भोपाल में उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल के निज सहायक सुधीर कुमार दुबे से मोबाइल झपटने की घटना ने न केवल पुलिस प्रशासन को हिला दिया, बल्कि राजधानी की कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। जिस इलाके में यह वारदात हुई—वह शहर के सबसे व्यस्त और सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्रों में शामिल है। इसके बावजूद अपराधियों ने इतनी सहजता से वारदात को अंजाम दिया और महज कुछ ही मिनटों में मोबाइल को दूसरे राज्य में बेच भी दिया। घटना ने पुलिस की सतर्कता, निगरानी व्यवस्था और अपराधियों की बढ़ती हिम्मत पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

मंगलवार की रात: जब घटनाक्रम ने अचानक मोड़ लिया
वारदात मंगलवार रात की है, जब सुधीर दुबे अपने तुलसी नगर स्थित घर से रोज की तरह टहलने के लिए निकले थे। मौसम सामान्य था, सड़कें अपेक्षाकृत शांत थीं और रात में भी क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पहले की तरह सक्रिय दिखाई दे रही थी। अचानक जेपी अस्पताल के सामने एक तेज रफ्तार बाइक उनके पास आकर रुकी। इससे पहले कि दुबे कुछ समझ पाते, बाइक पर बैठे नाबालिग युवकों में से एक ने उनके हाथ से मोबाइल छीन लिया और दोनों कुछ ही सेकंड में अंधेरे में गायब हो गए।
मोबाइल कोई साधारण फोन नहीं था—यह उपमुख्यमंत्री के पीए का आधिकारिक मोबाइल था, जिसमें कई महत्वपूर्ण संपर्क और संवेदनशील जानकारी मौजूद थी। इसी कारण घटना को तुरंत उच्च स्तर पर गंभीरता से लिया गया और कुछ ही मिनटों में पुलिस सक्रिय हो गई।
तत्काल कार्रवाई: घेराबंदी के बावजूद अपराधी बच निकले
टीटी नगर पुलिस ने तत्काल घेराबंदी की, आसपास के इलाकों में नाकाबंदी की गई और सायरनों की आवाज देर रात तक सुनाई देती रही। लेकिन अपराधी इतनी तेजी से फरार हुए कि पुलिस उन्हें ढूंढ नहीं पाई। हालांकि पुलिस को जल्द ही एक बड़ा सुराग मिला—वारदात का एक सीसीटीवी फुटेज। इस फुटेज में बाइक का मॉडल, नंबर प्लेट के अंश और आरोपियों की शारीरिक बनावट स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी।
थाना प्रभारी गौरव सिंह ने बताया कि फुटेज के आधार पर पुलिस टीम ने तकनीकी विश्लेषण किया और जल्द ही संदिग्धों की पहचान के करीब पहुंच गई। फुटेज से मोटरसाइकिल के रूट, इलाके में उनकी गतिविधियों और वारदात के बाद किस दिशा में गए—इन सभी पहलुओं को जोड़कर पुलिस ने मामले की दिशा तय की।
पहचान में आया नया नाम: ईरानी गैंग
जांच के दौरान सबसे अहम खुलासा यह था कि वारदात में शामिल दोनों आरोपी ईरानी गैंग से जुड़े हैं। ईरानी गैंग लंबे समय से देश के कई राज्यों में सक्रिय है और चोरी, झपटमारी, ठगी और मोबाइल लूट जैसे अपराधों में उनका नाम बार-बार सामने आता रहा है। ये गैंग अपनी मोबाइल चोरी के नेटवर्क के लिए बदनाम है जहां चोरी होते ही फोन को तत्काल दूसरे राज्य में भेज दिया जाता है।
भोपाल पुलिस ने पाया कि शहर में ईरानी गैंग का यह नया नेटवर्क हाल ही में सक्रिय हुआ है। दोनों नाबालिग उसी नेटवर्क का हिस्सा हैं और कई दिनों से शहर में घूमकर निशानों की तलाश कर रहे थे।
