बिहार की राजनीति में दिसंबर 2025 का यह दिन लंबे समय तक याद किया जाएगा, क्योंकि इसी दिन राज्य की विधायिका में एक ऐसे नेता को सर्वसम्मति से अध्यक्ष के रूप में चुना गया, जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक जनता के बीच अपनी स्वीकृति, अपनी कार्यशैली और अपने सादे व्यक्तित्व के कारण मजबूत पहचान बनाई है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और गया टाउन के नौ बार के विधायक डॉ. प्रेम कुमार को बिहार विधानसभा के नए अध्यक्ष के रूप में चुना गया। इस चुनाव में न केवल सत्ता पक्ष बल्कि विपक्ष तक ने एकमत होकर उनका समर्थन किया, जो आज की ध्रुवीकृत राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण बन गया है।

पटना स्थित बिहार विधानसभा परिसर में जब चुनाव प्रक्रिया पूरी हुई और यह घोषणा की गई कि डॉ. प्रेम कुमार निर्विरोध रूप से अध्यक्ष चुने गए हैं, तो सदन में गूंजती आवाजें केवल एक औपचारिक अभिवादन नहीं थीं, बल्कि यह उस राजनीतिक संस्कृति का प्रमाण थीं जिसमें अनुभव, संयम और संवाद की इच्छा रखने वाले नेतृत्व के लिए अब भी जगह बची हुई है। सदन में हर हर महादेव और जय श्री राम के नारे गूंज उठे, जो परंपरा और राजनीतिक उत्साह का मिश्रण प्रस्तुत कर रहे थे।
शपथ के बाद का पहला संबोधन
अध्यक्ष पद ग्रहण करने के बाद डॉ. प्रेम कुमार ने अपने भाषण की शुरुआत भगवद गीता के श्लोक से की। उनका स्वर शांत था, मगर उनके शब्दों में वर्षों के अनुभव की दृढ़ता साफ महसूस हो रही थी। उन्होंने कहा कि जिस विश्वास के साथ सभी दलों के नेता और सदस्यों ने उन्हें इस पद के योग्य समझा है, वह उनके लिए गर्व के साथ-साथ जिम्मेदारी का भी विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि विधानसभा का अध्यक्ष किसी दल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि पूरे सदन का संरक्षक होता है। उसके कर्तव्य में केवल नियम लागू कराना नहीं बल्कि सभी सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करना शामिल है।
उन्होंने अपने वक्तव्य में यह भी जोड़ा कि बिहार जैसी विविध विचारधाराओं वाली राजनीतिक संरचना में संवाद को बनाना और बढ़ाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका बराबर महत्त्व रखती है, और एक संतुलित सदन ही जनहित में निर्णय कर सकता है। उन्होंने भरोसा जताया कि वे इस मान्यता को हमेशा प्राथमिकता देंगे।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का विशेष सम्मान
चुनाव के तुरंत बाद जो दृश्य सामने आया, वह बिहार की राजनीतिक संस्कृति में एक सकारात्मक संदेश छोड़ गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं डॉ. प्रेम कुमार को उनके नए आसन तक लेकर गए और उन्हें सम्मानपूर्वक अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया। यह दृश्य न केवल एक वरिष्ठ नेता के प्रति आदर का उदाहरण था, बल्कि यह उस परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवहार का भी प्रतीक था, जिसकी आज राजनीति में कमी महसूस की जाती है।
नीतीश कुमार ने सदन की ओर से नए अध्यक्ष को शुभकामनाएँ दीं और कहा कि उनका अनुभव तथा सरल नेतृत्व विधानसभा की कार्यवाही को और अधिक सुव्यवस्थित बनाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार की नई सरकार विधायिका के साथ समन्वय बनाकर चलने के लिए प्रतिबद्ध है और ऐसे अध्यक्ष का नेतृत्व इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
तेजस्वी यादव की प्रतिक्रिया: विपक्ष से सम्मान का आश्वासन
विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव का वक्तव्य भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने अपने भाषण में यह स्पष्ट किया कि वे और उनकी पूरी पार्टी नए अध्यक्ष का सम्मान करते हैं और सदन की गरिमा बनाए रखने में पूर्ण सहयोग देंगे। उन्होंने कहा कि प्रेम कुमार उन क्षेत्रों से आते हैं जहाँ ज्ञान, मोक्ष और संस्कृति का संगम है, और इसलिए उनकी सोच में भी संतुलन और विवेक का स्वाभाविक होना कोई आश्चर्य की बात नहीं।
उन्होंने भरोसा जताया कि नए अध्यक्ष सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को समान दृष्टि से देखेंगे और किसी भी पक्ष को ऐसी स्थिति में नहीं आने देंगे जहाँ उन्हें अपनी बात रखने में कठिनाई हो। तेजस्वी ने यह भी कहा कि विपक्ष लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है, और वे इस नई भूमिका में जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
राजनीतिक यात्रा जो मिसाल बन गई
डॉ. प्रेम कुमार की राजनीतिक यात्रा बिहार की राजनीति में एक मिसाल मानी जाती है। गया टाउन सीट पर लगातार नौ बार जीत दर्ज करना इस बात का प्रमाण है कि वे केवल अपने कार्यों की वजह से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व और जनता से जुड़ाव के लिए भी लोकप्रिय हैं। 1990 के दशक में राजनीति में प्रवेश करने के बाद से वे लगातार अपने निर्वाचन क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। यह निरंतरता किसी भी नेता के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, खासकर ऐसे समय में जब राजनीति में बदलाव की लहरें बहुत तेज होती हैं।
2025 के चुनावों में भी उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी अखौरी ऑनकार नाथ को 26,423 वोटों के बड़े अंतर से हराया। यह जीत उनके राजनीतिक प्रभाव और जनता के विश्वास की नई पुष्टि थी। इस जीत ने उन्हें बिहार विधानसभा में उन नेताओं की सूची में शामिल कर दिया है जिनका क्षेत्र में सबसे लंबा प्रतिनिधित्व रहा है।
प्रशासनिक अनुभव: जो उन्हें विशिष्ट बनाता है
69 वर्ष की उम्र में भी डॉ. प्रेम कुमार का सक्रिय राजनीतिक जीवन प्रेरणा देने वाला है। वे बिहार सरकार के कई महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व कर चुके हैं, जिनमें कृषि, पशुपालन, पर्यटन, सहकारिता, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण शामिल हैं। इन विभागों में रहकर उन्होंने केवल नीतियाँ ही नहीं बनाई, बल्कि ऐसे कई निर्णय भी लिए जो जमीन पर उतरने के बाद आम लोगों के जीवन में दिखे।
कृषि विभाग में रहते हुए उन्होंने किसानों की समस्याओं को सुनने के लिए विशेष अभियानों की शुरुआत की थी। पशुपालन विभाग में उनके कार्यकाल के दौरान कई योजनाएँ लागू हुईं जिन्होंने छोटे पशुपालकों को मजबूती दी। पर्यटन विभाग के नेतृत्व में बिहार के ऐतिहासिक स्थलों को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में भी काम हुआ।
नए अध्यक्ष के चयन का व्यापक राजनीतिक संदेश
डॉ. प्रेम कुमार का विधानसभा अध्यक्ष बनना सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में स्थिरता और परिपक्वता का संदेश भी है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने राजनीतिक उतार-चढ़ाव, गठबंधन परिवर्तनों और नेतृत्व संघर्षों को देखा है। ऐसे समय में एक ऐसे नेता का चयन जो सभी पक्षों में स्वीकार्य हो, बिहार के लोकतांत्रिक वातावरण में सकारात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है।
नई सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की संभावनाओं को कम करने में ऐसी सहमति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह संकेत भी मिलता है कि आने वाले समय में विधायी कार्यवाही अधिक सुचारू हो सकती है।
