भारत संचार निगम लिमिटेड यानी बीएसएनएल कभी देश की संचार रीढ़ माना जाता था। दूर-दराज़ गांवों से लेकर शहरों तक, टेलीफोन और बाद में मोबाइल सेवाओं के जरिए बीएसएनएल ने देश को जोड़ा। लेकिन बीते एक दशक में बदलती तकनीक, निजी कंपनियों की आक्रामक प्रतिस्पर्धा और नीतिगत चुनौतियों के कारण यह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी गंभीर आर्थिक संकट में फंसती चली गई।

लगातार घाटे, घटते उपभोक्ता और भारी परिचालन लागत ने बीएसएनएल को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां अब उसे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कठोर और व्यावहारिक फैसले लेने पड़ रहे हैं। इसी कड़ी में कंपनी ने मध्य प्रदेश में स्थित अपनी 56 संपत्तियों को बेचने या व्यावसायिक उपयोग के लिए देने का निर्णय लिया है।
संपत्तियों की बिक्री: मजबूरी या रणनीति
बीएसएनएल द्वारा संपत्तियों को बेचने का फैसला केवल घाटे की भरपाई का प्रयास नहीं है, बल्कि इसे एक रणनीतिक पुनर्गठन के रूप में भी देखा जा रहा है। कंपनी के पास देशभर में बड़ी मात्रा में जमीन, भवन और तकनीकी ढांचा मौजूद है, जिनमें से कई संपत्तियां वर्षों से या तो कम उपयोग में हैं या बिल्कुल खाली पड़ी हैं।
मध्य प्रदेश में स्थित 56 संपत्तियां इसी श्रेणी में आती हैं। इनमें शहरी क्षेत्रों की व्यावसायिक रूप से मूल्यवान जमीन से लेकर छोटे कस्बों और जिलों में स्थित भवन शामिल हैं। बीएसएनएल का मानना है कि इन संपत्तियों को बेचकर या किराये पर देकर वह न केवल तत्काल राजस्व जुटा सकता है, बल्कि अपने परिचालन खर्चों का बोझ भी कम कर सकता है।
मध्य प्रदेश सरकार को पहला अवसर क्यों
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे अहम बात यह है कि बीएसएनएल ने इन संपत्तियों को खरीदने का पहला अधिकार मध्य प्रदेश सरकार को दिया है। राज्य सरकार, उसके सार्वजनिक उपक्रम और स्थानीय निकाय इन संपत्तियों को प्राथमिकता के आधार पर खरीद सकते हैं।
इसके पीछे एक सोच यह भी मानी जा रही है कि सार्वजनिक संपत्तियां सार्वजनिक संस्थाओं के पास ही रहें। अगर राज्य सरकार इन जमीनों या भवनों को खरीदती है, तो उनका उपयोग स्कूल, कॉलेज, सरकारी कार्यालय, अस्पताल, प्रशिक्षण केंद्र या अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए किया जा सकता है।
यह कदम केंद्र और राज्य के बीच सहयोगात्मक संघवाद की भावना को भी दर्शाता है, जहां एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी अपनी परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग के लिए राज्य सरकार को आगे बढ़ने का अवसर दे रही है।
संपत्तियों की पारदर्शी सूची
बीएसएनएल ने इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने का दावा किया है। कंपनी ने मध्य प्रदेश में स्थित सभी 56 संपत्तियों की विस्तृत सूची अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दी है। इसमें जमीन का क्षेत्रफल, भवन की स्थिति, स्थान और संभावित उपयोग से जुड़ी जानकारी शामिल है।
इससे न केवल सरकारी एजेंसियों बल्कि आम निवेशकों को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन-सी संपत्ति कहां स्थित है और उसका व्यावसायिक मूल्य क्या हो सकता है। पारदर्शिता का यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री अक्सर विवादों के घेरे में आ जाती है।
किराये का विकल्प भी खुला
बीएसएनएल ने यह स्पष्ट किया है कि सभी संपत्तियां अनिवार्य रूप से बेची ही जाएं, ऐसा नहीं है। राज्य सरकार या उसकी एजेंसियां चाहें तो कुछ संपत्तियों को खरीदने के बजाय किराये पर भी ले सकती हैं। यह विकल्प उन विभागों के लिए उपयोगी हो सकता है, जिन्हें अस्थायी या मध्यम अवधि के लिए कार्यालय या अन्य ढांचे की जरूरत है।
किराये पर देने की प्रक्रिया भी पूरी तरह व्यावसायिक दरों पर आधारित होगी। इसका मतलब यह है कि बीएसएनएल को नियमित आय का स्रोत मिलेगा और राज्य सरकार को नए निर्माण पर खर्च नहीं करना पड़ेगा।
बीएसएनएल के पुनरुद्धार की बड़ी तस्वीर
संपत्तियों की बिक्री बीएसएनएल के पुनरुद्धार की पूरी योजना का सिर्फ एक हिस्सा है। कंपनी पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना, नेटवर्क आधुनिकीकरण और 4जी व 5जी सेवाओं की तैयारी जैसे कदम उठा चुकी है। हालांकि इन प्रयासों के बावजूद वित्तीय दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
ऐसे में गैर-मुख्य परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण एक व्यावहारिक रास्ता माना जा रहा है। इससे मिलने वाली राशि का उपयोग कर्ज चुकाने, नेटवर्क सुधारने और नई तकनीकों में निवेश के लिए किया जा सकता है।
राज्य के लिए अवसर और चुनौतियां
मध्य प्रदेश सरकार के लिए यह प्रस्ताव एक अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि उसे पहले से विकसित स्थानों पर स्थित जमीन और भवन मिल सकते हैं, जिनका उपयोग सार्वजनिक हित में किया जा सकता है। चुनौती इसलिए कि इन संपत्तियों को खरीदने या किराये पर लेने के लिए बजटीय प्रावधान करने होंगे।
इसके अलावा यह भी तय करना होगा कि किन संपत्तियों का वास्तव में उपयोग हो सकता है और किन्हें खरीदना राज्य के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं होगा।
सार्वजनिक संपत्तियों का भविष्य
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की संपत्तियों का भविष्य क्या होना चाहिए। क्या इन्हें बेचकर घाटा कम किया जाए या इन्हें नए तरीके से उपयोग में लाकर राजस्व बढ़ाया जाए।
बीएसएनएल का यह कदम आने वाले समय में अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के लिए भी उदाहरण बन सकता है, जो अपनी निष्क्रिय संपत्तियों के बेहतर उपयोग के रास्ते तलाश रहे हैं।
