भोपाल में हाल ही में जब्त किए गए 1733 किलो गांजा के मामले ने मध्यप्रदेश पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों को चौकन्ना कर दिया है।
यह मामला केवल मादक पदार्थ की बरामदगी तक सीमित नहीं, बल्कि इसके पीछे फैले नशे के अंतरराज्यीय नेटवर्क और संगठित तस्करी की जड़ों को उजागर कर रहा है।

इस कार्रवाई की कमान राजस्व खुफिया निदेशालय (Directorate of Revenue Intelligence – DRI) ने संभाली थी, जिसने बड़ी गोपनीयता और सटीक जानकारी के आधार पर इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। अब यह मामला अदालत में पहुँच चुका है और सूचना अधिकारी विजय कुमार के बयान दर्ज कर लिए गए हैं। अदालत में 64 सैंपलों का परीक्षण किया गया है, जिससे यह साबित हुआ कि जब्त माल गांजा ही है।
ऑपरेशन की शुरुआत: एक गुप्त सूचना से खुला बड़ा रैकेट
मामले की शुरुआत उस वक्त हुई जब डीआरआई को विश्वसनीय स्रोतों से सूचना मिली कि आंध्रप्रदेश से एक ट्रक में गांजा की बड़ी खेप भोपाल की ओर भेजी जा रही है। सूचना की पुष्टि के बाद डीआरआई की एक टीम ने भोपाल में एक सटीक लोकेशन पर नजर रखनी शुरू की। कई दिनों की निगरानी और तकनीकी सर्विलांस के बाद टीम को 1733 किलो गांजा बरामद करने में सफलता मिली।
यह कार्रवाई रात के समय हुई, जब ट्रक शहर के बाहरी इलाके में प्रवेश कर रहा था। जांच में पाया गया कि ट्रक को फल-सब्ज़ी की खेप के रूप में छिपाया गया था, ताकि जांच एजेंसियों को भ्रमित किया जा सके।
1733 किलो गांजा: 3 करोड़ से अधिक की खेप
जब्ती के बाद अधिकारियों ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस गांजा की कीमत करीब 3 करोड़ रुपए आंकी गई है। इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ का एक ही बार में पकड़ा जाना मध्यप्रदेश के इतिहास की बड़ी जब्तियों में से एक है।
“यह केवल गांजा तस्करी का मामला नहीं, बल्कि संगठित अपराध का हिस्सा है,”
— डीआरआई के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा।
उन्होंने बताया कि इस खेप का इस्तेमाल न केवल स्थानीय बाजार बल्कि उत्तर भारत के राज्यों में सप्लाई के लिए किया जाना था।
अदालती कार्यवाही और सूचना अधिकारी का बयान
अब यह मामला न्यायालय में पहुँच चुका है। शनिवार को सुनवाई के दौरान डीआरआई के सूचना अधिकारी विजय कुमार ने अदालत में अपना बयान दर्ज कराया। उनसे संबंधित दस्तावेज, जब्ती की प्रक्रिया और सैंपलों की जांच से जुड़ी रिपोर्टें पेश की गईं।
कोर्ट में कुल 64 सैंपलों का परीक्षण किया गया, जो सभी गांजा ही पाए गए। विजय कुमार ने बताया कि जब्त माल को डीआरआई की उपस्थिति में सील किया गया था, और हर सैंपल का रिकॉर्ड रखा गया।
“जांच में किसी प्रकार की लापरवाही की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई,”
— उन्होंने अदालत में कहा।
जांच के नए एंगल: सप्लायर से लेकर नेटवर्क तक
जांच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इतने बड़े पैमाने पर मादक पदार्थ की आपूर्ति के पीछे मुख्य सप्लायर कौन था। सूत्रों के अनुसार, यह नेटवर्क ओडिशा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सक्रिय है। तस्कर ट्रकों में कानूनी सामान के साथ गांजा की खेप छिपाकर भेजते थे।
डीआरआई और पुलिस अब फोन रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजेक्शन, ट्रक GPS डेटा और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) का विश्लेषण कर रही हैं। संभावना जताई जा रही है कि इसके तार नेपाल और बांग्लादेश सीमा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से भी जुड़ सकते हैं।
