देश का हर साल पेश होने वाला आम बजट केवल आंकड़ों और नीतियों का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि करोड़ों नौकरीपेशा लोगों के भविष्य की दिशा तय करता है। जैसे-जैसे बजट 2026 नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों के बीच उम्मीदें तेज हो गई हैं। इस बार चर्चा के केंद्र में एम्प्लॉई पेंशन स्कीम यानी EPS है, जिसे लेकर सरकार एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला ले सकती है। संकेत मिल रहे हैं कि सरकार EPS के दायरे को बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रही है, जिससे मौजूदा व्यवस्था में शामिल करोड़ों कर्मचारियों को सीधा लाभ मिल सकता है।

EPS क्या है और क्यों है यह कर्मचारियों के लिए अहम
एम्प्लॉई पेंशन स्कीम देश के संगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट सुरक्षा की एक अहम व्यवस्था है। इस योजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद उसे हर महीने एक निश्चित पेंशन मिलती रहे। यह पेंशन उस योगदान पर आधारित होती है, जो कर्मचारी के कार्यकाल के दौरान एम्प्लॉयर द्वारा जमा किया जाता है।
वर्तमान व्यवस्था के तहत EPS में योगदान की गणना कर्मचारी की बेसिक सैलरी के एक निश्चित हिस्से पर ही की जाती है। यही वह बिंदु है, जहां लंबे समय से बदलाव की मांग उठती रही है। महंगाई, जीवनशैली में बदलाव और बढ़ती जरूरतों के बीच मौजूदा पेंशन राशि को कई कर्मचारी अपर्याप्त मानते हैं।
मौजूदा नियम और उनकी सीमाएं
फिलहाल EPS के तहत पेंशन की गणना अधिकतम 15,000 रुपये की बेसिक सैलरी पर होती है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 30,000 या 40,000 रुपये भी है, तो भी पेंशन फंड के लिए केवल 15,000 रुपये ही आधार माने जाते हैं। इस सीमा के कारण वर्षों तक काम करने के बावजूद कई कर्मचारियों की पेंशन अपेक्षाकृत कम रह जाती है।
EPF प्रणाली के तहत कर्मचारी और नियोक्ता दोनों अपनी बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते का 12 प्रतिशत योगदान करते हैं। नियोक्ता के योगदान का एक हिस्सा EPS में जाता है, जो कि 8.33 प्रतिशत होता है। लेकिन यह प्रतिशत भी 15,000 रुपये की सीमा तक ही लागू होता है। इस तरह हर महीने EPS में अधिकतम लगभग 1,250 रुपये ही जमा हो पाते हैं।
बजट 2026 में संभावित बदलाव की तस्वीर
बजट 2026 में सरकार EPS की इस सीमा को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने पर विचार कर सकती है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो यह पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा सुधार माना जाएगा। इससे न केवल EPS के दायरे में आने वाले कर्मचारियों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि उनकी पेंशन राशि में भी उल्लेखनीय इजाफा होगा।
सरकार के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, यह बदलाव नियोक्ता के योगदान की गणना के तरीके को नहीं बदलेगा, बल्कि केवल उस सैलरी सीमा को बढ़ाएगा, जिस पर EPS का योगदान तय होता है। यानी प्रतिशत वही रहेगा, लेकिन आधार राशि बढ़ जाएगी।
EPS सीमा बढ़ने से कितना बदलेगा योगदान
यदि EPS की गणना 25,000 रुपये की बेसिक सैलरी पर होने लगती है, तो नियोक्ता का 8.33 प्रतिशत योगदान लगभग 2,083 रुपये प्रति माह हो जाएगा। अभी जहां हर महीने 1,250 रुपये जमा होते हैं, वहीं यह राशि सीधे लगभग 66 प्रतिशत बढ़ जाएगी। यह अंतर केवल मासिक योगदान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लंबे समय में पेंशन फंड को कहीं अधिक मजबूत बना देगा।
यह बदलाव उन कर्मचारियों के लिए खासतौर पर अहम होगा, जिनकी सैलरी पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी है, लेकिन EPS की सीमा स्थिर रहने के कारण उनकी पेंशन उसी पुराने ढांचे में फंसी हुई थी।
करोड़ों कर्मचारियों को संभावित फायदा
