भोपाल की गलियों में साल 2025 के शुरुआती दिनों में एक खबर तेज़ी से फैलने लगी थी। बजरिया क्षेत्र में रहने वाली एक होनहार लड़की अचानक घर से गायब हो गई थी। परिवार परेशान था, रिश्तेदारों में बेचैनी थी और मोहल्ले में कानाफूसी चल रही थी कि आखिर वह मेधावी लड़की कहां चली गई। लेकिन यह कहानी किसी आम गुमशुदगी की नहीं थी। यह एक ऐसी जिद की कहानी थी जिसके सामने सामाजिक दबाव, पारिवारिक मान्यताएं और पुरानी सोच सब हल्के पड़ गए।

यह कहानी है साक्षी की, जो 12वीं कक्षा में 92 प्रतिशत अंक लाकर स्कूल की टॉपर बनी थी और जिसका एक ही सपना था–एक दिन देश की प्रशासनिक सेवा में शामिल होकर IAS अधिकारी बनना। लेकिन उसके अपने ही घर की दीवारें उसके सपनों से बड़ी साबित हो रही थीं। उसके पिता और भाई की सोच स्पष्ट थी कि लड़की को एक सीमा से ज्यादा पढ़ाना ठीक नहीं, और उसकी जिंदगी की मंज़िल शादी ही है।
साक्षी ने अपने सपने को बचाने के लिए जितना संघर्ष घर की चारदीवारी में किया, शायद किसी ने नहीं देखा। कई महीनों तक वह समझाती रही, अनुरोध करती रही, कोचिंग और आगे की पढ़ाई की बातें रखती रही, पर हर बार उसे ठंडा जवाब मिलता। पिता का कहना था कि उसे ज्यादा पढ़ाने से क्या हासिल होगा, जबकि भाई को लगता था कि लड़की का सर्वोपरि भविष्य शादी है।
लेकिन सपनों को कोई कैद नहीं कर सकता। और यही वह घड़ी थी जब साक्षी ने अपने जीवन का सबसे साहसिक निर्णय लिया। जनवरी 2025 की एक सुबह वह घर से निकली और हमेशा की तरह स्कूल या कोचिंग नहीं गई। वह वापस नहीं लौटी। उसके कमरे में बस एक सादा सा नोट पड़ा था, जिसमें लिखा था–
“पापा, मैं 2030 में IAS बनकर ही घर लौटूंगी। मुझे माफ कर देना।”
यह एक संदेश से अधिक एक घोषणा थी, एक वादा था और एक लड़की की हिम्मत का प्रमाण था।
गायब बेटी की तलाश में परेशान परिवार और कोर्ट की दहलीज तक पहुंची कहानी
साक्षी के जाने के बाद परिवार ने उसे आसपास खोजा, रिश्तेदारों के घरों में पूछा, उसके सहेलियों को फोन किए। लेकिन साक्षी कहीं नहीं मिली। अंत में पिता ने हिम्मत करके हाई कोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की। उनका दावा था कि बेटी को कोई बहला-फुसलाकर ले गया है।
हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया। जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया की बेंच ने पुलिस को सख्त निर्देश जारी किए कि लड़की का पता लगाया जाए। इस खोजबीन के दौरान पुलिस को साक्षी के कमरे में छोड़ा हुआ नोट मिला और मामला एकदम नई दिशा में चला गया।
पुलिस ने उसकी आखिरी मोबाइल लोकेशन खंगाली, उसके कोचिंग सेंटरों में पूछताछ की, लाइब्रेरी के रिकॉर्ड देखे, जिन-जिन जगहों पर वह पढ़ाई के बहाने जाती थी, सबकी जांच की गई। अंततः यह पता चला कि उसने इंदौर में अपना आधार अपडेट कराया था। यह एक बड़ा सुराग था, जो दिखाता था कि साक्षी कहीं गायब नहीं, बल्कि अपने जीवन को नए सिरे से गढ़ने में लगी है।
इंदौर में पुलिस ने एक छोटे से PG में उसे ढूंढ निकाला, जहां वह अपनी तैयारी कर रही थी। उसे कोर्ट में पेश किया गया ताकि उसकी इच्छा जानी जा सके।
कोर्ट रूम का भावुक पल, जिसने सारे सवालों को खामोश कर दिया
जब साक्षी को कोर्ट के सामने लाया गया, तो पूरा माहौल शांत हो गया। सभी की नजरें उसी पर थीं। परिवार के लोग उम्मीद कर रहे थे कि वह वापस आने की बात करेगी। जज चाहते थे कि वह अपनी इच्छा स्पष्ट करे, और पुलिस चाहती थी कि सच सामने आ जाए।
जस्टिस अहलूवालिया ने उससे पूछा कि वह घर क्यों नहीं जाना चाहती। कुछ पल की चुप्पी के बाद साक्षी ने जो कहा, वह न सिर्फ कोर्ट रूम बल्कि पूरे देश के दिलों में उतर गया।
उसने धीमी मगर स्थिर आवाज़ में कहा–
