राजधानी भोपाल में एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान से जुड़े छेड़छाड़ और हैरेसमेंट के मामले ने अब गंभीर रूप ले लिया है। घटना को एक महीना बीत चुका है, लेकिन पुलिस जांच अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। पीड़िता का आरोप है कि उसे बार-बार थाने बुलाकर बयान तो लिए गए, मगर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ टालमटोल और ताने मिले।
यह मामला भोपाल की मशहूर कोचिंग संस्था “टॉप रैंकर्स” (Top Rankers) से जुड़ा है, जिसके फाउंडर हर्ष गगरानी, उनके सहयोगी करण, और एक अन्य कर्मचारी शाहनवाज खान पर महिला कर्मचारी ने छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और धमकाने के गंभीर आरोप लगाए हैं।

पीड़िता की आपबीती: “न्याय की उम्मीद में थाने गई, उल्टा फटकार सुननी पड़ी”
पीड़िता ने बताया कि शिकायत दर्ज कराए अब एक महीना हो चुका है, लेकिन अब तक एफआईआर तक नहीं हुई है। उसका कहना है —
“मुझे चार बार अलग-अलग तारीखों पर थाने बुलाया गया। हर बार बयान लिया गया, लेकिन हर बार मुझसे ही सवाल-जवाब किए गए, जैसे मैं ही अपराधी हूं। पुलिस ने कहा कि ऐसे मामलों में सोच-समझकर बोलो। आखिर मैं और क्या करूं जब हर रास्ता बंद है?”
उसकी आवाज़ में थकान, नाराज़गी और निराशा साफ झलकती है। वह कहती है कि यह मामला केवल उसके सम्मान का नहीं, बल्कि उन सभी महिलाओं का है जो रोज़ कार्यस्थलों पर चुपचाप अपमान झेलती हैं।
क्या है पूरा मामला
करीब एक महीने पहले भोपाल की इस नामी कोचिंग संस्था में कार्यरत एक युवती ने थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि संस्थान के निदेशक और उनके दो सहयोगी उसे पिछले कई महीनों से शारीरिक रूप से छूने की कोशिश, आपत्तिजनक टिप्पणियाँ, और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा था।
पीड़िता का आरोप है कि एक दिन ऑफिस में देर तक रुकने पर एक आरोपी ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया। उसने विरोध किया, तो उसे धमकाया गया कि “अगर तूने बात बाहर निकाली तो करियर खत्म कर देंगे।” उसके मुताबिक, जब उसने शिकायत की बात अन्य सहकर्मियों से की, तो संस्था ने उसे ही दोषी ठहराने की कोशिश की और उसके खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाईं।
पुलिस का रवैया: बयान लिए, कार्रवाई नहीं
महिला ने कहा कि शिकायत के बाद उसने यह उम्मीद की थी कि जल्द कार्रवाई होगी, लेकिन पुलिस ने “पहले जांच करेंगे” कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। पिछले 30 दिनों में उससे चार बार थाने में बयान लिए गए, लेकिन एफआईआर नहीं हुई। थाने के अधिकारियों का कहना है कि “जांच निष्पक्ष रूप से जारी है।” लेकिन शहर के सामाजिक संगठनों का आरोप है कि “जांच के नाम पर देरी दरअसल टालमटोल है।”
महिला अधिकार कार्यकर्ता रश्मि पाटीदार कहती हैं —
“जब कोई महिला हिम्मत जुटाकर शिकायत दर्ज करती है और सिस्टम उसे टाल देता है, तो यह न्याय से खिलवाड़ है। कानून साफ कहता है कि ऐसी शिकायत पर तुरंत एफआईआर होनी चाहिए।”
कानूनी रूप से क्या होना चाहिए था
भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 354A, 509 और 506 के तहत महिलाओं के साथ छेड़छाड़, यौन टिप्पणी, या धमकी देना गंभीर अपराध है। कानून के अनुसार, ऐसी शिकायत पर पुलिस को बिना देरी के FIR दर्ज करनी चाहिए। बाद में जांच और गवाहों के बयान लिए जा सकते हैं, पर एफआईआर में देरी कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन मानी जाती है। वरिष्ठ अधिवक्ता अमित तिवारी का कहना है —
“कानून का उद्देश्य महिलाओं को डर से मुक्त करना है। अगर पुलिस ही कार्रवाई में देरी करेगी, तो यह कानून की भावना के विपरीत है।”