यदि सरकार यह फैसला बजट में लेती है, तो इसका लाभ 6.5 करोड़ से अधिक EPFO सब्सक्राइबर्स को मिल सकता है। यह संख्या अपने आप में इस प्रस्ताव की व्यापकता को दर्शाती है। संगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह कदम रिटायरमेंट सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा सुधार साबित हो सकता है।
EPS का दायरा बढ़ने से न केवल वर्तमान कर्मचारी लाभान्वित होंगे, बल्कि आने वाले वर्षों में नौकरी शुरू करने वाले युवाओं के लिए भी पेंशन व्यवस्था अधिक मजबूत हो जाएगी।
न्यूनतम पेंशन बढ़ाने पर भी विचार
सरकार केवल EPS की सैलरी सीमा बढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहती। संकेत हैं कि न्यूनतम पेंशन राशि को भी बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। फिलहाल EPS के तहत न्यूनतम पेंशन 1,000 रुपये प्रति माह है, जिसे लंबे समय से अपर्याप्त माना जा रहा है।
यदि न्यूनतम पेंशन में बढ़ोतरी होती है, तो इसका सीधा फायदा उन कर्मचारियों को मिलेगा, जिनकी आय कम रही है या जिन्होंने सीमित वर्षों तक योगदान किया है। यह कदम सामाजिक सुरक्षा को और अधिक समावेशी बना सकता है।
EPS से जुड़े अन्य फायदे
EPS केवल रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली मासिक पेंशन तक सीमित नहीं है। इसके तहत समय से पहले रिटायरमेंट, विकलांगता की स्थिति, कर्मचारी की मृत्यु के बाद विधवा या विधुर पेंशन, बच्चों और अनाथ पेंशन जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं। कुछ मामलों में माता-पिता भी लाभार्थी बन सकते हैं।
इन सभी लाभों के बावजूद लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा था कि पेंशन की राशि बढ़ती महंगाई के अनुरूप नहीं है। यही कारण है कि EPS सुधार की मांग लगातार तेज होती गई।
पेंशन की उम्र और अर्ली पेंशन का विकल्प
EPS के नियमों के अनुसार कर्मचारी 58 वर्ष की आयु में पेंशन का हकदार होता है। हालांकि, यदि कोई कर्मचारी चाहे तो 50 वर्ष की उम्र के बाद अर्ली पेंशन का विकल्प चुन सकता है। लेकिन इस स्थिति में पेंशन राशि में कटौती की जाती है।
58 वर्ष से पहले जितने साल पेंशन ली जाती है, हर साल के लिए पेंशन में 4 प्रतिशत की दर से कमी होती है। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि लोग सामान्य सेवानिवृत्ति आयु तक योगदान जारी रखें।
EPS सीमा बढ़ने का दीर्घकालिक प्रभाव
यदि EPS की सीमा बढ़ाकर 25,000 रुपये की जाती है, तो इसका असर केवल वर्तमान पेंशनरों पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि आने वाले दशकों तक इसका प्रभाव दिखेगा। बढ़ा हुआ योगदान लंबे समय में एक बड़ा पेंशन कोष तैयार करेगा, जिससे भविष्य की पेंशन अधिक स्थिर और सम्मानजनक हो सकेगी।
यह कदम रिटायरमेंट के बाद कर्मचारियों की आर्थिक निर्भरता को कम करने में भी मदद करेगा और उन्हें आत्मनिर्भर जीवन जीने का अवसर देगा।
सरकार के सामने चुनौतियां और संतुलन
हालांकि EPS का दायरा बढ़ाना कर्मचारियों के लिए राहत भरा कदम होगा, लेकिन सरकार के सामने वित्तीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी होगी। पेंशन दायित्व बढ़ने से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकार को कर्मचारियों की सुरक्षा और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाना होगा।
फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना समय की मांग है और EPS सुधार उसी दिशा में एक आवश्यक कदम है।
निष्कर्ष
बजट 2026 में EPS को लेकर प्रस्तावित बदलाव यदि लागू होते हैं, तो यह करोड़ों कर्मचारियों के लिए एक बड़ी सौगात साबित हो सकते हैं। सैलरी सीमा बढ़ने, योगदान में इजाफा होने और न्यूनतम पेंशन बढ़ने से रिटायरमेंट के बाद का जीवन कहीं अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक बन सकता है। यह फैसला न केवल वर्तमान पीढ़ी बल्कि भविष्य के कर्मचारियों के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार करेगा।
