फरीदाबाद की शांत रात उस समय हलचल से भर उठी जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी की गाड़ियां अल-फलाह विश्वविद्यालय के परिसर में दाखिल हुईं। गाड़ी से उतरते ही अधिकारी सीधे उस छात्रावास की तरफ बढ़े जहां कभी डॉ. शाहीन शाहिद रहा करती थीं। दिल्ली विस्फोट मामले में पहले ही गिरफ्तार की जा चुकी शाहीन को इस कार्रवाई के लिए साथ लाया गया था। उसके चेहरे पर तनाव साफ था, लेकिन उससे अधिक गंभीर माहौल उन अधिकारियों का था जिनके हाथ इस केस की जड़ तक पहुँचने के लिए समय बेहद कम था।

अल-फलाह विश्वविद्यालय के हॉस्टल के कमरा नंबर 22 में की गई इस तलाशी ने पूरे मामले में एक नया मोड़ जोड़ दिया। अलमारी के एक कोने में रखे बैग से जब करीब 18 लाख रुपये नकद निकले, तो अधिकारियों के चेहरों पर गंभीरता और बढ़ गई। यह रकम इतनी आसानी से किसी छात्रावास के कमरे में नहीं मिल सकती, और यही बात एजेंसी को यह सोचने पर मजबूर कर रही थी कि विश्वविद्यालय की चारदीवारी के भीतर कोई बड़ा नेटवर्क पनप चुका है।
कैसे पहुंची NIA शाहीन तक
10 नवंबर को दिल्ली में हुआ बम धमाका न सिर्फ राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया था, बल्कि इसने जांच एजेंसियों को भी उन लोगों तक पहुंचाया जिनपर किसी ने शक नहीं किया था। शाहीन शाहिद, जो कभी एक सामान्य डॉक्टर की तरह अपनी पहचान रखती थीं, अब जांच एजेंसी के लिए ‘व्हाइट कॉलर’ आतंकी मॉड्यूल से जुड़ी अहम कड़ी बन चुकी थीं।
दिल्ली के NIT इलाके की एक दुकान पर उनकी निशानदेही से कहानी का नया अध्याय शुरू हुआ। वह वही दुकान थी जहां से विस्फोटक पदार्थ तैयार करने के लिए रसायन खरीदे गए थे। जांचकर्ताओं ने जब दुकान से विश्वविद्यालय तक के उनके कनेक्शन को जोड़ा, तो नेटवर्क की गहराई समझना आसान होने लगा।
18 लाख की बरामदगी और कमरे में ही नोटों की गिनती
जब कमरे का दरवाजा खुला, तो अंदर हर चीज सामान्य लग रही थी। लेकिन अलमारी का लॉक खुलते ही कागज के बंडलों के बीच दबे 18 लाख रुपये सामने आ गए। NIA टीम ने मौके पर ही नोटों की गिनती की, ताकि रकम पर किसी प्रकार का विवाद न रहे।
इन नोटों की गड्डियों से यह शक और मजबूत हुआ कि किसी बड़े ऑपरेशन के लिए फंडिंग पहले ही विश्वविद्यालय के भीतर पहुंचाई जा चुकी थी। जांच अधिकारियों ने यह भी कहा कि यह रकम सीधे मॉड्यूल को सपोर्ट करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा पहुंचाई गई होगी।
फंडिंग का स्रोत अब जांच का मुख्य केंद्र
NIA अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उनकी अगली बड़ी प्राथमिकता इस पैसे के स्रोत का पता लगाना है। क्या यह रकम किसी बाहरी लिंक से लाई गई थी या विश्वविद्यालय में ही किसी माध्यम से इसका लेनदेन हुआ? यह सवाल अब इस केस की दिशा तय करेगा।
शाहीन को प्रशासनिक ब्लॉक, हॉस्टल, मेडिकल वार्ड, क्लासरूम और डॉक्टर के केबिन तक ले जाकर अधिकारियों ने उसकी दिनचर्या और संभावित सहयोगियों की तलाश की। विश्वविद्यालय के भीतर उसके संपर्कों की सूची तैयार की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसने किन-किन लोगों के साथ मिलकर इस नेटवर्क को मजबूत किया।
शाहीन और मुजम्मिल के बीच कनेक्शन
