बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। कारण है — देश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के करीबी सहयोगी और पूर्व शिक्षा उपमंत्री मोहिबुल हसन चौधरी (Nowfel) का वह बयान, जिसने विश्व राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। चौधरी का दावा है कि 2024 में शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के पीछे अमेरिकी एजेंसी “USAID” और क्लिंटन परिवार की सीधी भूमिका थी।

यह बयान न केवल बांग्लादेश की राजनीति में सनसनी फैला गया है, बल्कि अमेरिका-बांग्लादेश संबंधों पर भी नए सवाल खड़े कर रहा है।
क्या था चौधरी का खुलासा?
ढाका में आयोजित एक टेलीविज़न डिबेट के दौरान चौधरी ने कहा—
“हमारी सरकार को गिराने का षड्यंत्र देश के अंदर नहीं, बल्कि बाहर से रचा गया था। अमेरिका की USAID और कुछ विदेशी राजनीतिक ताकतें इसमें शामिल थीं। वे नहीं चाहती थीं कि बांग्लादेश आत्मनिर्भर और चीन के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखे।”
उन्होंने आगे कहा कि हसीना सरकार का चीन के साथ बढ़ता सामरिक सहयोग और भारत के साथ मजबूत संबंध अमेरिकी रणनीति के लिए खतरे के रूप में देखा गया।
पृष्ठभूमि: शेख हसीना की सत्ता से विदाई कैसे हुई?
2024 के मध्य में बांग्लादेश में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के बीच शेख हसीना को सत्ता से हटना पड़ा था। उस समय विपक्षी पार्टियों, विशेषकर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने हसीना सरकार पर भ्रष्टाचार, अधिनायकवाद और चुनावी धांधली के आरोप लगाए थे।
परंतु, चौधरी का यह दावा एक अलग ही तस्वीर पेश करता है — जिसमें हसीना सरकार का पतन “आंतरिक विरोध” नहीं बल्कि “बाहरी हस्तक्षेप” का परिणाम बताया गया है।
क्या थी USAID की भूमिका?
USAID (United States Agency for International Development) आमतौर पर विकास, शिक्षा, और लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए काम करती है। लेकिन चौधरी का कहना है कि USAID ने अपने विकास कार्यक्रमों के नाम पर कई एनजीओ और संगठनों को “राजनीतिक वित्तपोषण” किया, जिससे हसीना सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया गया।
उन्होंने आरोप लगाया —
“यह वित्तपोषण विरोध प्रदर्शन को संगठित करने, सोशल मीडिया पर नैरेटिव बनाने और अंतरराष्ट्रीय दबाव खड़ा करने के लिए इस्तेमाल हुआ।”
क्लिंटन परिवार पर क्यों उठी उंगली?
मोहिबुल चौधरी ने यह भी दावा किया कि क्लिंटन फाउंडेशन और इसके संबद्ध नेटवर्क ने बांग्लादेश के कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूहों के साथ मिलकर राजनीतिक अस्थिरता पैदा की। उन्होंने कहा कि हसीना सरकार की नीतियां कुछ अमेरिकी निवेशकों को पसंद नहीं थीं, खासकर उन नीतियों के कारण जिनसे बांग्लादेश में “चीनी इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश” को बढ़ावा मिला।
अमेरिका का जवाब क्या है?
अब तक अमेरिकी दूतावास या USAID की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने पहले भी कहा था कि “बांग्लादेश की राजनीति में अमेरिका का कोई दखल नहीं है” और उनका उद्देश्य केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना है।
🌐 आंतरिक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय समीकरण
बांग्लादेश दक्षिण एशिया में सामरिक दृष्टि से बेहद अहम देश है। यह भारत, चीन और म्यांमार की सीमाओं से जुड़ा है और बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थिति रखता है। इस कारण अमेरिका, चीन और भारत — तीनों ही देश बांग्लादेश को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखना चाहते हैं।
हसीना के शासन में बांग्लादेश ने भारत के साथ सुरक्षा और व्यापारिक सहयोग को मजबूत किया, वहीं चीन से आर्थिक सहायता लेकर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू किए। यह अमेरिकी नीति निर्माताओं के लिए “दोहरी चुनौती” बन गया।
सत्ता पलट के बाद बांग्लादेश की स्थिति
हसीना के हटने के बाद बनी अंतरिम सरकार ने कई नीतियों की समीक्षा शुरू की है। विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, और निवेश में गिरावट देखी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का कहना है कि यदि चौधरी का यह दावा सच है, तो यह दक्षिण एशियाई राजनीति में एक नया भू-राजनीतिक मोड़ साबित हो सकता है।
विश्लेषण: क्या अमेरिका ने सच में हस्तक्षेप किया?
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर अब्दुल करीम कहते हैं,
“बांग्लादेश में अमेरिका की दिलचस्पी नई नहीं है। पिछले दो दशकों से वे लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर अपने रणनीतिक हित साधते रहे हैं।”
लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चौधरी का यह बयान राजनीतिक सहानुभूति हासिल करने की रणनीति भी हो सकता है।
इतिहास क्या कहता है?
1971 में स्वतंत्रता के बाद से बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता रही है। सैन्य तख्तापलट, राजनीतिक हत्याएं और विदेशी हस्तक्षेप इसके इतिहास का हिस्सा रहे हैं। शेख हसीना और उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान का परिवार हमेशा से विदेशी साजिशों के निशाने पर रहा है।
निष्कर्ष
मोहिबुल हसन चौधरी का यह खुलासा बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। अगर उनके आरोपों की जांच होती है, तो यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अमेरिका की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।
एक बात साफ है — बांग्लादेश की राजनीति सिर्फ ढाका तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब यह वॉशिंगटन, बीजिंग और नई दिल्ली के पावर सर्कल्स तक पहुंच चुकी है।
