उत्तर प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा को लेकर सामने आया घोटाला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है जिस पर लाखों युवाओं का भविष्य टिका होता है। जिन परीक्षाओं को पारदर्शिता, निष्पक्षता और योग्यता का प्रतीक माना जाता है, वहीं परीक्षा अगर पैसों के दम पर नियंत्रित होने लगे तो समाज के हर हिस्से में इसका असर दिखाई देता है। लखनऊ से सामने आए इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि संगठित गिरोह किस तरह से शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी भर्तियों को अपना निशाना बना रहे हैं।

35 लाख रुपये में तय होती थी नौकरी
जांच एजेंसियों के अनुसार, असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में सेंधमारी करने वाले गिरोह ने प्रत्येक अभ्यर्थी से 35 लाख रुपये की डील तय कर रखी थी। यह रकम किसी एक व्यक्ति से नहीं बल्कि कई उम्मीदवारों से वसूली गई। आरोपियों की योजना थी कि पहले एडवांस के तौर पर 10 से 12 लाख रुपये लिए जाएं और शेष रकम परीक्षा संपन्न होने के कुछ दिन बाद वसूल की जाए। इस पूरे नेटवर्क को इस तरह से तैयार किया गया था कि अभ्यर्थियों को भरोसा दिलाया जा सके कि उनकी चयन प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित है।
गिरोह का पर्दाफाश और शुरुआती गिरफ्तारियां
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एसटीएफ को कुछ संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिली। शुरुआती जांच के बाद मामला विभूतिखंड थाने में दर्ज किया गया। जांच आगे बढ़ने पर यह साफ हो गया कि यह केवल कुछ लोगों की निजी हरकत नहीं बल्कि एक सुनियोजित नेटवर्क है। इसी कड़ी में सहायक प्रोफेसर बैजनाथ पाल, उसका भाई विनय कुमार और आयोग की अध्यक्ष का गोपनीय सहायक महबूब अली गिरफ्तार किए गए। इन तीनों की गिरफ्तारी के बाद मामले ने और गंभीर मोड़ ले लिया।
दोबारा विवेचना और जांच का दायरा बढ़ा
पहले चरण की जांच के बाद जब कई सवाल अनुत्तरित रह गए तो दोबारा विवेचना के आदेश दिए गए। इसके बाद पूरा मामला एसटीएफ को सौंपा गया। एसटीएफ की विस्तृत जांच में यह सामने आया कि परीक्षा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है और इसमें कई परतें छिपी हुई हैं। जांच के दौरान यह भी पता चला कि केवल कुछ अभ्यर्थियों से ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में उम्मीदवारों से करोड़ों रुपये की वसूली की गई थी।
मोबाइल डेटा ने खोले कई राज
जांच के दौरान आरोपियों के मोबाइल फोन से जो डेटा बरामद हुआ, उसने पूरे मामले की तस्वीर साफ कर दी। दर्जनों अभ्यर्थियों के मोबाइल नंबर, कॉल रिकॉर्ड और अन्य जानकारियां मिलीं। जब इन नंबरों का मिलान आयोग से प्राप्त अभ्यर्थियों के आधिकारिक डेटा से किया गया तो सब कुछ मेल खा गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि परीक्षा में सेंधमारी पूरी योजना के तहत की गई थी और इसमें अंदरूनी जानकारी का इस्तेमाल किया गया।
अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आती गई। सूत्रों के अनुसार, कुछ ऐसे लोग भी जांच के दायरे में हैं जिनकी जिम्मेदारी परीक्षा की गोपनीयता और निष्पक्षता बनाए रखने की थी। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे नेटवर्क में कौन-कौन शामिल था और किस स्तर तक मिलीभगत हुई।
अभ्यर्थियों के पुराने सवाल फिर उठे
असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा के बाद ही कई अभ्यर्थियों ने परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। रेंडमाइजेशन न होना, रोल नंबरों का पैटर्न, परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरों की कमी और समय से जुड़े नियमों का पालन न होना जैसे मुद्दे पहले भी चर्चा में थे। कई उम्मीदवारों ने यह आरोप लगाया था कि कुछ केंद्रों पर निर्धारित समय के बाद भी अभ्यर्थियों को प्रवेश दिया गया, जिससे संदेह और गहरा गया।
आउटसोर्स कर्मचारियों की भूमिका
जांच के दौरान एक आउटसोर्स कर्मचारी की गिरफ्तारी ने इस बात की पुष्टि कर दी कि केवल ऊपरी स्तर पर ही नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर भी गड़बड़ी की गई। उस कर्मचारी पर आरोप था कि वह परीक्षा के दौरान अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रहा था। इससे यह सवाल उठता है कि भर्ती प्रक्रिया में शामिल हर व्यक्ति की भूमिका की गहन जांच क्यों नहीं की जाती।
शिक्षा व्यवस्था पर गहरा असर
इस तरह के घोटाले केवल एक भर्ती परीक्षा तक सीमित नहीं रहते। इनका असर पूरे शिक्षा तंत्र पर पड़ता है। योग्य उम्मीदवारों का भरोसा टूटता है और समाज में यह संदेश जाता है कि मेहनत से ज्यादा पैसे की अहमियत है। यह स्थिति उन लाखों युवाओं के लिए निराशाजनक है जो ईमानदारी से तैयारी करते हैं और सिस्टम पर विश्वास रखते हैं।
आने वाले दिनों में और खुलासों की संभावना
एसटीएफ की जांच अभी जारी है और सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं। जिन लोगों के खिलाफ ठोस सबूत मिलेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। यह मामला अब सिर्फ एक परीक्षा घोटाले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता का बड़ा सवाल बन चुका है।
सिस्टम सुधार की जरूरत
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भर्ती परीक्षाओं की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। तकनीक का सही इस्तेमाल, जवाबदेही तय करना और समय-समय पर ऑडिट जैसी प्रक्रियाएं अगर प्रभावी ढंग से लागू की जाएं तो ऐसे मामलों पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है।
निष्कर्ष
असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में सामने आया यह घोटाला एक चेतावनी है कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो शिक्षा और रोजगार की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते रहेंगे। यह मामला केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का भी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क को कितनी गहराई तक उजागर कर पाती हैं और दोषियों को क्या सजा मिलती है।
