लोकतंत्र में मताधिकार को नागरिक की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है। यही पहचान किसी व्यक्ति को यह एहसास दिलाती है कि वह इस देश का हिस्सा है, उसकी आवाज मायने रखती है और शासन व्यवस्था में उसकी भी भागीदारी है। लेकिन जब अचानक किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से गायब हो जाए, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं रह जाती, बल्कि उसके आत्मसम्मान और नागरिक अधिकारों पर सीधा प्रहार बन जाती है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है, जहां हजारों लोग अपने नाम मतदाता सूची से गायब होने के बाद दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

भोपाल में हाल ही में हुए नो-मैपिंग मामलों ने प्रशासन और आम जनता के बीच एक गहरी खाई को उजागर कर दिया है। पहले चरण में बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर सर्वे करते रहे। लोगों से दस्तावेज मांगे गए, पहचान की पुष्टि की गई और यह भरोसा दिलाया गया कि सब कुछ सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन जब मतदाता सूची सामने आई, तो हजारों लोगों के नाम उसमें नहीं थे। यहीं से शुरू हुई एक नई परेशानी, जिसने आम नागरिकों की नींद उड़ा दी।
नाम छूटने के बाद लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि अब वे क्या करें। वोटर आईडी, आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य सरकारी दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें यह साबित करना पड़ रहा है कि वे भारतीय नागरिक हैं और उनका वोट देने का अधिकार बरकरार रहना चाहिए। इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भोपाल प्रशासन ने नो-मैपिंग मामलों की सुनवाई के लिए 85 कोर्ट गठित किए हैं। शहर के हर वार्ड कार्यालय को सुनवाई केंद्र में तब्दील कर दिया गया है, जहां प्रतिदिन दो-दो घंटे नागरिकों की सुनवाई की जा रही है।
इन सुनवाई केंद्रों का दृश्य किसी अदालत से कम नहीं है। सुबह से ही लोग अपने हाथों में दस्तावेजों की फाइलें लेकर पहुंच जाते हैं। कई बुजुर्ग, महिलाएं और युवा कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते नजर आते हैं। हर चेहरे पर चिंता साफ झलकती है। कोई पूछता है कि उसका नाम क्यों काटा गया, तो कोई यह जानना चाहता है कि उसे दोबारा सूची में शामिल होने में कितना समय लगेगा। अफसरों के सामने लोग बार-बार यही कहते सुनाई देते हैं कि वे भी भारतीय हैं और उन्हें अपने अधिकार से वंचित न किया जाए।
प्रशासन की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है और किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। अधिकारियों का कहना है कि जिन मामलों में मैपिंग नहीं हो पाई या किसी कारणवश नाम छूट गया है, उनकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जा रही है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कुछ अलग ही तस्वीर पेश करती है। कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें बार-बार वार्ड कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। कभी कोई दस्तावेज कम बताया जाता है, तो कभी सिस्टम में तकनीकी खामी का हवाला दिया जाता है।
भोपाल के कई इलाकों से आए लोगों का कहना है कि बीएलओ उनके घर आए थे, सभी कागजात देखे गए थे और कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी। इसके बावजूद उनका नाम सूची से गायब हो गया। इससे लोगों में असमंजस और गुस्सा दोनों है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जब सारी प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, तो फिर यह स्थिति क्यों पैदा हुई। कई लोगों को डर सता रहा है कि कहीं उनका नाम स्थायी रूप से ही न हटा दिया जाए।
इन सुनवाई केंद्रों पर भावनात्मक दृश्य भी देखने को मिल रहे हैं। बुजुर्ग नागरिक, जिन्होंने दशकों से लगातार मतदान किया है, आज अपनी पहचान साबित करने के लिए लाइन में खड़े हैं। कुछ लोग यह कहते हुए भावुक हो जाते हैं कि उन्होंने हर चुनाव में वोट दिया, फिर आज उन्हें यह साबित क्यों करना पड़ रहा है कि वे इस देश के नागरिक हैं। यह सवाल प्रशासनिक प्रक्रिया से कहीं आगे जाकर लोकतंत्र की संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
अधिकारियों का कहना है कि नो-मैपिंग की समस्या कई कारणों से सामने आई है। कहीं पता अपडेट नहीं था, कहीं घर बंद मिला, तो कहीं तकनीकी कारणों से डेटा अपलोड नहीं हो सका। लेकिन आम नागरिकों के लिए ये कारण उनकी परेशानी कम नहीं करते। उनके लिए सबसे अहम यह है कि उनका नाम मतदाता सूची में वापस आए और वे बिना किसी डर के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग कर सकें।
वार्ड कार्यालयों में चल रही यह सुनवाई अस्थायी समाधान जरूर है, लेकिन इससे यह भी साफ हो गया है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में मानवीय संवेदनशीलता की कमी है। दो घंटे की सुनवाई में सैकड़ों लोग पहुंच रहे हैं, जिससे भीड़ बढ़ रही है और अफसरों पर दबाव भी। कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जब समस्या इतनी बड़ी है, तो सुनवाई का समय और संसाधन क्यों नहीं बढ़ाए गए।
भोपाल की यह स्थिति सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बड़ी चुनौती की ओर इशारा करती है, जहां डिजिटल और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच आम आदमी पिसता नजर आता है। वोटर लिस्ट से नाम कटना किसी तकनीकी फाइल का मामला नहीं, बल्कि यह व्यक्ति की नागरिक पहचान से जुड़ा प्रश्न है। यही वजह है कि लोग अफसरों के सामने बार-बार यही दोहराते हैं कि वे भी भारतीय हैं और उन्हें दर-दर भटकने पर मजबूर न किया जाए।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इन 85 सुनवाई केंद्रों के जरिए कितनी तेजी से लोगों की समस्याओं का समाधान हो पाता है। प्रशासन के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है, जहां उसे यह साबित करना होगा कि लोकतंत्र में नागरिक सर्वोपरि हैं और उनकी आवाज को अनसुना नहीं किया जाएगा।