इस केस का एक और अहम चेहरा है डॉ. मुज़म्मिल अहमद गनई, जिसे NIA ने कुछ दिन पहले ही गिरफ्तार किया था। बताया गया कि मुज़म्मिल ने दो दुकानों की पहचान की थी जहां से अमोनियम नाइट्रेट खरीदा गया था। इसी रसद के दम पर वह दिल्ली विस्फोट का हिस्सा बनने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
मुज़म्मिल के कई ठिकानों की जांच के बाद यह खुलासा हुआ कि उसने 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट अलग-अलग जगह पर जमा कर रखा था। यह मात्रा किसी छोटे स्तर के प्रयोग के लिए नहीं हो सकती। खेतों से लेकर किराए पर लिए गए कमरे तक, हर जगह पर अधिकारियों को उसके छुपाए हुए विस्फोटक पदार्थ मिले।
NIA के अनुसार शाहीन और मुज़म्मिल के बीच संपर्क वर्षों पुराना था। अल-फलाह विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही शाहीन मॉड्यूल में सक्रिय थी। उसने अपने संपर्क बढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी, चाहे वह छात्र रहे हों या बाहर के लोग।
विश्वविद्यालय पर बढ़ी निगरानी
अल-फलाह विश्वविद्यालय अब सीधे जांच के दायरे में आ चुका है। पिछले दिनों विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर NCMEI ने भी नोटिस जारी किया था, जिससे संस्था पहले ही दबाव में थी। अब NIA की इस कार्रवाई ने प्रशासन की परेशानी और बढ़ा दी है।
जांच एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या विश्वविद्यालय की सुविधाओं का उपयोग इस मॉड्यूल ने किया। क्या कोई कर्मचारी, सुरक्षा कर्मी या प्रबंधन से जुड़े लोग इस नेटवर्क को जानते थे या अनजाने में उसका हिस्सा बन गए? यह सवाल अब जांच की दिशा बदल सकते हैं।
कमरे से मिलने वाले सुराग और NIA की आगे की रणनीति
कमरा नंबर 22 में मिली नकदी ही एकमात्र सूचना नहीं थी। कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, नोट्स, और संपर्कों से जुड़ी जानकारी भी बरामद हुई है। हालांकि NIA ने इन वस्तुओं के बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया, लेकिन सूत्रों का कहना है कि डिजिटल डाटा इस केस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
जांचकर्ताओं को अब यह पता लगाना है कि 18 लाख रुपये किस उद्देश्य से रखे गए थे। क्या यह किसी बड़े ऑपरेशन का फंड था? क्या यह रकम किसी विशेष व्यक्ति को देनी थी? या यह सिर्फ मॉड्यूल की नियमित फंडिंग का हिस्सा थी?
दिल्ली विस्फोट की गुत्थी अब नए मोड़ पर
दिल्ली विस्फोट में मिले कुछ बॉडी पार्ट्स की DNA रिपोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि फिदायीन उमर की मौत उसी धमाके में हुई थी। लेकिन यह धमाका अकेले नहीं हुआ। शाहीन, मुजम्मिल और शोएब जैसे नाम इस नेटवर्क की व्यापकता को दर्शाते हैं।
फरीदाबाद, दिल्ली, NIT क्षेत्र और अल-फलाह विश्वविद्यालय, इन सभी स्थानों को जोड़ने वाली यह कहानी अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है, लेकिन NIA यह मानकर चल रही है कि मॉड्यूल काफी समय से सक्रिय था।
जांच में सहयोग न करने वालों पर भी गिरेगी गाज
एजेंसी की टीम ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जो भी इस नेटवर्क को बढ़ाने में मददगार रहा होगा, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, सभी पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। विश्वविद्यालय में संपर्क सूची तैयार करने का काम तेजी से चल रहा है और आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां भी संभव हैं।
