मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। जिस व्यवस्था को आम नागरिकों की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए बनाया गया था, वही व्यवस्था अब खुद सवालों के घेरे में खड़ी नजर आ रही है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ रही है और उनका समय पर समाधान न होना नागरिकों की निराशा को और गहरा कर रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भोपाल में इस समय 20 हजार से अधिक शिकायतें लंबित पड़ी हैं, जिनमें से लगभग 9 हजार 450 शिकायतें ऐसी हैं जो 50 दिनों से भी ज्यादा समय से लंबित हैं।

यह आंकड़ा केवल संख्या भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे हजारों परिवारों की रोजमर्रा की परेशानियां, प्रशासन से जुड़ी उम्मीदें और बार-बार टूटता भरोसा छिपा हुआ है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन को प्रदेश सरकार ने एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था के रूप में स्थापित किया था, जहां नागरिक बिना किसी भय या बाधा के अपनी समस्या दर्ज करा सकें और समयबद्ध समाधान प्राप्त कर सकें। लेकिन जमीनी हकीकत यह बताती है कि शिकायत दर्ज होना तो आसान है, पर समाधान तक पहुंचने का रास्ता लंबा और थकाऊ हो गया है।
भोपाल जैसे बड़े शहरी क्षेत्र में शिकायतों का यह अंबार प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों में पानी, बिजली, सड़क, सफाई, राजस्व, पुलिस, नगर निगम और अन्य विभागों से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं। इनमें से कई शिकायतें ऐसी हैं, जो नागरिकों के दैनिक जीवन को सीधे प्रभावित करती हैं। पानी की आपूर्ति न होना, टूटी सड़कें, महीनों से अटके राजस्व कार्य, सफाई व्यवस्था की बदहाली और अन्य मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं अक्सर शिकायतों के रूप में दर्ज की जाती हैं।
समस्या केवल शिकायतों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि शिकायतों के समाधान में हो रही देरी ज्यादा गंभीर मुद्दा बनकर उभर रही है। 50 दिन से अधिक पुरानी शिकायतों की संख्या यह दर्शाती है कि सिस्टम के भीतर कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं। कई मामलों में शिकायतकर्ता को यह तक नहीं पता चल पाता कि उसकी शिकायत किस स्तर पर अटकी हुई है। कभी विभागीय स्तर पर जवाब लंबित रहता है, तो कभी समाधान के नाम पर केवल औपचारिक टिप्पणी दर्ज कर दी जाती है।
नागरिकों का कहना है कि कई बार शिकायत का स्टेटस ‘निस्तारित’ दिखा दिया जाता है, जबकि जमीनी स्तर पर समस्या जस की तस बनी रहती है। इससे लोगों में नाराजगी बढ़ती है और वे दोबारा, कभी-कभी तीसरी बार भी वही शिकायत दर्ज करने को मजबूर होते हैं। इस प्रक्रिया में समय, ऊर्जा और भरोसा तीनों खर्च होते हैं।
प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो शिकायतों की संख्या बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। एक ओर शहरी आबादी का तेजी से बढ़ना, दूसरी ओर विभागों में सीमित संसाधन और कर्मचारियों पर बढ़ता काम का दबाव। कई विभागों में शिकायतों के निस्तारण के लिए जिम्मेदार अधिकारी पहले से ही अन्य प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं, जिससे हेल्पलाइन की शिकायतें प्राथमिकता सूची में पीछे छूट जाती हैं।
इसके अलावा, तकनीकी स्तर पर भी चुनौतियां सामने आती हैं। कई बार शिकायत सही विभाग तक समय पर नहीं पहुंच पाती या विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण मामला अटक जाता है। कुछ मामलों में शिकायतों की श्रेणी गलत चयन होने से भी समाधान में देरी होती है। हालांकि, इन सब कारणों का सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है, जो केवल अपनी समस्या का समाधान चाहता है।
भोपाल में 20 हजार से अधिक लंबित शिकायतें यह भी दर्शाती हैं कि शहर में नागरिक सुविधाओं को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। यह असंतोष केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से प्रशासन के प्रति भरोसे को कमजोर करता है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का उद्देश्य था कि लोगों को दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें, लेकिन जब शिकायतों का समाधान नहीं होता, तो लोग फिर से पारंपरिक रास्तों की ओर लौटने को मजबूर हो जाते हैं।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है, जब शिकायतों के निस्तारण के लिए स्पष्ट समय-सीमा, जवाबदेही और निगरानी तंत्र मजबूत हो। केवल शिकायत दर्ज करने की सुविधा पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाधान की गुणवत्ता और समयबद्धता भी उतनी ही जरूरी है।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि लंबित शिकायतों को कम करने के लिए समय-समय पर समीक्षा बैठकें की जाती हैं और विभागों को निर्देश दिए जाते हैं। कुछ मामलों में अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात भी सामने आती है। हालांकि, जमीनी स्तर पर इन प्रयासों का असर अभी अपेक्षित रूप से दिखाई नहीं दे रहा है।
भोपाल जैसे शहर में, जहां नागरिक सुविधाओं का दायरा बड़ा है और आबादी घनी है, वहां शिकायतों का प्रबंधन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन यही चुनौती प्रशासनिक क्षमता की असली परीक्षा भी है। यदि शिकायतों का समय पर समाधान नहीं होता, तो इसका असर केवल वर्तमान पर नहीं, बल्कि भविष्य की योजनाओं और नागरिकों के भरोसे पर भी पड़ता है।
मुख्यमंत्री हेल्पलाइन को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि इसे केवल एक शिकायत पोर्टल न मानकर एक फीडबैक सिस्टम के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। शिकायतों के विश्लेषण से यह समझा जा सकता है कि किन क्षेत्रों या विभागों में बार-बार समस्याएं आ रही हैं और वहां नीतिगत सुधार की जरूरत है। यदि बार-बार पानी की आपूर्ति को लेकर शिकायतें आ रही हैं, तो केवल व्यक्तिगत शिकायतें न सुलझाकर पूरी व्यवस्था में सुधार पर ध्यान देना चाहिए।
नागरिकों की अपेक्षा है कि उनकी शिकायत केवल एक नंबर बनकर न रह जाए, बल्कि उसका वास्तविक समाधान हो। जब कोई व्यक्ति हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करता है, तो उसके पीछे यह विश्वास होता है कि सरकार उसकी बात सुनेगी और कार्रवाई करेगी। जब यह विश्वास टूटता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक और प्रशासन के बीच की दूरी बढ़ती है।
भोपाल में लंबित शिकायतों की संख्या यह संकेत भी देती है कि भविष्य में यदि इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। शिकायतों का बोझ बढ़ने से न केवल प्रशासनिक तंत्र पर दबाव बढ़ेगा, बल्कि नागरिकों का असंतोष भी गहराएगा।
इस पूरे परिदृश्य में यह जरूरी हो जाता है कि मुख्यमंत्री हेल्पलाइन को लेकर ठोस और दीर्घकालिक सुधार किए जाएं। तकनीकी उन्नयन, विभागीय समन्वय, कर्मचारियों की संख्या और प्रशिक्षण, तथा जवाबदेही तय करने जैसे कदम इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
अंततः, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का उद्देश्य केवल आंकड़ों में शिकायतें दर्ज करना नहीं, बल्कि नागरिकों की समस्याओं को समझकर उनका समाधान करना है। भोपाल में सामने आए आंकड़े एक चेतावनी की तरह हैं, जो यह बताते हैं कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो भरोसे की यह खाई और चौड़ी हो सकती है।
