पटना की सर्द दोपहरी में एक राजनीतिक गर्मी महसूस की जा रही थी। राजधानी के 1 पोलो रोड स्थित आवास पर अचानक ही गहमागहमी बढ़ गई थी। गाड़ियां लगातार अंदर-बाहर हो रही थीं और सुरक्षाकर्मियों की चाल में भी कुछ अतिरिक्त सतर्कता थी। यह आम दिन जैसा दृश्य नहीं था, बल्कि बिहार विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले की सबसे अहम राजनीतिक हलचल का केंद्र बन चुका था। राष्ट्रीय जनता दल ने अपने विधायकों को एक महत्वपूर्ण बैठक के लिए बुलाया था, और इसी बैठक में कई बड़े फैसलों ने बिहार के विपक्षी गलियारों को नई दिशा दी।

हालांकि बिहार की राजनीति में उतार-चढ़ाव आम बात है, लेकिन इस बार स्थिति अलग थी। बिहार चुनाव 2025 के नतीजों ने राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया था। विपक्ष मात्र 35 सीटों पर सिमट गया था, जिनमें 25 आरजेडी, 6 कांग्रेस और 4 वाम दलों के विधायक थे। इतनी कम संख्या के बावजूद विपक्ष अब भी खुद को कमजोर जताने के मूड में नहीं है। यही वजह है कि आरजेडी की यह बैठक महज औपचारिकता भर नहीं, बल्कि एक नई रणनीति का खाका तैयार करने का मंच बनी।
तेजस्वी यादव की वापसी और विपक्ष को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास
दिल्ली से पटना पहुंचे तेजस्वी यादव पर सभी की निगाहें थीं। हालांकि एयरपोर्ट पर उन्होंने मीडिया के सवालों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन उनकी चुप्पी भी कई संकेत दे रही थी। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि तेजस्वी का कम बोलना और ज्यादा संगठनात्मक बदलाव पर ध्यान देना एक नई रणनीति का हिस्सा है। शायद यही वजह है कि आरजेडी विधायकों की बैठक में उनके नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लगी और उन्हें विपक्ष का नेता चुना गया।
यह फैसला सिर्फ एक औपचारिक नियुक्ति नहीं थी। इसके पीछे एक व्यापक राजनीतिक संदेश छिपा था। महागठबंधन के सहयोगी दल कांग्रेस और वामपंथी दलों ने भी एक स्वर में तेजस्वी यादव को अपना नेता माना। इससे स्पष्ट होता है कि विपक्ष भले ही संख्या के मामले में बेहद पीछे हो, लेकिन वह एकजुटता दिखाने और राजनीतिक लड़ाई को पूरे दम के साथ लड़ने की मंशा रखता है।
बैठक का माहौल और अंदर की चर्चा
आरजेडी के 25 विधायक अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल के नेतृत्व में बैठक स्थल पर पहुंचे। बैठक शुरू होते ही सभी विधायकों ने प्रदेश की राजनीतिक स्थिति पर विस्तृत चर्चा की। बिहार में सत्तारूढ़ एनडीए के पास 202 विधायकों की मजबूत संख्या है, इसलिए विपक्ष को पता है कि संख्या के आधार पर सदन में जीतना संभव नहीं, लेकिन मुद्दों के तीखे और सधे हुए इस्तेमाल से सरकार को घेरना अभी भी संभव है।
बैठक में तय किया गया कि जनता से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष को एकजुट होकर आवाज उठानी होगी। चाहे वह बेरोजगारी हो, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति हो, शिक्षा का ढांचा हो या फिर कानून-व्यवस्था की गिरावट, विपक्ष इन सभी मुद्दों को सत्र में प्रभावी तरीके से पेश करेगा। तेजस्वी यादव ने भी स्पष्ट संकेत दिए कि विपक्ष की भूमिका सिर्फ विरोध करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि जनहित और विकास से जुड़े मुद्दों पर रचनात्मक सुझाव देकर सरकार को जवाबदेह बनाने का काम भी किया जाएगा।
