भारतीय संगीत जगत का नाम आते ही जिन चुनिंदा हस्तियों का चेहरा सामने आता है, उनमें एआर रहमान सबसे अग्रणी स्थान रखते हैं। दशकों से उनकी धुनों ने न सिर्फ फिल्मी पर्दे को बल्कि आम जनजीवन को भी संवेदनाओं से जोड़ा है। ऑस्कर जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान से नवाजे जा चुके रहमान का यह कहना कि उन्हें धर्म की वजह से काम कम मिल रहा है, केवल एक व्यक्तिगत अनुभव भर नहीं रह गया है। यह बयान अब सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस का केंद्र बन चुका है।

हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में एआर रहमान ने जिस तरह से अपने अनुभव साझा किए, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भारत में रचनात्मकता और कला अब सत्ता, पहचान और विचारधाराओं से बंधती जा रही है। उन्होंने सीधे तौर पर किसी पर आरोप नहीं लगाया, लेकिन संकेतों में यह जरूर कहा कि बीते आठ वर्षों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें पहले जैसी स्वीकार्यता और काम नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने इसके पीछे बदलते पावर स्ट्रक्चर, रचनात्मक समझ में गिरावट और संभवतः सांप्रदायिक माहौल को एक कारक के रूप में देखा।
एआर रहमान का बयान और उसका गहरा अर्थ
एआर रहमान ने इंटरव्यू में कहा कि सत्ता में आए बदलाव का असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव कला और संस्कृति पर भी पड़ा है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनका दर्द किसी एक प्रोजेक्ट या फिल्म को लेकर नहीं है, बल्कि पूरे रचनात्मक वातावरण को लेकर है। उनके अनुसार, पहले कला को उसकी गुणवत्ता और संवेदना के आधार पर देखा जाता था, लेकिन अब समीकरण बदल गए हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि पिछले आठ वर्षों में हिंदी सिनेमा में उनके काम की संख्या पहले की तुलना में कम हो गई है। रहमान का कहना था कि यह कमी सिर्फ बाजार या ट्रेंड की वजह से नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुछ ऐसे तत्व भी हैं जो खुले तौर पर सामने नहीं आते। उन्होंने यह नहीं कहा कि उन्हें जानबूझकर बाहर किया गया, लेकिन यह जरूर संकेत दिया कि पहचान और धर्म जैसी चीजें कहीं न कहीं फैसलों को प्रभावित कर रही हैं।
यह बयान सामने आते ही सियासी गलियारों में हलचल मच गई। भारतीय राजनीति में कला और संस्कृति का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है, लेकिन जब यह सवाल एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित कलाकार उठाता है, तो उसका असर और भी गहरा हो जाता है।
अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया: कला को भेदभाव से ऊपर रखने की अपील
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एआर रहमान के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए संतुलित और भावनात्मक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने वह इंटरव्यू विस्तार से नहीं सुना है, लेकिन वे एआर रहमान के संगीत के लंबे समय से प्रशंसक रहे हैं।
अखिलेश यादव ने यह याद दिलाया कि एआर रहमान के गाने अक्सर रिलीज से पहले ही लोगों की जुबान पर चढ़ जाते थे। उनकी धुनें चार्ट में शीर्ष पर होती थीं और उनकी लोकप्रियता किसी प्रचार की मोहताज नहीं रही। उन्होंने कहा कि रहमान न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में जाने-माने कलाकार हैं और ऐसे में कला, संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में किसी भी तरह का भेदभाव दुर्भाग्यपूर्ण है।
उनके अनुसार, आर्ट और कल्चर वह क्षेत्र हैं जो समाज को जोड़ते हैं, न कि तोड़ते हैं। अगर किसी कलाकार को उसकी पहचान या धर्म के आधार पर देखा जाता है, तो यह समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं है। अखिलेश यादव ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया कि रचनात्मकता को राजनीतिक या सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए।
इमरान मसूद का हमला: सरकार पर गंभीर सवाल
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने एआर रहमान के बयान को और भी गंभीरता से लिया। उन्होंने कहा कि अगर एक ऑस्कर विजेता और विश्व प्रसिद्ध कलाकार यह कह रहा है कि उसे धर्म के कारण कम काम मिल रहा है, तो यह केवल फिल्म इंडस्ट्री की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है।
इमरान मसूद ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर अपने ही देश में किसी कलाकार को उसकी पहचान के कारण काम नहीं मिलता, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