अपराधियों की रणनीति: वारदात के तुरंत बाद लखनऊ में बेच दिया मोबाइल
पूछताछ के दौरान दोनों नाबालिगों ने स्वीकार किया कि मोबाइल झपटने के कुछ ही मिनटों बाद उन्होंने उसे अपने गिरोह से जुड़े लखनऊ के एक बदमाश को बेच दिया। यह काम ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के जरिए हुआ और फोन ट्रेन में भेज दिया गया। यह तरीका इसलिए अपनाया जाता है ताकि ट्रैकिंग बेहद कठिन हो जाए और फोन जल्दी से पुलिस की पहुंच से दूर निकल जाए।
यह एक बेहद चिंताजनक पहलू था क्योंकि ऐसी रणनीति से यह स्पष्ट हो गया कि अपराधी बेहद संगठित तरीके से, योजना बनाकर अपराध को अंजाम देते हैं।
हनुमानगंज से पकड़े गए दोनों आरोपी
तकनीकी विश्लेषण, मोबाइल लोकेशन और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस ने दोनों नाबालिगों को हनुमानगंज क्षेत्र से हिरासत में ले लिया। पूछताछ के दौरान उन्होंने कई खुलासे किए। पुलिस को उनके पास से 10 से अधिक चोरी और झपटमारी के मोबाइल मिले, जो पिछले कुछ सप्ताहों में किए गए अपराधों से जुड़े बताए जा रहे हैं।
इन मोबाइलों में से कुछ की शिकायतें पुलिस के पास दर्ज थीं, जबकि कुछ पीड़ितों ने शिकायत भी नहीं की थी।
लखनऊ से बरामद हुआ फोन: ट्रेन पार्सल के जरिए वापस भेजा गया
जब पता चला कि फोन लखनऊ में बेचा गया है, तो पुलिस ने वहां संपर्क किया और फोन बरामद करवाया। लखनऊ पुलिस ने फोन को सुरक्षित पैकिंग में ट्रेन पार्सल के जरिए भोपाल भेजा। यह एक दिलचस्प पहलू है—कि जिस तेजी से अपराधी फोन को बाहर भेजते हैं, उससे पुलिस की पुनः बरामदगी की पूरी प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
परंतु इस बार तकनीकी सहायता और समय रहते की गई कार्रवाई के चलते फोन सुरक्षित मिल गया।
ईरानी गैंग की कार्यशैली: अपराध का गहरा नेटवर्क
ईरानी गैंग की कार्यप्रणाली इस प्रकार होती है—
- शहर में कुछ दिनों तक घूमकर संभावित शिकार तलाशना
- महंगे स्मार्टफोन, अधिकारियों के फोन या प्रीमियम ब्रांड वाले मॉडल को निशाना बनाना
- फोन झपटने के 15–30 मिनट के भीतर दूसरे राज्य में बेच देना
- फोन पैक करके ट्रेन, बस या कुरियर से बाहर भेज देना
- पुलिस ट्रैकिंग को छकाने के लिए कई बार फोन के पार्ट्स भी अलग कर दिए जाते हैं
पुलिस सूत्रों का कहना है कि यह गैंग मध्य भारत में फिर से सक्रिय होने लगा है और भोपाल में पकड़े गए नाबालिग केवल छोटे खिलाड़ी हैं।
पुलिस की सतर्कता और शहर की सुरक्षा पर उठे सवाल
इस घटना के बाद यह सवाल उठना लाजमी है कि राजधानी जैसे शहर में, जहां वीआईपी सुरक्षा हमेशा कड़ी रहती है, वहां इस तरह की वारदात कैसे हो जाती है?
क्या गश्त कम हो गई है?
क्या अपराधी ट्रैकिंग सिस्टम कमजोर है?
या अपराधी अधिक चालाक और हाई-टेक हो गए हैं?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधियों के तरीके बदले हैं, वे अब मोबाइल ट्रैकिंग, पुलिस रूटीन और सीसीटीवी के ब्लाइंड स्पॉट को अच्छे से जानते हैं। ऐसे में पुलिस को भी अपनी रणनीति को लगातार अपडेट करने की जरूरत है।
