मध्यप्रदेश के बैतूल जिले से एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसने न केवल शिक्षा व्यवस्था बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की नींव को भी हिला दिया है। घोड़ाडोंगरी ब्लॉक के चिखलपाटी गांव में पदस्थ एक सरकारी स्कूल शिक्षक, जो बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा संभालता था, स्कूल छोड़कर अपने घर में क्लीनिक चलाता मिला। इस शिक्षक का नाम रघुनाथ फौजदार है, जो पिछले आठ वर्षों से झोलाछाप डॉक्टर बनकर ग्रामीणों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहा था।

स्कूल के समय मरीजों का इलाज करते रंगे हाथों पकड़ा गया
स्वास्थ्य विभाग की टीम को सूचना मिली थी कि गांव का एक शिक्षक स्कूल जाने की बजाय लोगों का इलाज करता है। टीम ने अचानक छापा मारा और जो दृश्य सामने आया, उसने सभी को हैरान कर दिया। रघुनाथ फौजदार स्कूल समय में ही अपने घर में बने क्लीनिक में मरीजों का इलाज कर रहा था। उसके पास भारी मात्रा में दवाइयां, इंजेक्शन, ड्रिप सेट और बायोवेस्ट बरामद हुआ। टीम ने मौके पर जांच की और उसका पूरा “क्लीनिक” सील कर दिया।
रघुनाथ से जब पूछताछ की गई, तो उसने स्वीकार किया कि वह आठ वर्षों से इसी तरह इलाज कर रहा है। उसने साफ कहा कि गांव में कोई डॉक्टर नहीं है, इसलिए ग्रामीण उसी के पास इलाज के लिए आते हैं।
गांव में डॉक्टर नहीं, मजबूरी में ‘मास्टर साहब’ बने वैद्य
चिखलपाटी और आसपास के गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद कमजोर हैं। यहां न तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा है और न ही कोई योग्य डॉक्टर। बीमार होने पर लोगों को कई किलोमीटर दूर ब्लॉक मुख्यालय तक जाना पड़ता है। इसी कमी का फायदा उठाकर रघुनाथ फौजदार ने खुद को “डॉक्टर” घोषित कर दिया।
ग्रामीणों ने बताया कि रघुनाथ इंजेक्शन लगाता था, ड्रिप चढ़ाता था और हर बीमारी की दवा देता था। कई बार मरीजों की हालत बिगड़ भी जाती थी, लेकिन ग्रामीणों के पास कोई विकल्प नहीं था। “हमें तो वो ही डॉक्टर लगता था,” एक ग्रामीण ने बताया, “वो स्कूल में मास्टर है, पढ़ा-लिखा आदमी है, इसलिए भरोसा किया।”
स्वास्थ्य विभाग ने पकड़ा, लेकिन कार्रवाई अभी अधूरी
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने छापा मारने के बाद दवाओं की लिस्ट तैयार की और रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेज दी है। लेकिन, अब तक रघुनाथ फौजदार के खिलाफ कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। विभाग का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।
यह स्थिति दर्शाती है कि प्रशासनिक लापरवाही कितनी गहरी है — जहां एक शिक्षक आठ वर्षों तक स्कूल छोड़कर इलाज करता रहा और किसी अधिकारी को भनक तक नहीं लगी।
शिक्षा विभाग की चुप्पी: क्या किसी ने जांच की जहमत नहीं उठाई?
रघुनाथ फौजदार कुंडीखेड़ा के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में पदस्थ है। स्कूल के बच्चों और अभिभावकों का कहना है कि “मास्टर साहब” महीनों से स्कूल में नहीं आते थे। “जब भी पूछो, लोग कहते कि वे किसी के इलाज में व्यस्त हैं,” गांव के सरपंच ने कहा।
अगर शिक्षा विभाग ने समय पर जांच की होती, तो यह मामला शायद इतना बड़ा नहीं बनता। सवाल यह है कि क्या स्कूल निरीक्षण महज औपचारिकता बनकर रह गया है?
झोलाछाप डॉक्टरों का जाल और सरकारी लापरवाही
मध्यप्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में झोलाछाप डॉक्टरों का जाल फैला हुआ है। योग्य डॉक्टरों की कमी, स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और ग्रामीणों की मजबूरी ने इन नकली चिकित्सकों को पनपने का मौका दिया है। बैतूल का यह मामला उस सिस्टम की नाकामी का प्रतीक है, जहां एक शिक्षक सरकारी वेतन लेकर दोहरी कमाई के लिए लोगों की जान जोखिम में डालता रहा।
कुछ साल पहले परासिया में डॉ. सोनी और ज्योति सोनी द्वारा गलत कफ सिरप के कारण 26 बच्चों की मौत हुई थी। इसके बाद भी स्वास्थ्य तंत्र ने कोई सबक नहीं सीखा।
लोगों की जान से खिलवाड़ करने की कीमत कौन देगा?
रघुनाथ फौजदार जैसे लोगों के कारण न केवल बीमार मरीज खतरे में पड़ते हैं, बल्कि असली डॉक्टरों की साख भी दांव पर लगती है। कोई भी गलत दवा या इंजेक्शन मरीज की जान ले सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में सख्त कार्रवाई जरूरी है ताकि अन्य लोग सबक लें।
कानूनी कार्रवाई और आगे की जांच
स्वास्थ्य विभाग ने कहा है कि बरामद दवाओं का परीक्षण किया जाएगा और जांच के बाद रिपोर्ट पुलिस को सौंपी जाएगी। यदि यह साबित हुआ कि शिक्षक ने फर्जी इलाज से किसी मरीज को नुकसान पहुंचाया, तो उस पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा। शिक्षा विभाग को भी इसकी रिपोर्ट भेजी गई है ताकि उसे तत्काल निलंबित किया जा सके।
जनता की उम्मीदें और सिस्टम की जिम्मेदारी
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का आईना है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त डॉक्टर, स्वास्थ्य सेवाएं और प्रशासनिक निगरानी नहीं होगी, ऐसे “मास्टर डॉक्टर” पनपते रहेंगे।
सरकार को चाहिए कि हर स्कूल और गांव में सख्त निगरानी तंत्र विकसित करे ताकि शिक्षक अपने कर्तव्यों से न भागें और ग्रामीणों को सही चिकित्सा सुविधा मिल सके।