मानसिक तनाव और डर का माहौल
पीड़िता बताती है कि उसने कई बार खुद को टूटता महसूस किया। उसके शब्दों में —
“हर बार जब मैं थाने जाती हूं, मुझे लगता है मैं अकेली हूं। आरोपी अब भी आज़ाद घूम रहे हैं, और मैं अपने ही शहर में असुरक्षित महसूस कर रही हूं।”
वह अब कोचिंग में नहीं जाती, क्योंकि सहकर्मियों का व्यवहार बदल गया है। कुछ लोग उसे “समस्या पैदा करने वाली” कहने लगे हैं। इस स्थिति ने उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर गहरा असर डाला है।
काउंसलिंग विशेषज्ञ डॉ. कविता सक्सेना कहती हैं —
“ऐसे मामलों में पीड़िताएं दोहरी सजा झेलती हैं — एक अपराध की, और दूसरी समाज की चुप्पी की।”
सामाजिक संगठनों और छात्रों का विरोध
भोपाल के विभिन्न महिला संगठनों ने इस मामले को लेकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस मुख्यालय के सामने मोमबत्तियां जलाकर ‘इंसाफ दो, एफआईआर करो’ के नारे लगाए।
‘यूथ जस्टिस फोरम’ की अध्यक्ष नेहा खान ने कहा —
“जब कानून स्पष्ट है, तो एक महीने तक एफआईआर न होना पुलिस की नाकामी है। यह दिखाता है कि दबाव में जांच को कमजोर किया जा रहा है।”
सोशल मीडिया पर भी #JusticeForBhopalVictim और #TopRankersCase जैसे हैशटैग ट्रेंड कर चुके हैं।
कई छात्रों और आम नागरिकों ने पीड़िता का समर्थन करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
कोचिंग संस्थान की सफाई
कोचिंग के निदेशक हर्ष गगरानी ने सभी आरोपों को झूठा बताया है। उनका कहना है कि —
“यह हमारे संस्थान की छवि खराब करने की साजिश है। हम जांच में पूरी तरह सहयोग कर रहे हैं। सच्चाई सामने आने पर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।”
संस्थान के सोशल मीडिया पेज पर इस विवाद के बाद कमेंट सेक्शन बंद कर दिए गए हैं। छात्रों में डर और असहजता का माहौल है। एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर कहा —
“पहले यहां बहुत सकारात्मक माहौल था, पर अब सब डर में हैं। किसी को कुछ बोलने की हिम्मत नहीं।”
भोपाल में कार्यस्थल उत्पीड़न के बढ़ते मामले
भोपाल में यह घटना अकेली नहीं है। महिला आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल शहर में कार्यस्थल पर छेड़छाड़ के 78 मामले दर्ज हुए, जिनमें से केवल 12 मामलों में ही अंतिम कार्रवाई हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संख्या असल में इससे कहीं अधिक है, क्योंकि अधिकांश महिलाएं डर या सामाजिक दबाव में शिकायत दर्ज ही नहीं करातीं।
लोगों की राय और सवाल
शहर के नागरिकों का कहना है कि यह मामला पूरे सिस्टम की परीक्षा बन गया है।
लोगों के मन में कई सवाल हैं —
- आखिर एक महीने से एफआईआर क्यों नहीं हुई?
- क्या आरोपी प्रभावशाली हैं, इसलिए मामला दबाया जा रहा है?
- अगर राजधानी में ही महिलाएं असुरक्षित हैं, तो बाकी शहरों का क्या हाल होगा?
सामाजिक विश्लेषक प्रोफेसर राजीव मिश्रा कहते हैं —
“यह मामला भोपाल की प्रतिष्ठा से जुड़ा है। अगर यहां कानून का पालन नहीं होगा, तो लोगों का सिस्टम से भरोसा उठ जाएगा।”
निष्कर्ष: न्याय की राह अब भी लंबी
भोपाल की यह घटना हमें याद दिलाती है कि महिला सुरक्षा केवल कानून में नहीं, बल्कि कार्रवाई की गति में छिपी है।
एक शिक्षित, आत्मनिर्भर युवती जिसने अपनी आवाज उठाई, आज सिस्टम की चुप्पी की शिकार है।
न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर होती है। अगर पुलिस और प्रशासन जल्द कदम नहीं उठाते, तो यह मामला केवल एक महिला का नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदना की परीक्षा बन जाएगा।
