महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर भावनाओं, सत्ता संतुलन और सार्वजनिक नैतिकता के टकराव के बीच खड़ी दिखाई दे रही है। पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार की विमान दुर्घटना में हुई असामयिक मृत्यु ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में गहरा शोक तो पैदा किया ही, साथ ही सत्ता की राजनीति को लेकर कई असहज प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं। जिस घटना को मानवीय संवेदना और सामूहिक शोक के साथ देखा जाना चाहिए था, वह कुछ ही दिनों में राजनीतिक बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और आंतरिक खींचतान का विषय बन गई। इसी पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का सख्त बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और इस तरह की निचले स्तर की बयानबाजी तत्काल बंद होनी चाहिए।

अजित पवार का निधन 28 जनवरी को पुणे के बारामती क्षेत्र में हुए विमान हादसे में हुआ। यह खबर जैसे ही सार्वजनिक हुई, पूरे महाराष्ट्र में शोक की लहर दौड़ गई। अजित पवार लंबे समय से राज्य की राजनीति में प्रभावशाली चेहरा रहे थे और उनके समर्थकों के लिए यह व्यक्तिगत क्षति से कम नहीं थी। उनके निधन के बाद 31 जनवरी को उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यहीं से राजनीतिक विवाद की शुरुआत हुई, क्योंकि कुछ नेताओं और दलों को यह निर्णय समय और संवेदना के लिहाज से उचित नहीं लगा।
महायुति के भीतर उभरता असंतोष
महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन महायुति, जिसमें भारतीय जनता पार्टी, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और दिवंगत अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गुट शामिल है, पहले से ही विभिन्न मुद्दों पर संतुलन साधने की कोशिश कर रहा था। अजित पवार के निधन के बाद यह संतुलन और भी नाजुक हो गया। शिवसेना के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सुनेत्रा पवार के शपथ ग्रहण समारोह के समय को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए। उनका कहना था कि किसी परिवार में शोक की स्थिति में इतनी जल्दी सत्ता से जुड़ा निर्णय लेना आम जनता की भावनाओं के अनुरूप नहीं है।
इन बयानों ने महायुति के भीतर की खींचतान को उजागर कर दिया। जहां एक ओर गठबंधन के नेता एकजुटता का संदेश देना चाहते थे, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक मंचों से उठते सवाल यह संकेत दे रहे थे कि अंदरखाने मतभेद गहरे हैं। यह विवाद केवल समय को लेकर नहीं था, बल्कि राजनीति में नैतिकता और परंपरा की व्याख्या को लेकर भी था।
देवेंद्र फडणवीस की कड़ी प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस पूरे विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसी की मृत्यु के बाद इस तरह की राजनीति करना न केवल अनुचित है, बल्कि समाज के लिए गलत संदेश भी देता है। फडणवीस ने स्पष्ट किया कि सुनेत्रा पवार के शपथ समारोह को लेकर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह अनावश्यक और गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में हर कोई अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
फडणवीस का यह बयान केवल विपक्ष के लिए नहीं था, बल्कि गठबंधन के भीतर उठ रही आवाजों के लिए भी एक सख्त संदेश था। उन्होंने यह संकेत दिया कि सत्ता में रहते हुए जिम्मेदारी और संवेदनशीलता दोनों जरूरी हैं, और शोक के समय राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता है।
शिवसेना नेताओं के सवाल और बयान
शिवसेना के वरिष्ठ नेता रामदास कदम ने इस मुद्दे पर सबसे तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे पर निशाना साधते हुए कहा कि अजित पवार की मृत्यु के बाद गंदी राजनीति शुरू कर दी गई। कदम का कहना था कि अजित पवार की चिता की आग अभी शांत भी नहीं हुई थी कि सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। उन्होंने इसे महाराष्ट्र की संस्कृति और परंपरा के खिलाफ बताया।
