मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में स्थित दानवाखेड़ा नाम का छोटा और घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र इन दिनों एक अनजानी और रहस्यमयी बीमारी से जूझ रहा है। बीते छह महीनों में यहां दो मासूम बच्चों की मौत ने हर परिवार के मन में भय, चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। गांव में रहने वाले लगभग 150 परिवारों के जीवन में इस बीमारी ने अचानक अंधेरा फैला दिया है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं तरह-तरह के संक्रमण, बुखार, त्वचा रोग, कमजोरी और दर्द से परेशान हैं, परंतु बीमारी का वास्तविक कारण अभी तक स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है।

दानवाखेड़ा कैसे बसा और क्यों बढ़ी समस्या
लगभग 5 से 7 वर्ष पूर्व कई आदिवासी परिवार छिंदवाड़ा जिले की सीमा से यहां आकर बसे थे। ये परिवार जंगल के बीच खेती, मजदूरी और छोटे स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित कार्य कर अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते हैं। आज तक यहाँ पक्के मकान, स्वच्छ पेयजल व्यवस्था, सड़कें, स्वास्थ्य केंद्र और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं। स्थानीय लोगों ने बाँध के किनारे, नदी-नालों और गहरी खाईनुमा जगहों में बसेरे बना लिए हैं।
शहरों से कटा यह क्षेत्र प्रशासन के लिए भी कई वर्षों तक लगभग अनजान रहा। क्योंकि यहां से शिकायतें नहीं आतीं, गांव वालों का बाहर से संपर्क कम है, अस्पताल जाने की आदत कम है और फोन या नेटवर्क सुविधाएँ भी सीमित हैं।
रहस्यमयी बीमारी के लक्षण
गांव से मिली जानकारी और स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई प्राथमिक जांच के अनुसार इस बीमारी के लक्षण कुछ इस प्रकार सामने आए हैं
- पहले शरीर पर फुंसियों जैसे घाव दिखाई देते हैं
- घाव धीरे-धीरे लाल और दर्दनाक हो जाते हैं
- फिर तेज़ बुखार चढ़ता है
- नींद कम हो जाती है
- खुराक कम होती जाती है और शरीर कमजोर पड़ने लगता है
कई परिवारों का कहना है कि बच्चों में यह समस्या पहले आती है और इसके बाद बुजुर्ग प्रभावित हो जाते हैं। इस बीमारी की सबसे भयावह स्थिति यह है कि दो छोटे बच्चों की हालत अचानक बिगड़ने पर मौत हो गई और मौत की सही वजह अभी स्वास्थ्य अधिकारियों के सामने स्पष्ट नहीं है।
जिन मासूमों ने दम तोड़ा
दुख की बात यह है कि गांव के ही 2 साल के प्रहलाद और 9 महीने के अमल की बीमारी अचानक बिगड़ गई। गांव वालों ने शुरुआत में इसे सामान्य संक्रमण समझकर घरेलू जड़ी-बूटी या नीम-हल्दी के लेप से ठीक करने की कोशिश की। बच्चे आगे कुछ दिनों तक ठीक दिखे लेकिन अचानक बुखार बढ़ा और शरीर में संक्रमण फैल गया। इलाज तक पहुंच न होने के कारण दोनों बच्चों की जान चली गई।
अगर बीमारी की जानकारी समय पर स्वास्थ्य विभाग तक पहुंच जाती, तो डॉक्टरों का कहना है कि शायद बच्चों का जीवन बचाया जा सकता था।
अब जांच में जुटे स्वास्थ्य अधिकारी
जैसे ही प्रशासन को जानकारी मिली, सरकारी सूत्र हरकत में आए। प्राथमिक चिकित्सा विभाग, जिला अस्पताल के चिकित्सक, पानी परीक्षण टीम, पोषण निरीक्षक और एंबुलेंस दल दानवाखेड़ा पहुंचे। विशेषज्ञ पानी के स्रोत का परीक्षण कर रहे हैं। टीमें मिट्टी, भोजन और रहने की जगहों का भी निरीक्षण कर रही हैं।
स्वास्थ्य अधिकारी इस क्षेत्र में विशेष शिविर लगाने की तैयारी कर रहे हैं। बीमार बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को दवाईयाँ दी जा रही हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सकों ने इसे त्वचा संक्रमण, कुपोषण, पानी की अशुद्धि और मच्छरों द्वारा फैलने वाले रोगों का संयुक्त प्रभाव माना है।
पानी की समस्या सबसे बड़ी चिंता
गांव में न तो कुएँ हैं और न ही नल-जल योजना पहुंची है। इसलिए लोग नदी या छोटे गड्ढों से निकला पानी पीते हैं। बरसात में मिट्टी मिश्रित पानी और सर्दियों में गंदे तालाबों का पानी ही इनका साधन बना रहता है।
जैविक शोधकर्ताओं का कहना है कि अशुद्ध पानी बीमारी का प्रमुख कारण बन सकता है। पानी में बैक्टीरिया, परजीवी, मच्छरों का लार्वा और फफूंद भी तेजी से फैलता है।
प्रशासन ने पुनर्वास का सुझाव दिया
प्रशासन कई बार इन परिवारों से जंगल के बीच बसेरें छोड़ कर सरकारी बसाहट क्षेत्र में जाने का अनुरोध कर चुका है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यही जमीन उनकी रोजीरोटी है। यही खेत, यही वन-उत्पाद और यही पशुपालन का साधन है।
वे मानते हैं कि जंगल छोड़ने पर उन्हें रोजगार नहीं मिलेगा।
लेकिन प्रशासन की राय है कि
- जंगल में रहना जोखिम भरा है
- आपदा स्थिति में मदद देर से पहुंचती है
- शिक्षा, चिकित्सा और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता
इस कारण प्रशासन पुनर्वास योजना आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
बीमारी ने दी चेतावनी
इस घटना ने यह संकेत दे दिया कि बिना मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं और साफ-सफाई के जीना कितना खतरनाक हो सकता है। कई परिवार लंबे समय से सामान्य बीमारियों को सामान्य ही समझते रहे हैं। बच्चों में कमजोरी, पेट दर्द, चर्म रोग और खून की कमी आम थी, लेकिन जांच कभी नहीं हुई।
- अब स्वास्थ्य दल हर घर में सर्वे कर रहा है
- बच्चों का वजन और ऊंचाई दर्ज की जा रही है
- रक्त जांच की तैयारी की जा रही है
- पानी को क्लोरीनयुक्त बनाने की व्यवस्था की जा रही है
