दुनिया की आर्थिक व्यवस्था एक बार फिर बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी दिखाई दे रही है। पिछले कई दशकों से जिस अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली पर अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व रहा है, अब उसी व्यवस्था को चुनौती देने की एक नई लेकिन बेहद सुनियोजित कोशिश आकार ले रही है। यह कोशिश किसी अचानक लिए गए फैसले का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों से चल रहे भू-राजनीतिक तनाव, प्रतिबंधों की राजनीति, व्यापार युद्ध और तकनीकी प्रगति की पृष्ठभूमि में धीरे-धीरे तैयार की गई रणनीति का हिस्सा है।

इस रणनीति के केंद्र में है ब्रिक्स देशों की डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव, जिस पर भारत का केंद्रीय बैंक सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यह पहल केवल तकनीकी नवाचार नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली, वैश्विक व्यापार, पर्यटन, पूंजी प्रवाह और मुद्रा संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने की क्षमता रखती है।
ब्रिक्स और बदलती वैश्विक शक्ति संरचना
ब्रिक्स समूह पहले ही वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में उभर चुका है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह समूह अब कई नए देशों के शामिल होने के बाद और भी व्यापक हो गया है। संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और इंडोनेशिया जैसे देशों की भागीदारी ने ब्रिक्स को केवल एक आर्थिक मंच नहीं, बल्कि रणनीतिक गठबंधन के रूप में स्थापित कर दिया है।
इन देशों की एक साझा चिंता रही है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता एक ही मुद्रा पर क्यों होनी चाहिए। खासकर तब, जब उसी मुद्रा का उपयोग राजनीतिक दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के हथियार के रूप में किया जाता रहा हो।
डिजिटल मुद्रा और केंद्रीय बैंकों की नई भूमिका
डिजिटल युग में मुद्रा की परिभाषा बदल रही है। अब पैसा केवल कागज या धातु तक सीमित नहीं रहा। केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी, जिसे सीबीडीसी कहा जाता है, इसी परिवर्तन का परिणाम है। यह किसी देश की आधिकारिक मुद्रा का डिजिटल रूप होता है, जिसे सीधे केंद्रीय बैंक जारी करता है।
सीबीडीसी का उद्देश्य केवल नकदी का विकल्प बनना नहीं है, बल्कि भुगतान प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तेज, सस्ता और सुरक्षित बनाना भी है। यही वजह है कि दुनिया के कई केंद्रीय बैंक इस दिशा में प्रयोग कर रहे हैं।
भारत की डिजिटल रुपये की यात्रा
भारत ने दिसंबर 2022 में डिजिटल रुपये की शुरुआत करके इस क्षेत्र में गंभीर इरादे दिखा दिए थे। शुरुआती चरण में इसे सीमित उपयोग के लिए पेश किया गया, लेकिन धीरे-धीरे इसके दायरे का विस्तार किया गया। ऑफलाइन भुगतान की सुविधा, सरकारी सब्सिडी के लक्षित हस्तांतरण के लिए प्रोग्रामेबिलिटी और निजी फिनटेक कंपनियों को डिजिटल वॉलेट की अनुमति जैसे कदमों ने ई-रुपये को व्यावहारिक रूप से मजबूत बनाया।
आज डिजिटल रुपये के लाखों उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत केवल घरेलू प्रयोग तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उपयोगी बनाना चाहता है।
ब्रिक्स डिजिटल करेंसी इंटरऑपरेबिलिटी का प्रस्ताव
भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्रिक्स देशों के सामने एक अहम प्रस्ताव रखा है। इसका सार यह है कि सभी सदस्य देश अपनी-अपनी डिजिटल मुद्राओं को इस तरह विकसित करें कि वे एक-दूसरे के साथ सीधे काम कर सकें।
इसका मतलब यह होगा कि यदि कोई भारतीय व्यापारी रूस या ब्राजील के किसी कारोबारी को भुगतान करना चाहता है, तो उसे अमेरिकी डॉलर या किसी तीसरी मुद्रा में लेनदेन करने की आवश्यकता नहीं होगी। डिजिटल रुपया सीधे डिजिटल रूबल या डिजिटल रियाल से जुड़ सकेगा।
