बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे भारतीय राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय बने रहेंगे। महागठबंधन का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और आरजेडी, जिसे कभी बिहार के सबसे सशक्त सामाजिक समीकरण का मालिक माना जाता था, इस बार 30 सीटों के भीतर सिमट गई। यह परिणाम न सिर्फ राजनीतिक हार है, बल्कि उन सामाजिक समीकरणों का टूटना भी है, जो दशकों से लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी की पहचान थे। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम समझेंगे कि आखिर क्यों मुसलमानों ने आरजेडी से दूरी बनाई, यादव समुदाय किन कारणों से खिसक गया, और कैसे यह चुनाव परिणाम आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

MY समीकरण का टूटना: चालीस वर्षों में पहली बार आरजेडी का आधार खिसका
आरजेडी की असली ताकत हमेशा से MY समीकरण यानी मुस्लिम और यादव वोटर रहे हैं। 1990 के दशक में सामाजिक न्याय की राजनीति के उदय के साथ इस समीकरण ने कांग्रेस को कमजोर किया और आरजेडी को अपराजेय बना दिया। लेकिन 2025 के चुनाव परिणाम इतिहास में पहली बार एक ऐसा मोड़ लेकर आए, जहां दोनों प्रमुख समुदायों ने आरजेडी का साथ बड़े पैमाने पर छोड़ दिया। आंकड़ों की समीक्षा बताती है कि इस बार मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर आरजेडी को भारी नुकसान हुआ है, वहीं यादव बहुल सीटों पर भी विजय का प्रतिशत ऐतिहासिक रूप से सबसे कम रहा।
मुस्लिम वोटरों का झुकाव AIMIM की ओर: क्षेत्रवार विश्लेषण
सीमांचल, जो बिहार में मुस्लिम वोटों का सबसे बड़ा केंद्र है, इस चुनाव में AIMIM का सबसे मजबूत गढ़ बनकर उभरा। 2020 में पांच सीटें जीतने के बाद 2025 में भी पार्टी का असर कम नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ा। मुस्लिम वोटरों ने AIMIM को क्यों चुना, इसे समझना बेहद जरूरी है। जमीन पर जुटाए गए फीडबैक से पता चलता है कि मुस्लिम समुदाय में यह भावना तेजी से बढ़ी कि आरजेडी उनकी आवाज को पहले जितना महत्व नहीं देती। कई जगहों पर स्थानीय मुद्दों पर आरजेडी विधायकों की निष्क्रियता पर नाराजगी थी। AIMIM ने इन नाराज वोटरों को न सिर्फ आवाज दी, बल्कि एक ताकतवर विकल्प के रूप में खुद को प्रस्तुत किया।
AIMIM का स्थानीय प्रभाव और जमीनी कनेक्शन
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने अपने पिछले पांच वर्षों में सीमांचल में लगातार संगठन खड़ा किया। नुक्कड़ सभाएं, स्थानीय युवाओं को टिकट, स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दों पर कैंपेन — इन सभी ने मुस्लिम वोटरों को प्रभावित किया। आरजेडी जहां बड़े स्तर पर राज्यव्यापी नैरेटिव पर फोकस करती रही, वहीं AIMIM ने प्रत्येक जिले में अपने प्रभाव को बढ़ाया। इसका नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा आरजेडी से खिसक कर AIMIM के पाले में चला गया।
यादव मतदाता क्यों हुए नाराज: अंदरूनी असंतोष और नई पीढ़ी का बदलता दृष्टिकोण
यादव आरजेडी के सबसे वफादार वोटर माने जाते थे, लेकिन 2025 के चुनाव में इनके बड़े हिस्से ने आरजेडी से दूरी बनाई। चुनाव विशेषज्ञ बताते हैं कि इसकी कई वजहें हैं।
1. आरजेडी की टिकट राजनीति से नाराजगी
कई प्रभावशाली यादव नेताओं को टिकट नहीं दिया गया, कुछ को अंतिम समय में बदला गया। इससे आरजेडी के अंदर असंतोष की स्थिति बनी, जिसका फायदा एनडीए ने उठाया।
2. नई पीढ़ी का राजनीतिक नजरिया बदल रहा है
यादव समुदाय की नई पीढ़ी सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और रोजगार की राजनीति से जुड़ी समस्याओं पर बात करती है। आरजेडी की पारंपरिक राजनीति अब उन्हें उतनी आकर्षक नहीं लग रही जितनी पहले लगती थी।
3. एनडीए का नए तरह का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल
एनडीए ने यादव समुदाय में लगातार पैठ बनाई है। स्थानीय स्तर पर बीजेपी और जेडीयू द्वारा कई यादव नेताओं को जिम्मेदारियां दी गईं। इससे एक नया भरोसा पैदा हुआ।
क्या है इस पतन का सबसे बड़ा कारण: नेतृत्व पर बढ़ते सवाल
आरजेडी के अंदर और बाहर दोनों जगह इस बात पर चर्चा है कि नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ा है। कई वरिष्ठ नेताओं ने बताया कि पार्टी में युवा नेतृत्व को आगे लाने की कोशिशों में और परिपक्व राजनीतिक रणनीति में सामंजस्य नहीं बैठ पाया। तेजस्वी यादव की लोकप्रियता निश्चित तौर पर एक स्तर पर मौजूद है, लेकिन चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और जनसंपर्क में अपेक्षित आक्रामकता नहीं दिखी।
एनडीए की रणनीति की पकड़: जातीय समीकरण से विकास मॉडल तक
एनडीए की चुनावी रणनीति इस बार बेहद आक्रामक और सूक्ष्म थी। जातीय समीकरण के साथ-साथ उन्होंने महिलाओं, लाभार्थी वर्ग, किसानों, युवाओं और गरीबों को सीधे जोड़ने वाली योजनाओं को हथियार बनाया। नीतीश कुमार की छवि स्थिर शासन की रही है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इन सभी वजहों से एनडीए का गठबंधन हर क्षेत्र में मजबूती से उभरा।
परिणामों का व्यापक प्रभाव: बिहार की राजनीति का नया अध्याय शुरू
2025 का चुनाव इस बात की घोषणा करता है कि बिहार की राजनीति में अगला दौर पुराने समीकरणों पर नहीं चलेगा। कई नई पार्टियां क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत हो रही हैं, युवा वोटरों की प्राथमिकताएं लगातार बदल रही हैं, और जातीय राजनीति के साथ अब मुद्दा आधारित राजनीति का विस्तार हो रहा है।
आरजेडी के सामने चुनौतियां: भरोसा लौटाना होगा, रणनीति बदलनी होगी
आरजेडी यदि भविष्य में मजबूत विकल्प के रूप में लौटना चाहती है, तो उसे कई बड़े बदलाव करने होंगे। सबसे पहले नेतृत्व को संगठित करना होगा। टिकट वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी होगी। मुस्लिम और यादव समुदाय के भरोसे को फिर से जीतना होगा। सामाजिक न्याय के पुराने मॉडल के साथ-साथ आधुनिक मुद्दों का भी समाधान ढूंढना होगा।
क्या आने वाले वर्षों में MY समीकरण फिर लौट सकता है
राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। विश्वास लौटाना कठिन है, असंभव नहीं। यदि आरजेडी मुद्दों पर स्पष्टता दिखाती है और संगठन को मजबूत बनाती है, तो भविष्य में समीकरण बदल सकते हैं। लेकिन फिलहाल के लिए यह स्पष्ट है कि 2025 का चुनाव बिहार में आरजेडी के लिए सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक है।
