बांग्लादेश एक बार फिर संसदीय चुनावों की दहलीज पर खड़ा है, लेकिन इस बार हालात पहले जैसे नहीं हैं। देश की राजनीति की सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल रहीं शेख़ हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग चुनावी मैदान से बाहर हैं। जुलाई 2024 में हुए व्यापक जन आंदोलन के बाद सत्ता से बेदख़ल हुई अवामी लीग न केवल सरकार से बाहर है, बल्कि उसकी राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लग चुकी है और पार्टी का पंजीकरण भी रद्द कर दिया गया है। ऐसे में आगामी चुनावों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह चुनाव वास्तव में सहभागी, समावेशी और लोकतांत्रिक कहे जा सकते हैं।

जुलाई 2024 का आंदोलन और सत्ता परिवर्तन की पृष्ठभूमि
जुलाई 2024 बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बनकर उभरा। देशभर में फैले जन आंदोलन ने लंबे समय से सत्ता में रही अवामी लीग सरकार को उखाड़ फेंका। यह आंदोलन केवल सत्ता विरोधी नहीं था, बल्कि चुनावी व्यवस्था, राजनीतिक दमन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति भी था। आंदोलन के बाद बनी अंतरिम सरकार ने अवामी लीग पर कड़े कदम उठाए, जिनमें उसकी राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध और चुनाव आयोग द्वारा पार्टी का पंजीकरण रद्द किया जाना शामिल है।
लगातार विवादों से घिरे रहे पिछले चुनाव
बांग्लादेश में संसदीय चुनावों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है। साल 2014, 2018 और 2024 के चुनावों पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। 2014 और 2024 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव का बहिष्कार किया था, जिसके चलते ये चुनाव एकतरफा माने गए। सत्ता में रही अवामी लीग ने इन चुनावों के जरिए लगातार शासन किया, लेकिन विपक्ष और नागरिक समाज ने इनकी वैधता पर सवाल उठाए।
अब हालात उलट हैं। इस बार अवामी लीग चुनाव से बाहर है, जबकि वही दल मैदान में हैं, जिन्होंने पहले चुनावों में हिस्सा नहीं लिया था। इस बदलाव ने राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है।
इस बार चुनाव में कौन हैं मुख्य खिलाड़ी
आगामी संसदीय चुनावों में वही राजनीतिक ताकतें सक्रिय हैं, जो 2024 के आंदोलन के दौरान सड़कों पर उतरी थीं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी इस चुनाव में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। इन दोनों दलों का मानना है कि अवामी लीग की गैर-मौजूदगी चुनाव को अविश्वसनीय नहीं बनाती, बल्कि यह लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण का अवसर है।
इन दलों के नेताओं का दावा है कि चुनाव की सहभागिता का पैमाना किसी एक पार्टी की मौजूदगी नहीं, बल्कि मतदाताओं की भागीदारी है।
समावेशी चुनाव की अलग-अलग परिभाषाएं
समावेशी चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की व्याख्याएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं। जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व का कहना है कि चुनाव की सहभागिता का अर्थ है मतदाताओं की स्वतंत्र और निर्भीक उपस्थिति। उनके अनुसार, अगर मतदाता बिना दबाव के वोट डाल सकते हैं, तो चुनाव को सहभागी कहा जा सकता है, भले ही कोई बड़ी पार्टी मैदान में न हो।
वहीं बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का रुख और भी सख्त है। उसके नेताओं का दावा है कि अवामी लीग अब एक राजनीतिक दल नहीं रही, बल्कि उसका चरित्र पूरी तरह बदल चुका है। उनके अनुसार, अवामी लीग की अनुपस्थिति ही इस चुनाव को समावेशी बनाती है, क्योंकि इससे कथित दमनकारी राजनीति का अंत हुआ है।
जातीय पार्टी की आशंका और चेतावनी