“मैंने 92 प्रतिशत अंक लाकर स्कूल टॉप किया था, लेकिन घर में मेरी पहचान सिर्फ बेटी की थी, जो जल्द शादी कर दी जाएगी। मैं पढ़ना चाहती हूं, अपना भविष्य बनाना चाहती हूं। घर में मेरे सपनों की कोई जगह नहीं थी। अगर मैं उस माहौल से नहीं निकलती, तो शायद जिंदगी भर पछताती। मैं किसी का बोझ नहीं बनना चाहती, न अपने होने वाले पति का, न अपने परिवार का। मैं सिर्फ IAS बनना चाहती हूं।”
उसकी इस एक बात ने सबकुछ फिर से परिभाषित कर दिया। उसके शब्दों में मजबूरी नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय था; शिकायत नहीं, बल्कि संकल्प था।
हाई कोर्ट का वह फैसला जिसने इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया
लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया, जो लड़कियों की शिक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार की दिशा में सबसे साहसिक आदेशों में से एक माना जा रहा है।
कोर्ट ने कहा कि साक्षी अब 18 साल की बालिग है और संविधान का अनुच्छेद 21 उसे अपनी पसंद की जिंदगी चुनने का पूरा अधिकार देता है। इसलिए उसे किसी भी स्थिति में जबरन घर नहीं भेजा जा सकता।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस उसकी सहायता करेगी, उसकी लोकेशन और पहचान गोपनीय रखी जाएगी।
इतना ही नहीं, कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह साक्षी को सरकारी योजना के माध्यम से मुफ्त कोचिंग, हॉस्टल और अन्य सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराए ताकि उसकी पढ़ाई में कोई रुकावट न आए।
अदालत ने पिता को समझाते हुए यह टिप्पणी भी की–
“लड़कियों को केवल शादी के लिए नहीं जन्म दिया जाता। अगर साक्षी जैसी लड़कियां आगे बढ़ेंगी, तो देश का भविष्य मजबूत होगा।”
यह फैसला सिर्फ साक्षी के लिए नहीं था। यह उन हजारों लड़कियों के लिए भी उम्मीद की किरण था जिनके सपनों को समाज की सीमाएं रोक लेती हैं।
साक्षी का नया जीवन, नए शहर में नई उड़ान
अब साक्षी इंदौर में सरकारी सुरक्षा के साथ अपने कोचिंग सेंटर में नियमित रूप से पढ़ाई कर रही है। उसके पास बेहतर माहौल है, समर्थन है और वह मन लगाकर अपना पूरा समय UPSC की तैयारी में लगा रही है। कोर्ट में उसने धन्यवाद देते हुए साफ कहा–
“मैं 2030 में IAS बनकर लौटूंगी। यह वादा है, सपना नहीं।”
उसकी यह बात सुनकर कोर्ट में बैठे कई लोग भावुक हो गए। आज साक्षी सिर्फ एक लड़की का नाम नहीं है, बल्कि एक प्रतीक बन चुकी है–साहस का, संघर्ष का और सपनों के अधिकार का।
देशभर में छिड़ी बहस, बदलती सोच और नई पीढ़ी की आवाज
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस शुरू हो गई। महिला आयोग ने इसे ऐतिहासिक बताया और कहा कि यह फैसला भविष्य में लाखों लड़कियों के सपनों की रक्षा करेगा।
कई संगठनों ने साक्षी की पढ़ाई के लिए आर्थिक सहयोग की पेशकश की। सोशल मीडिया पर उसकी कहानी वायरल हो गई और वह प्रेरणा का स्रोत बन गई।
कई पिता और भाई इस फैसले पर चर्चा कर रहे हैं कि लड़कियों की शिक्षा क्यों जरूरी है और समाज में बराबरी का हक उन्हें क्यों देना चाहिए।
साक्षी ने साबित किया कि हिम्मत हो तो हर बाधा रास्ता दे देती है। उसकी कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन यह वास्तविकता का सबसे साहसिक चित्र है।
2030 की ओर बढ़ता एक वादा
यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। यह तो बस शुरुआत है।
साक्षी अपनी तैयारी में दिन-रात लगी है और वह मानती है कि उसका संघर्ष केवल उसका नहीं, बल्कि उन सभी लड़कियों का है जो अपने भविष्य के लिए आवाज उठाना चाहती हैं।
देश 2030 का इंतजार करेगा, जब शायद वही लड़की, जिसने एक नोट में अपना सपना लिखा था, IAS अधिकारी बनकर अपने शहर लौटेगी। उसकी जीत सिर्फ उसकी नहीं होगी, बल्कि उन सपनों की होगी जिन्हें समाज अक्सर कमजोर मान लेता है।