इस व्यवस्था से लेनदेन की लागत घटेगी, समय की बचत होगी और मुद्रा विनिमय से जुड़े जोखिम भी कम होंगे।
क्यों डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं देश
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका दशकों से केंद्रीय रही है। कच्चे तेल से लेकर हथियारों और खाद्यान्न तक, अधिकांश सौदे डॉलर में होते हैं। लेकिन यही व्यवस्था कई देशों के लिए परेशानी का कारण भी बनी है।
जब किसी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो सबसे पहले उसकी डॉलर तक पहुंच प्रभावित की जाती है। बैंकिंग नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली और विदेशी मुद्रा भंडार सभी इस दबाव में आ जाते हैं।
ब्रिक्स देशों की यह पहल इसी जोखिम को कम करने की दिशा में एक कदम है। हालांकि भारत जैसे देश स्पष्ट कर चुके हैं कि उनका उद्देश्य डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि विकल्प तैयार करना है।
अमेरिका की संभावित प्रतिक्रिया और भू-राजनीतिक तनाव
डॉलर आधारित प्रणाली को चुनौती देने की किसी भी कोशिश पर अमेरिका की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से तीखी हो सकती है। अतीत में भी ऐसे प्रयासों को अमेरिका ने संदेह और विरोध की नजर से देखा है।
अमेरिकी नेतृत्व पहले ही ब्रिक्स समूह को अमेरिका-विरोधी गठबंधन के रूप में देखता रहा है। टैरिफ लगाने और व्यापारिक दबाव की चेतावनियां इस मानसिकता को दर्शाती हैं।
ऐसे में ब्रिक्स डिजिटल करेंसी इंटरऑपरेबिलिटी का प्रस्ताव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक मायने भी रखता है।
2026 ब्रिक्स सम्मेलन और भारत की भूमिका
भारत के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2026 में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी वही करेगा। यह मौका भारत को वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक सोच और तकनीकी क्षमता दिखाने का अवसर देगा।
यदि यह प्रस्ताव सम्मेलन के एजेंडे में शामिल होता है और उस पर सहमति बनती है, तो यह ब्रिक्स इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
चीन और रूस की डिजिटल मुद्रा रणनीति
चीन पहले ही डिजिटल युआन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने की बात कर चुका है। सीमा-पार व्यापार और निवेश में इसके प्रयोग के लिए कई पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
रूस भी प्रतिबंधों के अनुभव से सीखते हुए वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर काम कर रहा है। ऐसे में भारत का यह प्रस्ताव इन दोनों देशों की दीर्घकालिक रणनीति से मेल खाता है।
चुनौतियां और व्यावहारिक अड़चनें
हालांकि यह योजना जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही जटिल भी है। अलग-अलग देशों की कानूनी व्यवस्था, साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और तकनीकी मानकों को एकसाथ लाना आसान नहीं होगा।
इसके अलावा, राजनीतिक दबाव, वैश्विक बाजार की प्रतिक्रिया और निवेशकों का भरोसा भी अहम कारक होंगे।
भविष्य की तस्वीर
यदि ब्रिक्स डिजिटल मुद्राओं की इंटरऑपरेबिलिटी सफल होती है, तो यह केवल इन देशों तक सीमित नहीं रहेगी। अन्य विकासशील देश भी इस मॉडल को अपनाने में रुचि दिखा सकते हैं।
यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली को अधिक बहुध्रुवीय बना सकती है, जहां किसी एक मुद्रा या देश का वर्चस्व न हो।
निष्कर्ष
ब्रिक्स डिजिटल करेंसी को जोड़ने की यह पहल एक शांत लेकिन गहरी क्रांति की तरह है। यह न तो शोरगुल के साथ आई है और न ही आक्रामक घोषणाओं के जरिए। लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं।
भारत की भूमिका इसमें संतुलनकारी और रणनीतिक दोनों है। आने वाले वर्षों में यह साफ होगा कि यह प्रयोग वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा को किस हद तक बदल पाता है।