रामदास कदम ने यह भी कहा कि सुनील तटकरे ने उन लोगों के हितों के विरुद्ध काम किया, जिन्होंने उनके राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाने में मदद की थी। उनके अनुसार, दादा यानी अजित पवार की मृत्यु के तुरंत बाद शरद पवार को मात देने की राजनीति की गई, जो शर्मनाक है। उन्होंने यह दावा किया कि महाराष्ट्र की जनता इस तरह के आचरण को कभी माफ नहीं करेगी।
संजय शिरसाट और उदय सामंत की राय
शिवसेना के एक अन्य वरिष्ठ नेता और सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने भी इस मामले पर सवाल उठाए। उन्होंने छत्रपति संभाजीनगर में कहा कि इतनी दुखद घटना के तुरंत बाद शपथ लेना आम लोगों को स्वीकार्य नहीं है। उनके अनुसार, राजनीति में संवेदना और समय की समझ बेहद जरूरी है, और यहां उस संतुलन की कमी दिखाई दी।
उद्योग मंत्री उदय सामंत ने भी अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि सुनेत्रा पवार के उपमुख्यमंत्री बनने पर किसी को दुखी नहीं होना चाहिए, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि शपथ ग्रहण समारोह इतनी जल्दी क्यों हुआ। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या इस पूरे घटनाक्रम की कोई पटकथा पहले से लिखी गई थी। इस सवाल ने विवाद को और गहरा कर दिया, क्योंकि यह सीधे तौर पर सत्ता के भीतर योजनाबद्ध निर्णयों की ओर इशारा करता था।
विपक्ष और सार्वजनिक विमर्श
इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्षी दलों ने भी प्रतिक्रिया दी। हालांकि उनके बयान इस लेख के केंद्र में नहीं हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि अजित पवार की मृत्यु और उसके बाद की घटनाओं ने राज्य की राजनीति को एक नया मुद्दा दे दिया है। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक, लोग यह सवाल कर रहे हैं कि क्या सत्ता की जिम्मेदारी शोक से ऊपर हो सकती है, और क्या राजनीति में संवेदना के लिए कोई स्थान बचा है।
जनता के बीच भी इस मुद्दे पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कुछ लोगों का मानना है कि राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए जल्दी निर्णय जरूरी था, जबकि अन्य इसे असंवेदनशील और जल्दबाजी भरा कदम बता रहे हैं। यह विभाजन इस बात का संकेत है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि भावनाओं और मूल्यों से भी जुड़ी हुई है।
शोक, परंपरा और सत्ता का संतुलन
महाराष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति में शोक और परंपरा का विशेष महत्व रहा है। किसी बड़े नेता के निधन के बाद आमतौर पर एक निश्चित समय तक राजनीतिक गतिविधियां सीमित रहती हैं। ऐसे में सुनेत्रा पवार का तीन दिन के भीतर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेना कई लोगों को असहज लगा। हालांकि समर्थकों का तर्क है कि यह निर्णय पार्टी और गठबंधन की स्थिरता के लिए जरूरी था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि संवेदना और परंपरा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह विवाद केवल एक शपथ समारोह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रश्न को सामने लाता है कि भारतीय राजनीति में नैतिकता और मानवीय संवेदना का स्थान क्या है। देवेंद्र फडणवीस का बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस तरह की घटिया राजनीति बंद होनी चाहिए।
भविष्य की राजनीति पर असर
इस घटनाक्रम का असर महायुति के भीतर भविष्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। गठबंधन की मजबूती, आपसी विश्वास और सार्वजनिक छवि सभी इस विवाद से प्रभावित हो सकते हैं। यदि इस तरह के मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे, तो विपक्ष को भी गठबंधन पर हमला करने का अवसर मिलेगा।
देवेंद्र फडणवीस की कोशिश साफ दिखाई देती है कि वह इस विवाद को यहीं समाप्त करना चाहते हैं और सरकार के कामकाज पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में उठे सवाल आसानी से शांत नहीं होते। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि महायुति इस आंतरिक तनाव को कैसे संभालती है और क्या यह विवाद किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत देता है।
