साइबर अपराधों की दुनिया अक्सर अंधेरे रहस्यों से भरी होती है, और कभी-कभी इन अपराधों की परतें उतारते-उतारते ऐसे चौंकाने वाले खुलासे सामने आते हैं जो समाज के भीतर छिपी खतरनाक सच्चाइयों का पर्दाफाश कर देते हैं। राजधानी भोपाल में हाल ही में सामने आया एक मामला इसी कड़ी का हिस्सा है, जिसने न सिर्फ स्थानीय लोगों को हिलाकर रख दिया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि साइबर अपराध अब केवल डिजिटल लेयर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके भीतर खतरनाक गैंग, दलालों की परतें और आपसी टकराव भी मौजूद हैं।

भोपाल में सायबर फ्रॉड से जुड़े एक गिरोह के भीतर विवाद इतना बढ़ गया कि बैंक खाते किराए पर देने वाले दो युवकों को न सिर्फ धमकाया गया बल्कि बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा गया। यह पूरा मामला जितना चौंकाने वाला है, उतना ही यह समाज और डिजिटल दुनिया के बीच पैदा होती नई तरह की आपराधिक अर्थव्यवस्था को भी उजागर करता है, जहां पैसे और लालच के फेर में युवा अपनी सुरक्षा और भविष्य दोनों को दांव पर लगा देते हैं।
घटना की शुरुआत विदिशा जिले से होती है, जहां कथित रूप से साइबर ठगी के लिए खाते उपलब्ध कराने वाले युवक रहते थे। कुछ समय पहले इन्हें सायबर फ्रॉड ऑपरेटरों द्वारा प्रति माह पाँच हजार रुपये के बदले अपने बैंक खाते उपयोग करने के लिए तैयार किया गया था। यह सौदा देखने में एक आसान अवसर की तरह लगा होगा, लेकिन इसके भीतर छिपे खतरे का अंदाज़ा शायद किसी को नहीं था।
गुरुवार की सुबह ठीक ग्यारह बजे भोपाल के मिसरोद क्षेत्र में स्थित शिवा व्हिस्परिंग वुड्स सोसायटी उस समय अचानक हलचल से भर उठी, जब एक युवक अर्धनग्न अवस्था में बाहर आकर मदद की गुहार लगाने लगा। उसकी आवाज में घबराहट भी थी और दर्द भी। वह बार-बार यही कह रहा था कि उसे पहले विदिशा में पीटा गया, इसके बाद एक लक्जरी कार में उठाकर भोपाल लाया गया और यहां एक कमरे में दोबारा उसकी पिटाई की गई। उसकी चीखें सुनकर कॉलोनी के लोग घरों से बाहर निकल आए। देखते ही देखते पूरे परिसर में अफरा-तफरी मच गई।
स्थानीय लोगों ने जब उससे पूछताछ शुरू की, तो उसने बताया कि साइबर ठगी से जुड़े कुछ लोग उसके खाते का उपयोग पैसों के ट्रांजेक्शन के लिए करते थे। इस बीच ख़बर मिली कि जिन आरोपियों पर पिटाई का आरोप है, वे भी उसी गिरोह से जुड़े हुए थे। इससे पहले कि कॉलोनी के लोग पुलिस को बुलाते या आरोपी को रोक पाते, वह व्यक्ति अपनी कार लेकर भागने की कोशिश करने लगा। लोगों ने कॉलोनी का गेट बंद कर उसे रोकने की कोशिश की, मगर आरोपी ने तेज रफ्तार में कार मारकर गेट तोड़ दिया और मौके से फरार हो गया।
इस बीच मिसरोद थाने को भी सूचना दे दी गई। पुलिस मौके पर पहुंची, मगर पीड़ितों ने किसी भी तरह की औपचारिक शिकायत दर्ज कराने से साफ मना कर दिया। उन्होंने इसे आपसी मामला बताते हुए पुलिस पर दबाव नहीं बनाया। ऐसे मामलों में अक्सर पीड़ित गिरोहों के डर या उनके साथ आर्थिक लेन-देन की वजह से खुलकर बात नहीं करते, और यहाँ भी ऐसा ही हुआ। हालांकि थाना पुलिस ने अपनी ओर से जो भी प्रारंभिक जानकारी जुटाई, उसे राज्य सायबर क्राइम सेल को भेज दिया गया ताकि आगे जांच की जा सके।
