मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को लेकर सामने आया ताजा मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही बल्कि सुनियोजित आर्थिक अनियमितताओं की ओर भी इशारा करता है। वर्षों से धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली वक्फ संपत्तियां किस तरह निजी स्वार्थों की भेंट चढ़ती रहीं, इसका खुलासा अब आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की जांच में हुआ है। इस मामले ने न केवल वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि नियमों की अनदेखी कर सार्वजनिक संपत्तियों को कैसे नुकसान पहुंचाया गया।

भोपाल स्थित वक्फ बोर्ड की औकाफ आम्मा संपत्तियों को लेकर की गई इस विस्तृत जांच के बाद आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। यह कार्रवाई सामान्य प्रशासन विभाग के उप सचिव की शिकायत पर शुरू हुई उस जांच का नतीजा है, जो करीब दो वर्षों तक चली। जांच में सामने आए तथ्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि संपत्तियों के प्रबंधन में गंभीर स्तर पर अनियमितताएं की गईं, जिनसे बोर्ड को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।
ईओडब्ल्यू की प्राथमिक जांच में जिन लोगों को आरोपी बनाया गया है, उनमें तत्कालीन मुतवल्ली शौकत मोहम्मद, वक्फ बोर्ड के सचिव फुरकान अहमद और सह-सचिव मोहम्मद जुबेर शामिल हैं। इन तीनों पर आरोप है कि इन्होंने नियमों को नजरअंदाज करते हुए वक्फ संपत्तियों को बेहद कम किराये पर लीज पर दिया और कई मामलों में बिना अनुमति स्थायी निर्माण की इजाजत भी दे दी।
जांच के दौरान सामने आया कि भोपाल में स्थित करीब 185 वक्फ संपत्तियां इस पूरे मामले के दायरे में हैं। इन संपत्तियों का कुल क्षेत्रफल लगभग 83 हजार वर्गफुट है। यदि कलेक्टर गाइडलाइन के अनुसार इन संपत्तियों का मूल्यांकन किया जाए, तो इनकी कीमत 59 करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। इतनी मूल्यवान संपत्तियों से वक्फ बोर्ड को हर साल करोड़ों रुपये की आय होनी चाहिए थी, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट निकली।
नियमों के मुताबिक इन संपत्तियों से सालाना लगभग 2 करोड़ 76 लाख रुपये का किराया मिलना चाहिए था, लेकिन वक्फ बोर्ड को वास्तव में केवल करीब 21 लाख रुपये ही प्राप्त हुए। इस तरह हर वर्ष करीब 2.54 करोड़ रुपये का सीधा आर्थिक नुकसान बोर्ड को हुआ। यह नुकसान केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वक्फ बोर्ड के सामाजिक और धार्मिक कार्यों पर भी पड़ा है, जिनके लिए यह आय महत्वपूर्ण होती।
ईओडब्ल्यू की जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में किरायेदारी परिवर्तन के नाम पर नए पट्टे जारी किए गए। कागजों में इसे केवल किरायेदार बदलने की प्रक्रिया बताया गया, लेकिन हकीकत में पुराने किरायेदारों को हटाकर नए लोगों को पूरी तरह नए पट्टे दे दिए गए। इस प्रक्रिया में न तो निर्धारित नियमों का पालन किया गया और न ही सक्षम प्राधिकारी से अनुमति ली गई।
इतना ही नहीं, जांच में यह भी उजागर हुआ कि कई वक्फ संपत्तियों पर बिना वैधानिक अनुमति के स्थायी निर्माण कार्य कराए गए। वक्फ संपत्तियों पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य करने के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है, लेकिन इन मामलों में नियमों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। इससे न केवल संपत्तियों की मूल प्रकृति प्रभावित हुई, बल्कि भविष्य में कानूनी विवादों की संभावना भी बढ़ गई।
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ के अधिकारियों का कहना है कि प्रथम दृष्टया आरोप सही पाए गए हैं, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई है। फिलहाल जांच की प्रक्रिया जारी है और यह भी देखा जा रहा है कि क्या इस पूरे मामले में अन्य अधिकारी या निजी व्यक्ति भी जिम्मेदार हैं। जांच एजेंसी अब दस्तावेजों, लीज एग्रीमेंट और निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड की बारीकी से पड़ताल कर रही है।
यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि सार्वजनिक और धार्मिक संपत्तियों की निगरानी व्यवस्था कितनी कमजोर है। जिन संपत्तियों का उपयोग समाज के कमजोर वर्गों और धार्मिक कार्यों के लिए होना चाहिए था, वे लंबे समय तक निजी लाभ का साधन बनी रहीं। यदि समय रहते शिकायत दर्ज न कराई जाती, तो यह नुकसान और भी बढ़ सकता था।
भोपाल वक्फ बोर्ड से जुड़ा यह घोटाला केवल एक स्थानीय मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रदेश में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर एक चेतावनी है। अब यह देखना अहम होगा कि जांच के बाद दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है और क्या भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।
