यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि उस खामोश खतरे की है जो हमारी आर्थिक व्यवस्था को भीतर से खोखला कर सकता है। पिपलानी इलाके में पुलिस ने एक ऐसे शातिर युवक को गिरफ्तार किया है, जिसने अपने छोटे से किराए के कमरे को ‘नकली नोटों की फैक्ट्री’ में बदल दिया था। यह कोई पेशेवर गैंग का हिस्सा नहीं था, न ही किसी बड़े नेटवर्क का मोहरा—बल्कि महज एक 21 वर्षीय लड़का, जो 10वीं में फेल हुआ, लेकिन प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में इतनी गहरी समझ रखता था कि महीनों तक 500-500 रुपये के नकली नोट बाजार में खपाता रहा, बिना किसी की नजर में आए।

यह मामला जितना चौंकाने वाला है, उससे कहीं ज्यादा यह सवाल उठाता है कि एक अकेला युवक किस तरह उन्नत प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल कर देश की मुद्रा प्रणाली को चुनौती दे सकता है।
अपराध की जड़ें: 10वीं फेल, लेकिन प्रिंटिंग में ‘खतरनाक महारथ’
विवेक यादव, उम्र 21, मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले का रहने वाला है। स्कूल की पढ़ाई में हमेशा कमजोर रहा, और अंततः 10वीं में फेल हो गया। लेकिन प्रिंटिंग मशीनों के प्रति उसका आकर्षण उसे मुंबई ले गया, जहां उसने 4–5 साल प्रिंटिंग प्रेस में काम किया।
इस दौरान उसने सिर्फ मशीन चलाना ही नहीं सीखा, बल्कि—
- पेपर क्वालिटी की पहचान,
- ब्लेड प्रेशर,
- हॉट स्टंपिंग,
- रंग मिश्रण,
- हाफटोन पैटर्न,
- RGB–CMYK सिंकिंग,
- और सिक्योरिटी लाइनें कॉपी करने जैसी बारीकियां समझ लीं।
उसने प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी पर विदेशी लेखकों की किताबें पढ़ीं, जिन्हें आमतौर पर प्रोफेशनल ग्राफिक डिजाइनर और मशीन ऑपरेटर पढ़ते हैं।
धीरे–धीरे उसके भीतर यह धारणा बनी कि वह बैंक नोट के करीब-करीब समान नकली नोट बना सकता है—और यहीं से अपराध की शुरुआत हुई।
भोपाल में ‘अंडरकवर फैक्ट्री’: कोरल लाइफ कॉलोनी में किराए का घर बना हब
करीब दो साल पहले विवेक भोपाल आया और कोरल लाइफ कॉलोनी, करोंद में एक छोटा सा किराए का कमरा लिया। बाहर से यह कमरा बिल्कुल सामान्य दिखता था—एक बिस्तर, एक टेबल, और कुछ सामान।
लेकिन भीतर—
- हाई क्वालिटी बाइवल पेपर,
- मल्टी-फंक्शन लेजर प्रिंटर,
- इंक रिफिल सेट,
- डाई कटिंग मशीन,
- हॉट स्टंपिंग फॉयल मशीन,
- पंचिंग कटर,
- लैमिनेशन यूनिट,
- और ढेर सारी गड्डियाँ नकली नोटों की
—यह सब एक मिनी प्रिंटिंग प्रेस जैसा माहौल तैयार कर देता था।
पुलिस जब अंदर घुसी, तो उन्हें ऐसा लगा जैसे वे किसी शातिर अपराध गैंग का अड्डा पकड़ रहे हों, जबकि यहां पूरा साम्राज्य सिर्फ एक व्यक्ति संभाल रहा था।
अपराध का मॉडल: कैसे बनता था नकली 500 का नोट?
नकली नोट छापना जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। लेकिन विवेक ने इसे एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया बना दिया था:
(1) पेपर चयन
असली नोट जैसा लगने वाला पेपर उसे ऑनलाइन सोर्स से, प्रिंटिंग सप्लाई शॉप्स से मिलता था।
(2) हॉट स्टंपिंग
सुरक्षा धागे जैसी चमकीली रेखा बनाने के लिए हॉट स्टंपिंग फॉयल का इस्तेमाल।
(3) प्रिंटिंग
लेजर प्रिंटर पर CMYK लेयरिंग करते हुए वह कई चरणों में नोट तैयार करता था।
(4) एम्बॉसिंग
असली नोट जैसी ऊभरी हुई इंक के लिए हल्की एम्बॉसिंग तकनीक।
(5) ट्रिमिंग और कटिंग
डाई-पंच मशीन से किनारों को परफेक्ट फिनिश।
(6) पुराना दिखाने की तकनीक
सबसे खतरनाक तरीका—
वह नोट को थोड़ा पुराना दिखा देता था, ताकि दुकानदार को लगे यह नोट पहले से चलन में है।
यही कारण है कि महीनों तक दुकानदार, सब्जी विक्रेता और छोटे कारोबारियों को नकली नोट का पता नहीं चला।
पुलिस को कैसे मिली भनक?
