दुनिया की बदलती भू-राजनीतिक और व्यापारिक परिस्थितियों के बीच कनाडा की राजनीति और अर्थव्यवस्था एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से दी गई कड़ी टैरिफ चेतावनी के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने देशवासियों को सीधे संबोधित करते हुए एक भावनात्मक लेकिन रणनीतिक अपील की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस समय कनाडा की अर्थव्यवस्था बाहरी खतरों से घिरी हुई है और ऐसे दौर में देश को उन चीजों पर ध्यान देना होगा, जो उसके अपने नियंत्रण में हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने नागरिकों से स्वदेशी यानी देश में बने उत्पादों को खरीदने की अपील की।

प्रधानमंत्री का यह संदेश केवल एक आर्थिक सलाह नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत भी माना जा रहा है। कार्नी ने वीडियो संदेश के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का असर सीधे आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ सकता है। ऐसे में घरेलू उद्योग, स्थानीय व्यवसाय और राष्ट्रीय उत्पादन को प्राथमिकता देना समय की मांग है।
ट्रम्प की टैरिफ धमकी और उसके मायने
प्रधानमंत्री कार्नी का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा को लेकर बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। ट्रम्प ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि यदि कनाडा चीन के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को और गहरा करता है, तो अमेरिका कनाडाई सामानों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकता है। यह धमकी केवल आर्थिक दबाव तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे कनाडा की विदेश नीति पर सीधा हस्तक्षेप भी माना जा रहा है।
ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कनाडाई प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए उन्हें ‘गवर्नर कार्नी’ कहा, जो अपने आप में एक राजनीतिक कटाक्ष है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कनाडा अगर चीन के लिए अमेरिका में सामान भेजने का एक तरह का “ड्रॉप ऑफ पोर्ट” बनना चाहता है, तो यह उसकी बड़ी गलतफहमी होगी। ट्रम्प का दावा है कि चीन के साथ गहरे व्यापारिक संबंध कनाडा की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ढांचे और जीवनशैली को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
अमेरिका-कनाडा व्यापारिक रिश्तों की गहराई
अमेरिका और कनाडा के बीच संबंध केवल पड़ोसी देशों के नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे गहरे व्यापारिक साझेदारों में से एक के रूप में देखे जाते हैं। दोनों देशों के बीच हर दिन औसतन दो अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है। अमेरिका को मिलने वाला कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और बिजली का एक बड़ा हिस्सा कनाडा से आता है। इसके अलावा ऑटोमोबाइल पार्ट्स, लकड़ी, कृषि उत्पाद और खनिज भी बड़े पैमाने पर सीमा पार करते हैं।
कनाडा के लिए अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। मशीनरी, तकनीक, दवाइयों और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में कनाडा की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता लंबे समय से बनी हुई है। यही कारण है कि किसी भी तरह का बड़ा टैरिफ या व्यापारिक टकराव सीधे कनाडा की अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है।
फ्री ट्रेड समझौतों से बनी आपसी निर्भरता
अमेरिका और कनाडा के गहरे व्यापारिक रिश्तों की नींव 1989 में पहले फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के साथ पड़ी थी। इसके बाद 1994 में लागू हुए नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट ने इस साझेदारी को और मजबूत किया। इस दौर में दोनों देशों की सप्लाई चेन इस कदर आपस में जुड़ गई कि कई उत्पाद सीमा पार कई बार आते-जाते हैं।
2020 में NAFTA की जगह यूनाइटेड स्टेट्स-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट लागू किया गया, जिसने व्यापार को और अधिक नियमबद्ध और आधुनिक बनाया। इसके तहत ज्यादातर सामान बिना टैरिफ के आयात-निर्यात होते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक कार का इंजन अमेरिका में तैयार होता है, उसके अन्य हिस्से कनाडा में जोड़े जाते हैं और फिर वह वाहन दोबारा अमेरिकी बाजार में पहुंचता है।
चीन के साथ बढ़ते रिश्ते और अमेरिका की नाराजगी
कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की हालिया चीन यात्रा इस पूरे विवाद की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। 13 से 17 जनवरी के बीच चीन दौरे पर कार्नी ने कई अहम व्यापारिक समझौते किए। इनमें खास तौर पर इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिला। कनाडा ने चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर लगाए गए टैरिफ को कम करने का फैसला किया है।
कुछ समय पहले तक कनाडा ने अमेरिका के साथ मिलकर चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया था। अब नए समझौते के तहत इस टैरिफ को घटाकर 6.1 प्रतिशत किया जा रहा है, हालांकि यह एक तय सीमा तक ही लागू होगा। इसके बदले में चीन ने कनाडा के कृषि उत्पादों पर लगाए गए भारी जवाबी टैरिफ को कम करने पर सहमति जताई है।
यही बदलाव अमेरिका को खटक रहा है और ट्रम्प इसे अपने देश के हितों के खिलाफ मानते हैं।
दावोस भाषण और ‘नया वर्ल्ड ऑर्डर’
मार्क कार्नी का वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में दिया गया भाषण भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। उन्होंने वैश्विक राजनीति में बड़े देशों के बढ़ते दबदबे और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के कमजोर पड़ने पर खुलकर बात की। कार्नी का कहना था कि जब बड़े देशों को फायदा होता है, तो वे नियमों को अपने हिसाब से मोड़ लेते हैं, जबकि कमजोर देशों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है।
उनका यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों की नीति पर सवाल खड़ा करता है। विश्लेषकों का मानना है कि यही स्पष्टवादिता ट्रम्प को सबसे ज्यादा चुभ रही है।
पहले भी आमने-सामने आ चुके हैं कार्नी और ट्रम्प
मार्क कार्नी और डोनाल्ड ट्रम्प के बीच टकराव नया नहीं है। इससे पहले ग्रीनलैंड के मुद्दे पर भी दोनों नेताओं के विचार आमने-सामने आ चुके हैं। कार्नी ने साफ कहा था कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला अमेरिका नहीं कर सकता और कनाडा इस मुद्दे पर डेनमार्क के साथ खड़ा है।
इसके अलावा ट्रम्प द्वारा कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की टिप्पणी पर भी कार्नी ने सख्त प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने साफ कहा था कि कनाडा कभी बिकाऊ नहीं है और न ही वह अमेरिका का हिस्सा बनेगा।
स्वदेशी खरीद की अपील का व्यापक संदेश
प्रधानमंत्री कार्नी की स्वदेशी सामान खरीदने की अपील केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से भी जुड़ी हुई है। यह संदेश उस दौर में आया है, जब वैश्विक व्यापार राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है। कार्नी का मानना है कि अगर कनाडा को बाहरी दबावों का सामना करना है, तो उसे अपने घरेलू उद्योग और नागरिकों की भागीदारी पर भरोसा करना होगा।