इन दावों के उलट, जातीय पार्टी ने चुनाव की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर शंकाएं जाहिर की हैं। पार्टी का कहना है कि देश एक अनियंत्रित चुनाव की ओर बढ़ रहा है, जहां मतदान के दिन स्थानीय ताकतें और प्रभावशाली समूह हालात को अपने हिसाब से मोड़ सकते हैं।
जातीय पार्टी के नेताओं का मानना है कि चुनाव लोकतांत्रिक बदलाव की दिशा में जरूरी कदम है, लेकिन इसके लिए यह भी जरूरी है कि सभी वर्गों और विचारधाराओं को चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर मिले।
अवामी लीग के समर्थकों की भूमिका
भले ही अवामी लीग चुनाव मैदान में नहीं है, लेकिन उसके समर्थकों की संख्या अब भी बड़ी है। पिछले चुनावी आंकड़ों से साफ है कि बांग्लादेश की राजनीति में सबसे बड़ा वोट बैंक अवामी लीग और बीएनपी के समर्थकों का ही रहा है। ऐसे में अवामी लीग के वोटरों का रुख इस चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।
अवामी लीग ने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से मतदान से दूर रहने की अपील की है। यह अपील मतदान प्रतिशत पर कितना असर डालेगी, इसको लेकर राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की राय बंटी हुई है।
मतदान प्रतिशत और चुनाव की स्वीकार्यता
चुनाव की वैधता का सबसे अहम पैमाना मतदान प्रतिशत माना जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर मतदान 50 प्रतिशत से कम रहता है, तो चुनाव की स्वीकार्यता पर गंभीर सवाल उठेंगे। लंबे समय बाद हो रहे इस चुनाव में अपेक्षा की जा रही है कि लोग बड़ी संख्या में मतदान करेंगे।
कुछ नेताओं का दावा है कि युवा मतदाता, खासकर 18 से 35 वर्ष की उम्र के लोग, स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान को लेकर उत्साहित हैं और वे किसी भी सूरत में वोट डालने पहुंचेंगे। वहीं कुछ का मानना है कि अवामी लीग समर्थकों की अनुपस्थिति मतदान को प्रभावित कर सकती है।
सुरक्षा और भय का माहौल
चुनाव के दौरान सुरक्षा का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले चुनावों में अल्पसंख्यक समुदायों के बीच डर का माहौल बनाया गया, जिससे वे मतदान से दूर रहे। धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के लिए मतदान करना जोखिम भरा अनुभव बन गया था।
इस बार भी ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अगर सरकार और चुनाव आयोग ने सुरक्षा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए, तो मतदान प्रतिशत प्रभावित हो सकता है। केवल अल्पसंख्यक ही नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समुदायों में भी भय और असुरक्षा की भावना देखी जा रही है।
अंतरिम सरकार और चुनाव आयोग की परीक्षा
यह चुनाव अंतरिम सरकार और चुनाव आयोग दोनों के लिए एक बड़ी परीक्षा है। अंतरिम सरकार को यह साबित करना होगा कि वह किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष में नहीं है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ा रही है। वहीं चुनाव आयोग के सामने चुनौती है कि वह स्वतंत्र, निष्पक्ष और सुरक्षित मतदान सुनिश्चित करे।
विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग की भूमिका ही यह तय करेगी कि आने वाले समय में इस चुनाव को किस नजर से देखा जाएगा।
लोकतंत्र के भविष्य पर टिकी निगाहें
शेख़ हसीना और अवामी लीग के बिना हो रहे यह चुनाव बांग्लादेश के लोकतंत्र के लिए एक नए अध्याय की तरह हैं। यह अध्याय सशक्त लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण का प्रतीक बनेगा या फिर एक और विवादित चुनाव के रूप में याद किया जाएगा, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि मतदान कितना स्वतंत्र, सुरक्षित और सहभागी होता है।
देश के भीतर और बाहर, सभी की निगाहें इस चुनाव पर टिकी हैं। यह केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करने वाला क्षण है।