उन्होंने देश में बढ़ते नफरत के माहौल का भी जिक्र किया और कहा कि जब समाज के भीतर विभाजन बढ़ता है, तो उसका असर हर क्षेत्र में दिखता है। इमरान मसूद ने विदेशों, विशेषकर बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रही हिंसा की घटनाओं का भी उल्लेख किया और कहा कि एक तरफ देश के भीतर नफरत का माहौल है, तो दूसरी तरफ बाहर भारतीय समुदाय और हिंदुओं पर हमले बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार, यह सब एक बड़े सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है।
विवाद की जड़: सत्ता, पहचान और रचनात्मक स्वतंत्रता
एआर रहमान के बयान के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में पिछले कुछ वर्षों में ऐसा क्या बदला है। रहमान ने खुद कहा कि सत्ता में बदलाव के बाद रचनात्मकता का वातावरण पहले जैसा नहीं रहा। उनके अनुसार, अब निर्णय लेने की प्रक्रिया में कला की समझ से ज्यादा अन्य कारक हावी हो गए हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि यह समस्या उनके करियर की शुरुआत से ही किसी न किसी रूप में मौजूद रही है। जब उन्होंने ‘रोजा’, ‘बंबई’ और ‘दिल से’ जैसी फिल्मों में संगीत दिया, तब भी उन्हें कहीं न कहीं बाहरी जैसा महसूस होता था। उस समय इसकी एक वजह यह भी थी कि वे तमिल फिल्म इंडस्ट्री से आए थे और हिंदी सिनेमा में उन्हें पूरी तरह अपनाने में समय लगा।
रहमान के अनुसार, सुभाष घई की फिल्म ‘ताल’ के बाद उन्हें हिंदी सिनेमा में व्यापक स्वीकार्यता मिली। इसके बाद उनका करियर लगातार ऊंचाइयों पर पहुंचा और उन्होंने कई यादगार फिल्में कीं। लेकिन वे यह भी मानते हैं कि 90 के दशक का दौर और मौजूदा समय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।
भाजपा नेताओं का विरोध और बढ़ता सियासी तापमान
एआर रहमान के बयान पर जहां विपक्षी दलों ने चिंता और समर्थन जताया, वहीं सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि रहमान का बयान देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला है और इसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
भाजपा नेताओं का तर्क है कि फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलना या न मिलना बाजार, दर्शकों की पसंद और प्रोजेक्ट की जरूरत पर निर्भर करता है, न कि किसी कलाकार के धर्म पर। उनका कहना है कि एआर रहमान जैसे बड़े कलाकार को यह समझना चाहिए कि हर दौर में काम की प्रकृति बदलती है।
हालांकि, इस विरोध के बावजूद यह तथ्य भी सामने है कि रहमान ने अपने बयान में किसी पार्टी या व्यक्ति का नाम नहीं लिया। उन्होंने इसे अपने व्यक्तिगत अनुभव और रचनात्मक माहौल की समीक्षा के रूप में पेश किया।
कला और कलाकार की पीड़ा: सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं
एआर रहमान का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी संघर्षरत कलाकार का नहीं, बल्कि एक स्थापित और सम्मानित शख्सियत का अनुभव है। जब इस स्तर का कलाकार भी खुद को हाशिए पर महसूस करता है, तो यह सवाल उठता है कि छोटे और नए कलाकारों की स्थिति क्या होगी।
कला का मूल स्वभाव स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति से जुड़ा होता है। जब कलाकार यह महसूस करने लगे कि उसकी पहचान उसकी कला से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, तो यह रचनात्मकता के लिए खतरनाक संकेत होता है। रहमान ने भले ही सीधे शब्दों में न कहा हो, लेकिन उनके बयान में यह दर्द साफ झलकता है।
समाज के सामने खड़ा बड़ा सवाल
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर समाज के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम कला को उसकी गुणवत्ता के आधार पर आंक रहे हैं या कलाकार की पहचान के आधार पर। क्या रचनात्मक क्षेत्रों में भी वही विभाजन प्रवेश कर गया है, जो राजनीति और समाज के अन्य हिस्सों में दिखाई देता है।
अखिलेश यादव और इमरान मसूद की प्रतिक्रियाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि यह मुद्दा केवल फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है। यह उस सोच से जुड़ा है, जहां भिन्नता को संदेह की नजर से देखा जाता है।
आगे का रास्ता: संवाद और आत्ममंथन की जरूरत
एआर रहमान के बयान को चाहे कोई समर्थन दे या विरोध, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह समय है जब समाज, सरकार और फिल्म इंडस्ट्री को मिलकर आत्ममंथन करना चाहिए। कला और संस्कृति किसी भी देश की आत्मा होती है और अगर वही संकुचित सोच की शिकार हो जाए, तो उसका असर पूरी पीढ़ी पर पड़ता है।
रहमान ने अपने अनुभव साझा कर एक बहस की शुरुआत की है। अब यह जिम्मेदारी समाज और सत्ता की है कि वह इस बहस को नफरत या राजनीति की बजाय संवाद और समाधान की दिशा में ले जाए।
