भोपाल में डिजिटल अरेस्ट का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि आम जनता को भी चौका दिया है। यह मामला बुजुर्ग और सम्मानित रिटायर्ड अधिकारी के साथ साइबर ठगी का है, जिसमें ठगों ने तकनीक और मानसिक दबाव का ऐसा खेल खेला कि अधिकारी अपने ही पैसे ठगों के खातों में ट्रांसफर कर बैठे।

85 वर्षीय टीके नागसरकर, जो कि वर्ष 2001 में मिलिट्री इंजीनियर सर्विस से रिटायर हुए थे, भोपाल के बागमुगालिया क्षेत्र में रहते हैं। उनकी सेवा और अनुशासन की मिसाल देने वाले जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि साइबर ठग उनके भरोसे और सम्मान का इतना बड़ा फायदा उठाएंगे। यह मामला डिजिटल अरेस्ट की ऐसी तकनीकी और मानसिक चालों को उजागर करता है, जिससे अब आम नागरिकों के लिए जागरूकता बेहद जरूरी हो गई है।
फर्जी पुलिस अधिकारी की कॉल: धोखाधड़ी की शुरुआत
13 नवंबर की सुबह टीके नागसरकर के मोबाइल पर एक कॉल आई। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली पुलिस का अधिकारी विजय खन्ना बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि नागसरकर के कैनरा बैंक खाते में फर्जी हस्ताक्षर करके खाता खोला गया है और उसमें संदिग्ध लेनदेन हुआ है।
टीके नागसरकर ने आरोपों से इनकार किया। लेकिन ठगों ने उन्हें मानसिक दबाव में डालने के लिए डिजिटल अरेस्ट का जाल बिछाया। उन्होंने अधिकारी को यह विश्वास दिलाया कि यदि वे निर्दोष हैं तो यह सब सुप्रीम कोर्ट में साबित होगा। ठगों ने ऑनलाइन सुप्रीम कोर्ट का नकली मंच तैयार किया और अधिकारी को वहाँ पेश होने के लिए कहा।
फर्जी सुप्रीम कोर्ट और जज का खेल
अगले ही दिन 14 नवंबर को टीके नागसरकर को ऑनलाइन सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। ठगों ने इस मंच पर दोनों पक्षों के वकील भी पेश किए और दिनभर सुनवाई का नाटक किया। जज का रोल निभाने वाले ठगों ने पूरी सुनवाई की और अंत में जांच को ईडी को सौंपने का आदेश सुनाया।
अधिकारी को विश्वास था कि यह सब सरकारी प्रक्रिया है और उनके साथ न्याय हो रहा है। उन्होंने न केवल अपनी बेगुनाही साबित करने का प्रयास किया बल्कि ठगों के निर्देशानुसार अपनी जमा पूंजी भी ट्रांसफर कर दी। इस प्रक्रिया में कुल 36 लाख रुपये की ठगी हुई, जो दिल्ली और डिब्रूगढ़ के विभिन्न खातों में ट्रांसफर कराए गए।
ईडी जांच का दिखावा
ठगों ने दावा किया कि ईडी की जांच अधिकारी निशा पटेल मामले की देखरेख कर रही हैं। 15 नवंबर को पहले 20 लाख रुपये को दिल्ली की एक फर्नीचर फर्म के खाते में ट्रांसफर कराया गया। इसके बाद 19 नवंबर को 16 लाख रुपये और डिब्रूगढ़ के एक बैंक खाते में जमा करवा दिए। अधिकारी को यह विश्वास दिलाया गया कि पूरी राशि जांच के बाद लौटाई जाएगी।
नागसरकर ने जब राशि वापस नहीं पाई तो उन्हें धोखाधड़ी का एहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने साइबर ठगी की जांच शुरू की और मामले के सभी पहलुओं को उजागर किया।
साइबर ठगी का बढ़ता खतरा
यह मामला यह दिखाता है कि साइबर ठग अब तकनीकी दक्षता और मानसिक दबाव का मिश्रण करके बुजुर्ग और अनुभवी नागरिकों को भी निशाना बना रहे हैं। फर्जी पहचान, ऑनलाइन कोर्ट की नकल और ईडी जैसी सरकारी संस्थाओं का ढोंग बनाकर ठगी करना आम हो गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक गंभीर चेतावनी है कि डिजिटल दुनिया में सावधानी, सत्यापन और जागरूकता न केवल जरूरी बल्कि जीवन रक्षा का माध्यम बन चुकी है।
अधिकारियों और नागरिकों के लिए सीख
टीके नागसरकर का अनुभव यह सिखाता है कि किसी भी सरकारी कॉल या ईमेल पर तुरंत भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। सरकारी संस्थान किसी भी नागरिक से डिजिटल माध्यमों से जमा राशि ट्रांसफर कराने का निर्देश कभी नहीं देते। किसी भी ऐसी स्थिति में, अपने बैंक, पुलिस या साइबर सेल से व्यक्तिगत सत्यापन करना अत्यंत आवश्यक है।
इस घटना के बाद भोपाल साइबर क्राइम सेल ने अपने सतर्कता अभियान को और सख्त कर दिया है। नागरिकों को ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचने के लिए जागरूक करने और साइबर अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की योजना बनाई जा रही है।
भविष्य में रोकथाम के उपाय
विशेषज्ञों का सुझाव है कि डिजिटल अपराधों को रोकने के लिए तकनीकी प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान और वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष सहायता कार्यक्रम चलाए जाएं। बैंक और सरकारी संस्थान डिजिटल लेनदेन के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करें।
भले ही ठगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करके अपनी चाल चली, लेकिन पुलिस और साइबर सेल की सक्रियता से ऐसी घटनाओं की संख्या को कम किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भोपाल का यह मामला डिजिटल युग में साइबर ठगी की गंभीरता को उजागर करता है। फर्जी सुप्रीम कोर्ट, फर्जी जज और ईडी की जांच का ढोंग करके 85 वर्षीय रिटायर्ड अधिकारी की 36 लाख रुपये की ठगी, तकनीकी और मानसिक चालाकी का प्रमाण है।
यह घटना नागरिकों को जागरूक होने, डिजिटल सुरक्षा नियमों का पालन करने और किसी भी संदिग्ध कॉल या संदेश पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय सत्यापन करने की चेतावनी देती है।
