छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और समाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसमें पत्नी द्वारा बार-बार आत्महत्या की धमकी देना पति के प्रति मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है, यह स्पष्ट किया गया। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिविजन बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि मानसिक उत्पीड़न केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी हरकतें भी क्रूरता की कानूनी परिभाषा में आती हैं जिनसे पति के मन में डर और असुरक्षा उत्पन्न होती है।

हाई कोर्ट के अनुसार, पत्नी का बार-बार खुद को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना और धर्म बदलने के लिए दबाव डालना भी मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति ने कई बार इस डर और तनाव के कारण जीवन कठिनाई का सामना किया।
तलाक से जुड़े मामले का विवरण
यह मामला बलोद जिले के एक पति-पत्नी से जुड़ा है, जिनकी शादी मई 2018 में हुई थी। पति ने 14 अक्टूबर 2019 को गुरु पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उसने बताया कि उसकी पत्नी ने जहर खाने, चाकू से खुद को मारने और केरोसिन डालकर आग लगाने की धमकी दी थी। पति का कहना था कि वह लगातार भय और मानसिक तनाव में जी रहा था।
फैमिली कोर्ट ने जून 2024 में पति की तलाक की अर्जी को मंजूरी दी थी। पत्नी ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। बेंच ने कहा कि क्रूरता केवल शारीरिक नहीं होती बल्कि मानसिक उत्पीड़न भी कानूनी दृष्टि से गंभीर अपराध है।
मानसिक उत्पीड़न और धर्म संबंधी दबाव
हाई कोर्ट ने मामले की जांच में पाया कि पत्नी और उसके परिवार ने पति पर इस्लाम अपनाने का दबाव डाला। हालांकि पत्नी ने इन आरोपों से इंकार किया। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि दोनों नवंबर 2019 से अलग रह रहे हैं। गांव के बुजुर्ग और समुदाय के प्रयासों के बावजूद पत्नी पति के पास वापस नहीं लौटी।
पति की सुरक्षा और कानूनी मान्यता
क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान पति ने स्वीकार किया कि उसने पत्नी को उसके मायके इसलिए छोड़ा क्योंकि उसे डर था कि वह खुद को नुकसान पहुंचा सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के बार-बार आत्महत्या के प्रयास और धमकियों ने पति के लिए लगातार मानसिक उत्पीड़न की स्थिति पैदा की। ऐसे व्यवहार कानूनी रूप से क्रूरता की कसौटी पर खरे उतरते हैं।
गुजारा भत्ता और कानूनी निर्णय
फैमिली कोर्ट के आदेश अनुसार, पत्नी को अपने और नाबालिग बेटे के लिए हर महीने 2,000 रुपये का गुजारा भत्ता मिलता है। हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि पत्नी द्वारा बिना किसी ठोस कारण के पति को छोड़ना भी कानून की दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सामाजिक दृष्टिकोण और निष्कर्ष
इस फैसले से समाज में यह संदेश गया है कि पारिवारिक विवादों में मानसिक उत्पीड़न भी गंभीर अपराध है और इसके लिए कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह निर्णय न केवल पति के अधिकार की रक्षा करता है बल्कि महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए यह स्पष्ट करता है कि परिवारिक समस्याओं का हल हिंसा या धमकियों से नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला परिवार और समाज में मानसिक स्वास्थ्य और कानूनी सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। न्यायपालिका ने इस निर्णय के माध्यम से स्पष्ट किया कि विवाह संबंधी विवादों में केवल शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मानसिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