महागठबंधन की संयुक्त बैठक और आगे की रणनीति
आरजेडी की बैठक खत्म होते ही महागठबंधन की संयुक्त बैठक भी आयोजित की गई। इस बैठक में कांग्रेस से एमएलसी समीर सिंह, माले विधायक संदीप सौरव और आईपी गुप्ता जैसे नेताओं ने हिस्सा लिया। सभी दलों ने माना कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में विपक्ष को एक स्वर में बात करनी होगी ताकि जनता तक सही और स्पष्ट संदेश जा सके।
महागठबंधन के नेताओं को इस बात का एहसास है कि बिहार में विपक्ष अब महज एक प्रतीकात्मक भूमिका में है, क्योंकि सत्ता पक्ष की संख्या बहुत अधिक है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विपक्ष को सदन के भीतर बेअसर माना जाए। इतिहास गवाह है कि कई बार कम संख्या वाला विपक्ष भी सरकार के कामकाज को प्रभावित कर सकता है, बशर्ते कि उसकी रणनीति मजबूत और मुद्दे ठोस हों।
महागठबंधन की यह बैठक भी इसी रणनीति का हिस्सा थी। विपक्ष ने तय किया कि अगला विधानसभा सत्र उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हर मुद्दे पर गहराई से तैयारी कर सरकार को घेरने का प्रयास किया जाएगा।
तेजस्वी का मौन और उसके राजनीतिक संकेत
तेजस्वी यादव द्वारा मीडिया से बातचीत न करने के कई राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। एक तरफ यह संदेश है कि वह अभी अपनी रणनीति उजागर नहीं करना चाहते। दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि वह पहले अपने सभी विधायकों से राय लेकर ही कोई बड़ा बयान देना चाहते हैं। उनकी यह रणनीति परिपक्व राजनीति की तरफ उनका झुकाव दर्शाती है।
राजनीति में मौन भी एक भाषा होती है। और तेजस्वी का मौन इस बात का संकेत है कि वे बिहार में विपक्ष की लय को नए सिरे से साधने की कोशिश में हैं।
बिहार की वर्तमान राजनीतिक तस्वीर
2025 के विधानसभा चुनावों में एनडीए ने प्रचंड बहुमत हासिल किया। विपक्ष की स्थिति कमजोर हुई है और अब सदन में उनकी आवाज उतनी जोरदार नहीं रहेगी, लेकिन कम संख्या वाला विपक्ष कई बार ज्यादा गंभीर मुद्दों को उठाने में सक्षम होता है।
वर्तमान राजनीतिक स्थिति में महागठबंधन अपने अस्तित्व को बचाने ही नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों को मजबूत तरीके से उठाने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
जनता की उम्मीदें और विपक्ष की जिम्मेदारी
बिहार की जनता चाहती है कि विपक्ष सिर्फ विरोध के लिए विरोध न करे, बल्कि राज्य के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर व्यापक और गंभीर बहस छेड़े। जिस तरह महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याएं बढ़ रही हैं, उससे लोगों में चिंताएं गहराती जा रही हैं। ऐसे में विपक्ष की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह जनता की आवाज को सदन तक सही तरीके से पहुंचाए।
तेजस्वी यादव के सामने यह चुनौती बेहद बड़ी है। उन्हें न सिर्फ अपनी पार्टी को संगठित रखनी है, बल्कि महागठबंधन के सहयोगी दलों को भी एक मंच पर बनाए रखना है।
भविष्य की राजनीति का संकेत
आरजेडी की बैठक और महागठबंधन की रणनीति इस बात का संकेत है कि भले ही विपक्ष की संख्या कम हो, लेकिन आने वाले दिनों में वह बिहार की राजनीति में जोरदार उपस्थिति बनाए रखने की कोशिश करेगा।
यह विपक्ष के लिए परीक्षा का समय है और तेजस्वी यादव के लिए नेतृत्व का मौका। समय बताएगा कि वह इस चुनौती को किस तरह अवसर में बदलते हैं।