संपूर्ण घटनाक्रम की गहराई में जाने पर पता चलता है कि यह गैंग झांसी, ललितपुर, राजस्थान और विदिशा जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है। इस गिरोह के सदस्य भोले-भाले युवकों को आसान कमाई का लालच देकर उनके बैंक खाते अपने नियंत्रण में लेते थे। खातेधारकों की पासबुक, एटीएम कार्ड और संबंधित दस्तावेज गिरोह के पास रहते थे। इसके बाद ये बैंक खाते राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साइबर ठगों को उपलब्ध कराए जाते थे, जिनका उपयोग फर्जी कॉल, ऑनलाइन ठगी और धनशोधन जैसे कामों में किया जाता था।
पीड़ितों में से एक ने बताया कि साहिल नाम का व्यक्ति, जो झांसी का रहने वाला है, इस पूरी चेन का सक्रिय सदस्य है। साहिल और उसका साथी आकाश अन्य शहरों में जाकर बैंक खातों की तलाश करते थे और दलालों के जरिए इन खातों को किराए पर लेते थे। विदिशा में हरिओम नाम का व्यक्ति इस नेटवर्क को संभालता था। इन खातों में ठगी के पैसों का लेन-देन होता था, और बदले में खाताधारकों को मासिक भुगतान मिलता था।
यह भी सामने आया कि पीड़ितों के बैंक खातों में करीब एक लाख रुपये जमा थे, जिनके निकालने को लेकर गिरोह के भीतर तनाव पैदा हुआ। साहिल और उसके साथियों ने इसी रकम को लेकर ज़बरदस्ती इन युवकों को विदिशा से उठाया और मारपीट की। इसके बाद उन्हें भोपाल लाकर फिर से बंधक बनाकर पीटा गया। यह पूरा घटनाक्रम सायबर अपराध की दुनिया के उस काले हिस्से की ओर इशारा करता है जहाँ धोखाधड़ी के पीछे अपराधियों के बीच भी अविश्वास, धोखा और हिंसा शामिल होती है।
सोसायटी में जिस फ्लैट में यह घटना हुई, वह रीना पाटिल नामक महिला के नाम पर है। फ्लैट को पहले एक अधिवक्ता ने किराए पर लिया था, जिसने बाद में कुछ युवकों को यह फ्लैट दे दिया। सोसायटी के निवासियों को भी नहीं पता था कि वहां कौन रहता है और क्या गतिविधियाँ चल रही हैं। घटना के बाद फ्लैट मालिक और उनके परिवार को भी यह जानकर झटका लगा कि उनके घर का उपयोग अपराधी गतिविधियों के लिए हो रहा था।
मिसरोद थाना प्रभारी के अनुसार, मामला साफ तौर पर साइबर ठगी से जुड़े नेटवर्क का ही है। हालांकि पीड़ितों ने शिकायत दर्ज न कराने का निर्णय लिया है, जिससे कानूनी कार्रवाई अभी रुक गई है। लेकिन राज्य सायबर जांच एजेंसी अब इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने के प्रयास में जुटी है।
साइबर अपराध के बढ़ते मामलों में यह घटना एक चेतावनी है कि कैसे छोटी-छोटी लालच भरी डीलें बड़े खतरों में बदल जाती हैं। कुछ हजार रुपये के लिए बैंक खातों को किराए पर देने वाले लोग न सिर्फ कानूनन अपराध में साझेदार बन जाते हैं, बल्कि खुद भी खतरनाक जाल में फंस जाते हैं, जहाँ न पैसा सुरक्षित रहता है, न जान।
यह पूरा मामला समाज को यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि साइबर अपराधियों के लिए खाता उपलब्ध कराना सिर्फ एक मासूम सौदा नहीं, बल्कि एक बड़ी आपराधिक गतिविधि का हिस्सा है। यह न सिर्फ कानूनी रूप से गलत है, बल्कि इसके चलते जीवन भी ख़तरे में पड़ सकता है। भोपाल की इस घटना ने यह साफ कर दिया कि ऐसी गतिविधियों में शामिल होना किसी भी व्यक्ति को हिंसा और अपराध के अंधेरे घेरे में धकेल सकता है, जहां से निकलना आसान नहीं होता।
