ देशों और बीमा कंपनियों में ADAS वाली कारों पर इंश्योरेंस प्रीमियम में छूट भी मिलती है, क्योंकि इन्हें कम जोखिम वाला माना जाता है। यह तकनीक न सिर्फ आज की ड्राइविंग को सुरक्षित बनाती है, बल्कि भविष्य की पूरी तरह ऑटोनॉमस कारों की नींव भी रखती है।
चुनौतियां और सीमाएं: हर तकनीक की अपनी हद
ADAS जितना उपयोगी है, उतना ही इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। खराब मौसम, भारी बारिश, धुंध या गंदे सेंसर इसकी कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। भारत जैसे देशों में, जहां सड़क की मार्किंग साफ नहीं होती या ट्रैफिक नियमों का पालन कम होता है, वहां कुछ फीचर्स उतने प्रभावी नहीं रह पाते।
एक और बड़ी चुनौती ड्राइवर की अत्यधिक निर्भरता है। अगर ड्राइवर पूरी तरह सिस्टम पर भरोसा करने लगे और सतर्कता कम कर दे, तो खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, ADAS से जुड़े हार्डवेयर की मरम्मत और मेंटेनेंस महंगी हो सकती है, जिससे कुल खर्च बढ़ जाता है।
भारत के संदर्भ में ADAS का भविष्य
भारत में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या काफी ज्यादा है, इसलिए ADAS जैसी तकनीक की जरूरत यहां और भी ज्यादा महसूस होती है। हालांकि सड़क ढांचे और ट्रैफिक अनुशासन में सुधार के बिना इस तकनीक का पूरा लाभ नहीं मिल सकता। फिर भी, जैसे-जैसे कार निर्माता भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से सिस्टम को बेहतर बना रहे हैं, ADAS का प्रभाव बढ़ने की उम्मीद है।
आने वाले वर्षों में यह तकनीक और सस्ती होगी और ज्यादा से ज्यादा कारों में उपलब्ध होगी। इससे न सिर्फ ड्राइविंग सुरक्षित होगी, बल्कि लोगों की सेफ्टी को लेकर सोच भी बदलेगी।
निष्कर्ष: क्या ADAS आपके लिए जरूरी है
अगर आप नई कार खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो ADAS को नजरअंदाज करना समझदारी नहीं होगी। यह कोई लक्जरी नहीं, बल्कि एक जरूरी सेफ्टी फीचर बनता जा रहा है। हालांकि इसे समझदारी से इस्तेमाल करना जरूरी है, क्योंकि यह ड्राइवर की जगह नहीं लेता, बल्कि उसकी मदद करता है।
ADAS तकनीक हमें उस भविष्य की ओर ले जा रही है, जहां सड़कें ज्यादा सुरक्षित होंगी और दुर्घटनाएं कम होंगी। सही जानकारी और जागरूकता के साथ यह सिस्टम हर ड्राइवर के लिए एक भरोसेमंद साथी साबित हो सकता है।