मुख्य आरोपी और गिरफ्तारियां
अब तक इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है —
- ट्रक ड्राइवर
- क्लीनर
- और स्थानीय रिसीवर, जो खेप को आगे ले जाने वाला था।
तीनों से पूछताछ में कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं। ड्राइवर ने बताया कि उसे यह नहीं पता था कि ट्रक में नशे का सामान है, जबकि अन्य आरोपियों ने आंशिक रूप से अपराध कबूल किया है।
डीआरआई का बयान: “यह नेटवर्क बड़ा है, और कई शहरों में फैला है”
डीआरआई के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह ऑपरेशन केवल एक शुरुआत है। अब एजेंसी इस नेटवर्क से जुड़े अन्य ठिकानों पर छापेमारी की तैयारी कर रही है। जांचकर्ताओं के मुताबिक, भोपाल इस नेटवर्क का ट्रांजिट हब बन चुका था, जहां से गांजा उत्तर भारत के शहरों तक पहुँचाया जाता था।
सैंपलों की वैज्ञानिक जांच
1733 किलो गांजा के 64 सैंपलों को फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) भेजा गया। वहाँ पर वैज्ञानिक परीक्षणों में पुष्टि हुई कि सभी सैंपल्स गांजा (Cannabis) के ही हैं। FSL रिपोर्ट अदालत में पेश की जा चुकी है।
कोर्ट की टिप्पणी और आगे की सुनवाई
अदालत ने डीआरआई की पेशी और साक्ष्यों को देखने के बाद कहा कि
“यह मामला गंभीर अपराध श्रेणी में आता है और इसमें संगठित नेटवर्क की गहराई से जांच जरूरी है।”
अब अगली सुनवाई में फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य अभियोजन गवाहों को बुलाया जाएगा। अदालत ने पुलिस और डीआरआई को निर्देश दिया कि केस की प्रगति रिपोर्ट नियमित रूप से प्रस्तुत की जाए।
नशे का व्यापार: समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
गांजा और अन्य मादक पदार्थों की बढ़ती तस्करी भारत के लिए एक सामाजिक और आर्थिक संकट बनती जा रही है। ऐसे मामलों से युवा वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में भारत में नशीले पदार्थों की जब्ती के मामलों में 35% वृद्धि हुई है भोपाल जैसे शांत शहरों में इतने बड़े स्तर पर गांजा पकड़ा जाना दिखाता है कि नशे का नेटवर्क अब आम शहरों तक फैल चुका है।
सरकार और समाज की भूमिका
मध्यप्रदेश सरकार और केंद्रीय एजेंसियाँ अब इस मामले को नजर उदाहरण (example case) की तरह देख रही हैं। सरकार का फोकस केवल तस्करों पर नहीं, बल्कि नशे के खतरों से समाज को जागरूक करने पर भी है।
‘नशा मुक्त भारत अभियान’ के तहत कई स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। विशेष रूप से युवाओं को बताया जा रहा है कि गांजा या ड्रग्स की लत केवल अपराध नहीं, बल्कि आत्मविनाश की शुरुआत है।
आगे की दिशा: डीआरआई और पुलिस की संयुक्त रणनीति
डीआरआई अब राज्य पुलिस और नारकोटिक्स ब्यूरो (NCB) के साथ मिलकर एक संयुक्त टास्क फोर्स बना रही है। इसमें डेटा एनालिस्ट, फॉरेंसिक एक्सपर्ट और साइबर टीम भी शामिल होगी। उद्देश्य है — नशे की सप्लाई चेन को जड़ से खत्म करना।
निष्कर्ष: एक खेप, अनेक सवाल
भोपाल में पकड़े गए 1733 किलो गांजा का मामला केवल एक बड़ी कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत में बढ़ते नशे के काले कारोबार का आईना है। इससे साफ है कि नशे के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पुलिस की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जब तक हम नशे के खिलाफ सामूहिक आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक इस तरह की घटनाएँ होती रहेंगी। अब समय है कि भारत “नशा मुक्त राष्ट्र” की दिशा में ठोस कदम उठाए।