एक स्थानीय दुकान पर नकली नोट का पता चलते ही पुलिस हरकत में आई। थाना पिपलानी की टीम ने इस नोट का माइक्रो-एनालिसिस किया और पाया कि—
- पेपर असली नहीं, लेकिन करीब है
- सुरक्षा लाइन असली की नकल है
- इंक का पैटर्न मिल रहा है
- और सबसे महत्वपूर्ण—
कटिंग मशीन का सिग्नेचर पैटर्न बार-बार दोहराया गया है, यानी यह मशीन-आधारित प्रिंटिंग है।
इसके बाद पुलिस ने अलग-अलग दुकानों से इसी तरह के 8–10 नोट पकड़े। सीसीटीवी फुटेज में एक युवक बार-बार छोटे खर्च करते दिखा, जिससे शक और गहरा गया।
छापामारी: पुलिस जब अंदर पहुँची तो दंग रह गई
पुलिस टीम ने कोरल कॉलोनी में छापा मारा। अंदर दृश्य ऐसा था—
- बेड के नीचे 500–500 के नोटों की गड्डियाँ
- कंप्यूटर स्क्रीन पर नोट का लेआउट
- प्रिंटर में आधा छपा हुआ नोट
- बाइवल पेपर के ढेर
- कटिंग ब्लेड में नोट के टुकड़े
- डाई पर 500 का साइज मार्क
कुल मिलाकर ढाई लाख रुपये के नकली नोट मौके पर जब्त किए गए।
यह सिर्फ तैयार नोट थे—बनने की प्रक्रिया में मौजूद अधूरे नोट मिलाकर वास्तविक नुकसान कहीं ज्यादा हो सकता था।
पुलिस का बयान: “आज तक इतने एडवांस तरीके का सिंगल-पर्सन ऑपरेशन नहीं देखा”
जांच अधिकारियों ने कहा—
- “यह युवक पेशेवर गिरोह के बराबर खतरनाक था।”
- “अगर पकड़ा नहीं जाता तो यह नेटवर्क बन सकता था।”
- “इसकी तकनीक देखकर कोई भी भ्रमित हो सकता था।”
सामाजिक और आर्थिक खतरा
नकली नोटों का असर सिर्फ दुकान तक सीमित नहीं रहता। इससे—
- RBI की मुद्रा व्यवस्था पर असर
- दुकानदार को नुकसान
- महंगाई पर अप्रत्यक्ष प्रभाव
- अपराधियों को नकली धन का फायदा
- समाज में आर्थिक अविश्वास बढ़ता है
यह घटना बताती है कि टेक्नोलॉजी जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से अपराध भी आधुनिक हो रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय: भारत में नकली करेंसी के नए खतरे
विशेषज्ञों का कहना है—
- हाई-रिज़ॉल्यूशन प्रिंटर अपराध को आसान बना रहे
- पेपर ब्लेंड कॉपी करने वाले अंतरराष्ट्रीय सप्लायर बढ़ रहे
- छोटे अपराधी भी बड़े खतरे बन सकते हैं
क्या यह कोई बड़ा नेटवर्क था?
पुलिस अब यह पता कर रही है—
- क्या यह किसी गैंग के संपर्क में था?
- क्या नोट दूसरे शहरों में भी खपाए गए?
- क्या उसके पास ऑनलाइन सप्लाई चेन है?
जांच अभी जारी है।
गिरफ्तार युवक की भविष्य की योजना
पूछताछ में युवक ने स्वीकार किया—
“मैं बड़े पैमाने पर काम करना चाहता था… ताकि मेरा पूरा खर्च आसानी से निकल सके।”
अगर यह पकड़ा नहीं जाता, तो यह नकली करेंसी का मिनी-माफिया बन सकता था।
निष्कर्ष
यह कहानी एक चेतावनी है— कि टेक्नोलॉजी के इस युग में अपराध अब किसी गैंग के भरोसे नहीं, बल्कि एक अकेले दिमाग के दम पर भी फल-फूल सकता है। पुलिस की तत्परता ने भोपाल को एक बड़े आर्थिक खतरे से बचा लिया।
